अगर राजनितिक प्रतिबद्धता से ऊपर उठ कर सोचा जाये तो ये बात बिलकुल स्पष्ट नजर आएगी के भाजपा का जो ग्राफ लोक सभा चुनावों के समय था वो अब नहीं है। दिल्ली और बिहार के चुनाव इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।
तो प्रश्न ये भी उठना लाजिमी है के अकस्मात ऐसा क्या हो गया जो भाजपा अपने स्थान से लगातार फिसल कर नीचे आ रही है। क्या मोदी जी की नीतियां फेल हो रही हैं या नितीश कुमार, अरविन्द केजरीवाल या कांग्रेस ने कोई बड़ा चमत्कार कर दिया ? नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुवा। तो फिर हुवा क्या ?
अगर लोकसभा के चुनावों के दौर को पैमाना बना कर इस प्रश्न का उत्तर तलाशें तो हम पाएंगे के उस दौर में भाजपा को जो अपार जन समर्थन मिला वो मोदी जी के नाम पर ही मिला था। इस जन समर्थन में सबसे बड़ा हाथ १८ से ले कर ४० साल तक तक के युवाओं का था। मोदी जी के नाम पर युवाओं ने धर्म, जाती, सामाजिक स्तर आदि की सभी सीमाओं को लांघ कर 'मोदी मोदी' के नारे लगाये थे। आजाद भारत के इतिहास में इन्दिरा ग़ांधी के बाद पहली बार कोई नेता आया था जिसके नाम पर बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, उच्च वर्ग निम्न वर्ग आदि वर्जनाएं टूट गयीं थीं। अगर कुछ था तो बस मोदी मोदी।
लेकिन चुनाव जितने के बाद तुरंत ही मोदी जी की टीम ने अपनी अनर्गल बयान बाज़ी से भाजपा की नींव हिलनी शुरू कर दी। अल्प संख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमले होने शुरू हो गए। ये कहना उचित नहीं होगा के ये हमले भाजपा ने करवाये। ऐसा कोई सबूत कहीं मिला नहीं। भाजपा को बदनाम करने के लिए ये हमले कोई और भी करवा सकता है। लेकिन अनर्गल बयानबाजी के कारण ये इलज़ाम भाजपा के सर गया।
दूसरा मुद्दा बना बीफ बैन पर हो रही राजनीती। गौ हत्या बंद होनी चाहिए और बिलकुल बंद होनी चाहिए। लेकिन गौ हत्या के नाम पर दादरी ऐसी घटनाएँ और उस पर भाजपा के नेताओं का समर्थन? दूसरे गौ मांस खाने का आरोप केवल मुसलमानों के सर ? हम सब जानते है के सुदूर पूर्व तथा केरल आदि राज्यों में सभी धर्मो के लोग बीफ खाते हैं तो फिर केवल मुसलमानो पर ही आरोप क्यों? महाराष्ट्र में तो अठावले की पार्टी जो की दलित राजनीती करती है उसने बीफ बैन के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी किया था जबकि यही पार्टी महाराष्ट्र में भाजपा सरकार को समर्थन भी दे रही है। बीफ बैन की राजनीती से एक नुकसान और हुवा। भारत भर में बीफ दलित वर्ग के जीविकोपार्जन का ज़रिया भी है। बीफ बैन से दलितों में ये संदेश गया के भाजपा उनकी रोजी रोटी के खिलाफ है। अत: विरोधियों द्वारा भाजपा पर ब्राह्मण वादी पार्टी होने का इल्जाम लगाना और दलितों द्वारा इसे सहजता से स्वीकार लिया जाना कोई अचरज की बात नहीं रही।
इसी प्रकार अन्य छोटी छोटी बातें जो वास्तव में बड़ी साबित हो रहीं हैं जिनके कारण भाजपा का वोट बैंक खिसकता जा रहा है और मोदी जी का नारा 'सबका साथ सबका विकास' खोखला साबित हो रहा है। अभी भी कुछ अधिक बिगड़ा है। अगर भाजपा सभी वर्गो में अपने प्रति विश्वास पुन: स्थापित कर लेती है तो अभी संभल सकती है। अन्यथा जो मिला है उसे खोने में उसे बहुत समय नहीं लगेगा और इसकी जिम्मेदार भाजपा खुद होगी।
तो प्रश्न ये भी उठना लाजिमी है के अकस्मात ऐसा क्या हो गया जो भाजपा अपने स्थान से लगातार फिसल कर नीचे आ रही है। क्या मोदी जी की नीतियां फेल हो रही हैं या नितीश कुमार, अरविन्द केजरीवाल या कांग्रेस ने कोई बड़ा चमत्कार कर दिया ? नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुवा। तो फिर हुवा क्या ?
अगर लोकसभा के चुनावों के दौर को पैमाना बना कर इस प्रश्न का उत्तर तलाशें तो हम पाएंगे के उस दौर में भाजपा को जो अपार जन समर्थन मिला वो मोदी जी के नाम पर ही मिला था। इस जन समर्थन में सबसे बड़ा हाथ १८ से ले कर ४० साल तक तक के युवाओं का था। मोदी जी के नाम पर युवाओं ने धर्म, जाती, सामाजिक स्तर आदि की सभी सीमाओं को लांघ कर 'मोदी मोदी' के नारे लगाये थे। आजाद भारत के इतिहास में इन्दिरा ग़ांधी के बाद पहली बार कोई नेता आया था जिसके नाम पर बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, उच्च वर्ग निम्न वर्ग आदि वर्जनाएं टूट गयीं थीं। अगर कुछ था तो बस मोदी मोदी।
लेकिन चुनाव जितने के बाद तुरंत ही मोदी जी की टीम ने अपनी अनर्गल बयान बाज़ी से भाजपा की नींव हिलनी शुरू कर दी। अल्प संख्यकों के धार्मिक स्थलों पर हमले होने शुरू हो गए। ये कहना उचित नहीं होगा के ये हमले भाजपा ने करवाये। ऐसा कोई सबूत कहीं मिला नहीं। भाजपा को बदनाम करने के लिए ये हमले कोई और भी करवा सकता है। लेकिन अनर्गल बयानबाजी के कारण ये इलज़ाम भाजपा के सर गया।
दूसरा मुद्दा बना बीफ बैन पर हो रही राजनीती। गौ हत्या बंद होनी चाहिए और बिलकुल बंद होनी चाहिए। लेकिन गौ हत्या के नाम पर दादरी ऐसी घटनाएँ और उस पर भाजपा के नेताओं का समर्थन? दूसरे गौ मांस खाने का आरोप केवल मुसलमानों के सर ? हम सब जानते है के सुदूर पूर्व तथा केरल आदि राज्यों में सभी धर्मो के लोग बीफ खाते हैं तो फिर केवल मुसलमानो पर ही आरोप क्यों? महाराष्ट्र में तो अठावले की पार्टी जो की दलित राजनीती करती है उसने बीफ बैन के खिलाफ धरना प्रदर्शन भी किया था जबकि यही पार्टी महाराष्ट्र में भाजपा सरकार को समर्थन भी दे रही है। बीफ बैन की राजनीती से एक नुकसान और हुवा। भारत भर में बीफ दलित वर्ग के जीविकोपार्जन का ज़रिया भी है। बीफ बैन से दलितों में ये संदेश गया के भाजपा उनकी रोजी रोटी के खिलाफ है। अत: विरोधियों द्वारा भाजपा पर ब्राह्मण वादी पार्टी होने का इल्जाम लगाना और दलितों द्वारा इसे सहजता से स्वीकार लिया जाना कोई अचरज की बात नहीं रही।
इसी प्रकार अन्य छोटी छोटी बातें जो वास्तव में बड़ी साबित हो रहीं हैं जिनके कारण भाजपा का वोट बैंक खिसकता जा रहा है और मोदी जी का नारा 'सबका साथ सबका विकास' खोखला साबित हो रहा है। अभी भी कुछ अधिक बिगड़ा है। अगर भाजपा सभी वर्गो में अपने प्रति विश्वास पुन: स्थापित कर लेती है तो अभी संभल सकती है। अन्यथा जो मिला है उसे खोने में उसे बहुत समय नहीं लगेगा और इसकी जिम्मेदार भाजपा खुद होगी।
