Saturday, August 6, 2016



Comprehension Type Short Questions and Answers 

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Thursday, April 28, 2016

जिस प्रकार से शनी शिंगणापुर मंदिर ने देश के संविधान तथा देश के कानून की मर्यादा का सम्मान करते हुवे अपनी सैंकड़ो साल पुरानी परम्परा को बदल कर महिलाओं को प्रवेश की आज़ादी दे दी, उसी प्रकार क्या हाजी अली दरगाह कमेटी अपनी चार साल पुरानी परम्परा को तोड़ कर महिलाओं को दर्शन की आज़ादी नहीं दे सकती . सनद रहे के सन २०११ से पहले हाजी अली दरगाह पर महिलाओं के जाने पर कोई पाबंदी नहीं थी . मैं स्वयं अपने परिवार के साथ दरगाह पर जा चूका हूँ . तब वहां कोई पाबंदी  नहीं थी .  अकस्मात ये पाबंदी कहां से आ गई मैं नहीं जनता किन्तु ये अवश्य जनता हूँ के सामाजिक परम्पराओं में गतिशीलता होनी चाहिये ताकि वो देश कल और परिस्तिथि के साथ कदम ताल कर सकें . 

Saturday, April 23, 2016

मैं नहीं समझता के ईशवर महिला और पुरुष में कोई भेद-भाव करता है, और यदि करता है तो वो ईष्वर नहीं . और यदि नहीं करता तो उसके भवन में औरतों का प्रवेश वर्जित कैसे? जितने भी धर्म-गृन्थ मैंने पढ़े हैं कम से कम उनमें मैंने तो ऐसा कुछ नहीं पढ़ा . तो फिर  औरतो का धर्म स्थलों में प्रवेश वर्जित क्यों ? कहीं ये धर्म के नाम पर पुरुष वरचस्व की निशानी तो नहीं?

Thursday, April 7, 2016

कन्हैया ने देश विरोधी नारा दिया था या नहीं, ये अभी सिद्ध होना बाकि है लेकिन एन आई टी के छात्रों ने निश्च्य ही भारत माता की जय बोली थी . कश्मीर में घुस कर पाकिस्तान परस्तों को मुंह तोड़ जवाब दिया . न बंदूकों से डरे न बम से . लेकिन अफसोस के इन देश भक्तों को अपनी देश भक्ती के लिए तथा-कथित देश-भक्त सरकार से पहले मिलीं लाठियां और फिर अपराधिक मुकदमा .
कन्हैया के नाम पर हाहाकार मचाने वाले नेताओं ने इस घटना को मूक समर्थन दिया तो भक्त भी खामोश हैं . ये एक घटना ही इस बात को सिद्ध करती है के मोदी सरकार की देश भक्ति एक चुनावी स्टंट से ज्यादा कुछ नहीं है . 

Wednesday, April 6, 2016

जे एन यू के छात्रों की गिरफतारी क्यों ?

देश द्रोही थे .

एन आई टी के छात्रों पर लाठीचार्ज क्यों ?

देश भक्त थे .

सरकार वही सोच नई 

Thursday, March 24, 2016

होली में ससुरा देवर लागे
लिए कटोरे मां दिल मांगे
                       बुरा ना मानों होली है

ना कमरा जनता है ना अंगनाई जानती है
देवर के दिल में क्या है, भौजाई जानती है
                         बुरा ना मानों होली है                  

Sunday, March 6, 2016

So Sad

आज फिर दो बच्चों ने फेल होने के डर से आत्महत्या कर ली? क्या पढ़ाई में पास होना जिन्दा रहने से ज्यादा ज़रूरी है? अगर ऐसा है तो लानत है ऐसी पढ़ाई पर .  पढ़ाई बच्चों के लिए होती है या बच्चे पढ़ाई के लिए ? हम इन आत्म-हत्याओं के लिए किसी की ज़िम्मेदारी क्यों नहीं तय करते हैं ?
मेरा अपना अनुभव कहता है के इस परिस्तिथि के लिए तीन कारक ज़िम्मेदार हैं .  पहला कारक है बच्चों के अभिभावक जो बच्चों के प्राप्तांक को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ लेते हैं . अक्सर अभिभावक द्वारा  अपने बच्चों ताना देते सुना जा सकता है के फलां का बच्चा बहुत अच्छा है क्यों के वो ज्यादा नंबर ले कर आया है और उनके बच्चे ने कम नंबर ला कर उनकी नाक कटवा दी . क्या कोई बच्चा इस लिए बुरा हो सकता है क्यों के उसके नंबर दूसरों से कम हैं? क्या वे बच्चों को अपनी नाक ऊंची करने के लिए पढ़ा रहें हैं ? नंबर नहीं तो बच्चा भी नहीं ? अभी कुछ दिन पहले मेरे विध्यालय के एक बच्चे को १०२ बुखार में उसके अभिभावक ने इम्तिहान देने भेज दिया . जब मैंने उसके घर फोन कर उसकी माँ से पूछा के बच्चे को इस स्तिथि में विध्यालय क्यों भेजा तो  बोलीं के इम्तेहान देना ज़रूरी था . जब मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया के इम्तेहान ना देने से बच्चे का कोई नुकसान नहीं होगा तो उनका कहना था के उसके नंबर तो कम हो जायेंगे . उनकी इच्छा है के उनका पुत्र क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाये .  जब पहली कक्षा में यह हाल है तो दसवीं में क्या हाल होगा ? मैंने तो ज़बरदस्ती दबाव डाल कर उस बच्चे को वापस कर दिया लेकिन अगर मेरे विद्यालय की अध्यापिका सचेत न होती और समय पर मुझे सूचित न करती तो उस बच्चे को ऐसी पीड़ादायक स्थिति में इम्तहान देना पड़ता .
ऐसी ही स्थिति बच्चों के विषय चयन के समय भी होती है . अक्सर माँ बाप बच्चों  वो विषय पढ़ने को मजबूर करते हैं जो वो पढ़ना नहीं चाहता . ऐसी स्तिथि में अक्सर बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते है और कभी कभी आत्महत्या तक कर लेते है . आज भी कुछ ऐसा ही हुवा . एक बच्चे ने फिजिक्स के कारण आत्महत्या की तो एक बच्ची ने अंग्रेजी के कारण . ये अभिभावक कब समझेंगे के विज्ञानं और अंग्रेजी इस संसार की वैतरणी  नहीं हैं . बच्चों को वही विषय पढ़ने देना चाहिए जो वो पढ़ सकता हो . हर विषय हर बच्चे के लिए नहीं होता है।  दूसरा बड़ा कारक अध्यापकों का बड़ा वर्ग है . आज का अध्यापक मोटिवेटर की भूमिका से निकल कर अल्ट्रा-आलोचक की भूमिका में आ चूका है . आज बच्चों को शिक्षक से स्नेह कम और  प्रताड़ना अधिक मिल रही है . लवकेश मिश्र की दुःखद आत्महत्या भी इसी प्रताड़ना का परिणाम है .
तीसरा सबसे बड़ा कारक है आज का सम्पूर्ण समाज . आज परफॉर्म करने का जितना प्रेशर विद्यार्थी पर समाज द्वारा डाला जा रहा है उतना कभी नहीं डाला गया .
सबसे मुसीबत की बात ये है के तीनो ही कारकों को अपनी भूमिका से होने वाले नुकसान का पता  है किन्तु तीनों ही सुधरने को तैयार नहीं हैं .

Tuesday, February 23, 2016

जिस दौर में में फिल्मों से काव्य गायब हो गया हो और सिनेमा पथरीला हो गया हो उस दौर में फ़िल्म सनम रे ओस की बून्द का एहसास कराती है।  यूँ तो मुझे रोमांटिक फिल्में कम ही  सुहातीं हैं लेकिन सनम रे अच्छी लगी।  इसमें न तो बाजीराव मस्तानी की तरह बेमतलब की ताली बजाउ डायलाग बाज़ी है न गोलियों की रासलीला है।  अगर अगर कुछ  है तो बस एक मखमली एहसास और प्यानो  की धुन पर थिरकते ख्वाब । इसका नायक आशिकी २ की तरह कोई पलायन वादी व्यक्तित्व नहीं है अपितु अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद करता एक नवजवान है। आम रोमांटिक फिल्मों की तरह ये फ़िल्म भी बीच बीच में झूलती भी है।
दिव्य खोसला  कुमार के निर्देशन में राज खोसला की शैली स्पष्ट झलकती है।  खास कर लोकेशन के चयन मे।  गीत भाव पूर्ण है तो संगीत कर्ण प्रिय।  इस फ़िल्म का यू एस पी अगर कोई है तो वो है ऋषि कपूर जिसने अपने संछिप्त सी भूमिका में एक हृदयस्पर्शी प्रभाव छोड़ा है। यूँ तो यह फ़िल्म 'अवश्य देंखें' की श्रेणी में नहीं आती लेकिन फिर भी देखी जा सकती है। 

Sunday, February 21, 2016

पंपोर के शहीदों को भाव भीनी श्रद्धांजलि।  बड़ा प्रशन ये है के क्या आतंकवाद से लड़ना केवल सुरक्षा बलों का काम है ? सुना है के जिस वक्त उस इमारत में आतंकवादी घुसे थे उस वक्त इमारत में करीब सौ लोग मौजूद थे। अगर ये सौ लोग एक साथ उनपर टूट पड़ते तो संभवतः सारे के सारे  आतंकवादी  जाते। हाँ कुछ लोग शहीद भी होते।  शहादत तो हमने वैसे भी दी है लेकिन अगर आम आदमी आतंकवादियों पर टूटने लगे तो उनतक ये संदेश जाता के भारत का आम आदमी केवल धरना-प्रदर्शन ही करना नही जनता बल्कि देश के लिए जान  देना भी जनता है। अगर भारत पर आक्रमण किया तो उन्हें १५०  भारत वासियों से लड़ना पड़ेगा।  किन्तु अफ़सोस ऐसा होता नहीं है। हम दंगो, धरना-प्रदर्शन आदि में तो जान दे सकते है, आरक्षण, मंदिर मस्जिद आदि  के लिए भी  दे सकते है।  हम पुलिस फायरिंग में भी मरने को तैयार हैं लेकिन  देश के लिए नहीं मर सकते।  उसके लिए सिर्फ हमारे सुरक्षा बल ही मरें। देश प्रेम तो हमारे लिए बस एक नारा भर है।  कितने अफ़सोस की बात है के देश के एक शहीद के शव को उसके उसके परिवार तक पहुंचने में धरना प्रदर्शन के कारण इतनी दिक्क्तें पेश आयीं।  होना तो ये चाहिए था के शहीद कैप्टेन पवन कुमार के शव का ससम्मान स्वागत किया जाता।  इस शर्मनाक स्तिथि के लिए ना तो मिडिया ने कोई हो हल्ला किया ना ही किसी राजनितिक दल ने कोई शोर मचाया। न ही किसी ने कोई मार्च निकला न ही किसी संगठन ने इसकी भर्तस्ना की।  क्या फायदा है ऐसी छद्म देश भक्ति का। 

Thursday, February 18, 2016

                                              एक सवाल आज़ादी मांगने वाले विद्यार्थियों से

तुम्हे आज़ादी चाहिए तो किस से ? तुम तो खुद एक आज़ाद मुल्क में रहते हो, तो फिर आज़ादी किस्से?
तुम्हारी समझ से आज़ादी  क्या है? आज़ादी की परिभाषा क्या है? बहुत साल पहले तुम्हारी ही तरह कुछ विद्यार्थियों ने भी आज़ादी मांगी थी।  और उस आज़ादी को पाने के लिए हँसते हँसते फांसी  पर झूल गए थे।  भूल गए तुम भगत सिंह जी और उनके साथियों को ? उन्होंने आज़ादी मांगी थी विदेशियों से।  तुम किस्से आज़ादी मांग रहे हो।  अब तो ये देश आज़ाद है।  पूरा हिंदुस्तान तुम्हारा है, तुम पुरे हिंदुस्तान के हो।  फिर आज़ादी तुम किस्से मांगते हो? जिस यूनिवर्सिटी में तुम पढ़ते हो वो एक आज़ाद भारत की यूनिवर्सिटी है जहां तुम्हे ऊंची से ऊंची डिग्री लेने की तुम्हें आज़ादी है।  और मत भूलो, तुम्हारी पढाई का खर्च भी इस आज़ाद देश के नागरिक उठाते है।  क्या तुमने कभी सोचा है के तुम्हारी पढाई के खर्च में इस देश के सबसे गरीब आदमी का भी कॉन्ट्रिब्यूशन होता है।  देश तुम पर इस लिए खर्च करता है के तुम पढ़ लिख कर इस देश को और बेहतर बनाओगे।  एक ऐसा देश बनाओगे जहां सब  मिलकर बढ़ेंगे।  और तुम क्या कर रहे ? कभी सोचा है ?  मैं नहीं जनता के तुम्ह कौन बरगला रहा है ? कुछ लोग कहते है के पाकिस्तान।  तो क्या पाकिस्तान तुम्हारा आदर्श है?
वो पाकिस्तान जहां का आम नागरिक कठमुल्लाओं और फौज की दहशत में जीता है।  वो पाकिस्तान जहां कोई लोकतान्त्रिक मूल्य नहीं है।  वो पाकिस्तान जहां नागरिक अधिकारों पर जब चाहे तब फौज कब्ज़ा कर लेती है। वो पाकिस्तान जो अपने ही मासूम बच्चों पर गोली चलाता है।  क्या तुम भूल गए के उन बच्चों की मौत पर हिंदुस्तान की माएं रोईं थीं।
हो सकता है तुम्हें सिस्टम से कोई शिकायत हो।  तो सिस्टम बदलने से तुम्हे कौन रोकता है।  काबिल बनो और बदल दो सिस्टम को।
हो सकता है तुम्हें किसी एक या सभी राजनितिक दलों से शिकायत हो।  तो  लो अपना एक नया राजनितिक दल। कौन रोकता है तुम्हें ? तुम्हें हर चीज़ की आज़ादी है।  और ये आज़ादी तुम्हें हज़ारो क्रांतिकारियों की क़ुरबानी से मिली है।  उनकी क़ुरबानी का मज़ाक मत बनाओ। तुम जो कर रहे हो, भले तुम उसे कोई क्रांति मान लो लेकिन सत्य तो ये  है के वो एक चूतियापे से ज्यादा कुछ नहीं।  

Wednesday, February 17, 2016

बस्सी साहब का कहना है के कन्हैया की ज़मानत का विरोध दिल्ली पुलिस नहीं करेगी। क्यों भाई क्यों नहीं करेगी ? क्या कन्हैया अकस्मात देश द्रोही से देश भक्त हो गया ? या दिल्ली पुलिस की देश द्रोह  को लेकर परिभाषा बदल गयी ? या कन्हैया देश द्रोही था ही नहीं ? उस पर देश द्रोह का इल्जाम किसी एजेंडे के तहद लगाया गया और दिल्ली पुलिस के पास जानती है के उसके पास कन्हैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।  ज़मानत का विरोध कर अपनी भद्द पिटवाने से बेहतर है के ज़मानत का विरोध ही न किया जाय। 
अगर कन्हैया की गिरफ़्तारी किसी राजनितिक षड्यंत्र के तहद हुई थी तो यह इस देश के लिए बहुत  के लिए एक बहुत ही घातक परम्परा की शुरुआत है। अगर गिरफ़्तारी एक षड्यंत्र थी तो फिर तो पूरा प्रकरण एक षड्यंत्र था।  सड़क पर देश भक्ति के प्रदर्शन से लेकर कचहरी का बवाल तथा भाजपा विधायक द्वारा छात्र की पिटाई से लेकर मिडिया पर हमला। सब किसी गहरी साज़िश का हिस्सा थी। कहीं कोई एक राजनितिक दल दलित शोषित समाज को यह संकेत देने की कोशिश  तो नहीं कर रहा है के जैसे सदियों से सर झुका कर जीते आये हो वैसे ही जियो वरना कुचल दिए जाओगे।   

Tuesday, February 2, 2016

'साला खडूस' के विषय में शायद मेरा इतना ही कहना काफी है के बस 'झकास' । ये फ़िल्म केवल किसी बड़े ख्वाब को पूरा करने के जददोजहद के बारे में ही नहीं है अपितु खेल संघों के अंदर व्याप्त भ्र्ष्टाचार को भी बड़ी बेबाकी से नंगा करती है।  आर माधवन ने इस फ़िल्म में अपनी रोमांटिक इमेज को तोड़ कर एक रफ टफ बॉक्सिंग कोच की भूमिका को निभाया नहीं बल्कि जिया है।  जरूर जरूर देखें।

आजकल सोशल मिडिया पर एक नया इतिहास लिखा जा रहा है, वो भी महान क्रन्तिकारी भगत सिंह जी के नाम पर।  कुछ छाप रहे हैं के १४ फ़रवरी के दिन भगत सिंह  जी को फांसी की सजा सुनाई गयी थी तो कुछ लिख रहें हैं के भगत सिंह जी को १४ फ़रवरी के दिन फँसी चढ़ा दिया गया था।  अरे भक्तों कुछ तो शर्म करो।  अपने झूठ के पुलिंदे में शहीदों को तो न लपेटो।  सारी दुनिया जानती है के भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जी को फांसी की सजा ट्रिब्यूनल ने ७ अक्टूबर १९३० के दिन सुनाई थी तथा उनको २३ मार्च १९३१ के दिन फांसी चढ़ा कर शहीद कर दिया गया था।  

Friday, January 15, 2016

क्यों भा ज पा का ग्राफ घट रहा है

अगर राजनितिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर सोचा जाये तो ये बात बिलकुल स्पष्ट नजर आएगी के भाजपा का जो ग्राफ लोक सभा चुनावों के समय था वो अब नहीं है।  दिल्ली और बिहार के चुनाव इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।
तो प्रश्न ये भी उठना लाजिमी है के अकस्मात ऐसा क्या हो गया जो भाजपा अपने स्थान से लगातार फिसल कर नीचे आ रही है।  क्या मोदी जी की नीतियां फेल हो रही हैं या नितीश कुमार, अरविन्द केजरीवाल या कांग्रेस ने कोई बड़ा चमत्कार कर दिया ? नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुवा।  तो फिर हुवा क्या ?

अगर लोकसभा के चुनावों के दौर को पैमाना बना कर इस प्रश्न का उत्तर तलाशें तो हम पाएंगे के उस दौर में भाजपा को जो अपार जन समर्थन मिला वो मोदी जी के नाम पर ही मिला था।  इस जन समर्थन में सबसे बड़ा हाथ १८ से ले कर ४० साल तक तक के युवाओं का था।  मोदी जी के नाम पर युवाओं ने धर्म, जाती, सामाजिक स्तर आदि की सभी सीमाओं को लांघ कर 'मोदी मोदी' के नारे लगाये थे।  आजाद भारत के इतिहास में इन्दिरा ग़ांधी के बाद पहली बार कोई नेता आया था जिसके नाम पर बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, उच्च वर्ग निम्न वर्ग आदि वर्जनाएं टूट गयीं थीं।  अगर कुछ था तो बस मोदी मोदी।

लेकिन चुनाव जितने के बाद तुरंत ही मोदी जी की टीम ने अपनी अनर्गल बयान बाज़ी से भाजपा की नींव हिलनी शुरू कर दी।  अल्प संख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमले होने शुरू हो गए।  ये कहना उचित नहीं होगा के ये हमले भाजपा ने करवाये। ऐसा कोई सबूत कहीं मिला नहीं।  भाजपा को बदनाम करने के लिए ये हमले कोई और भी करवा सकता है।  लेकिन अनर्गल बयानबाजी के कारण ये इलज़ाम भाजपा के सर गया।

दूसरा मुद्दा बना बीफ बैन पर हो रही राजनीती।  गौ हत्या बंद होनी चाहिए और बिलकुल बंद होनी चाहिए।  लेकिन गौ हत्या के नाम पर दादरी ऐसी घटनाएँ और उस पर भाजपा के नेताओं का समर्थन? दूसरे गौ मांस खाने का आरोप केवल मुसलमानों के सर ? हम सब जानते है के सुदूर पूर्व तथा केरल आदि राज्यों में सभी धर्मो के लोग बीफ खाते हैं तो फिर केवल मुसलमानो पर ही आरोप क्यों? महाराष्ट्र में तो अठावले की पार्टी जो की दलित राजनीती करती है उसने बीफ बैन के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी किया था जबकि यही पार्टी महाराष्ट्र में भाजपा सरकार को समर्थन भी दे रही है।  बीफ बैन की राजनीती से एक नुकसान और हुवा।  भारत भर में बीफ दलित वर्ग के जीविकोपार्जन का ज़रिया भी है।  बीफ बैन से दलितों में ये संदेश गया के भाजपा उनकी रोजी रोटी के खिलाफ है।  अत: विरोधियों द्वारा भाजपा पर ब्राह्मण वादी पार्टी होने का इल्जाम लगाना और दलितों द्वारा इसे सहजता से स्वीकार लिया जाना कोई अचरज की बात नहीं रही।

इसी प्रकार अन्य छोटी छोटी बातें जो वास्तव में बड़ी साबित हो रहीं हैं जिनके कारण भाजपा का वोट बैंक खिसकता जा रहा है और मोदी जी का नारा 'सबका साथ सबका विकास' खोखला साबित हो रहा है।    अभी भी कुछ अधिक बिगड़ा है।  अगर भाजपा सभी वर्गो में अपने प्रति विश्वास पुन: स्थापित कर लेती है तो अभी संभल सकती है। अन्यथा जो मिला है उसे खोने में उसे बहुत समय नहीं लगेगा और इसकी जिम्मेदार भाजपा खुद होगी।  

Wednesday, January 6, 2016