Tuesday, November 25, 2025

 

                                                              एक प्याला चाय 

                                                                         एकल अभिनय 

                                                     मूल कहानी :-  कैथरीन मैन्सफील्ड 

                                                     नाट्य-रूपांतरण :- नीरज हेस्टिंग्स 


रोजमेरी फैल। बहुत ही elegantly ड्रेस्ड महिला जिसने एक फ्लोरल फ्रॉक पहन रखी है। सर पर हैट है। हाथ में कीमती बैग झूल रहा है। उसने बहुत ही डेलिकेट से दस्ताने चढ़ा रखे हैं। पैरों में वाइट स्टॉकिंग्स और बेलिस डाल रखी है। वो मंच पर ऐसे टहल रही है जैसे किसी मार्केट में हो। वो दर्शकों से मुखातिब  हो कर बड़ी ही अदा से कहती है :

रोजमेरी :- ओफो मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं? ताज्जुब हो रहा है के मैं, यानी रोजमेरी फैल जिसे अगर अपने लिए कोई                   ड्रेस भी खरीदनी होती है तो पेरिस फ्लाई करती है। वो रोजमेरी फैल, यानी कि मैं इस लोकल मार्केट में                   क्या कर रही है ? तो पहले पूछिए के मैं अपनी ड्रेस खरीदने पेरिस क्यों जाती हूँ? वो इसलिए, के पेरिस                     के नए डिज़ाइनर कहते हैं--"हर औरत को अपनी स्टाइल का मालिक होना चाहिए। (गर्व से) और मेरा                     तो है ही। अरे मेरे घर की हर चीज़ एक्सक्लूसिव है। यहां तक के मेरे घर की चाय भी। अब मैं आपको                      बताती हूँ के मैं इस मार्केट में क्या कर रही हूँ। वैसे तो ये अपने शहर की एक हाई एन्ड मार्किट है लेकिन                  मेरा यहां आने का कारण है दॉस्तोएव्स्की। फ्योदोर दॉस्तोएव्स्की। अरे वही क्राइम एंड पनिशमेंट वाले।                 क्या कहा ? नहीं जानते ? अरे वही रस्सियन नॉवेलिस्ट। फ्योदोर दॉस्तोएव्स्की अपने मनोवैज्ञानिक रूप से                 गहन और भविष्यसूचक उपन्यासों  प्रसिद्ध हैं, जिनमें मानवीय स्थिति, नैतिकता और और आध्यात्मिक                     संघर्षों का अन्वेषण किया गया है। अब आप पूछेंगे के मेरा इस मार्केट आने का फ्योदोर दॉस्तोएव्स्की से                  क्या लेना देना। लेना देना है। दॉस्तोएव्स्की कहते हैं "अपनी नज़र उठा कर देखो, दिख जाएंगे वो लोग                      जिनके बच्चे दवा के अभाव में मर रहे हैं, जिनकी बीबियाँ भूख से मर रही हैं। अगर तुम्हारे पास साधन है                  तो उनकी मदद करो। अगर ऐसे लोगों की मदद नहीं करते तो समझ लो तुम एक साधन सम्पन्न भिखमंगे               हो। अब गरीब ढूंढने मैं पेरिस तो जाउंगी नहीं। इसीलिए इस मार्केट में चली आती हूँ। यहां मिल जाते हैं                   तमाम गरीब। (लापरवाही से) कर देती हूँ उनकी मदद। (ठंडी सांस ले कर) बड़ा सुकून मिलता है। सच                   पूछें तो इलीट सर्किल में मेरा सम्मान बढ़ता है। बड़े बड़े कार्यक्रमों में मुझे लोग मुख्य अतिथि बनाते हैं।                   उन कार्यक्रमों में भी मैं अच्छा ख़ासा डोनेशन देती हूँ। मुख्य अतिथि बनने की कुछ तो कीमत चुकानी होती               है। आखिर किसी गरीब को कोई मुख्य अतिथि क्यों बनाएगा ! भले ही गरीब कितना भी टैलेंटेड क्यों ना                   हो। फिर मैं गरीबों की मदद इसलिए भी करती हूँ क्यों के मैं साधन सम्पन्न भिखमंगन नहीं कहलाना                        चाहती। गरीबों का भी अजीब हाल है। उनकी जैसे जैसे मदद करो वैसे वैसे उनकी ख्वाहिशें बढ़ती जाती                 है। अभी जो वैले मेरी कार पार्क करने ले गया है वो चाहता है के मैं उसे एक कार दिला दूँ। ऐसा भला कहीं              हो सकता है? चलिए बहुत बातें हो गईं। अब कुछ शॉपिंग कर ली जाए। (कुछ कदम इधर उधर चल कर                  ऐसा अभिनय करती है जैसे किसी दूकान के सामने पहुँच गई हो और काल्पनिक दुकानदार से बात करती               है) सुनो मुझे वो चाहिए और वो। चार गुच्छे उसका दे दो और दूकान में जितने भी गुलाब हैं सब चाहिए।                  नहीं नहीं। मुझे नीलक नहीं लेने। नीलक भी कोई फूल है। मुझे इसका ना रंग पसंद, ना खुशबू। हाँ वो लाल              सफेद ट्यूलिप भी चाहिए। बिल समेत ये सारे फूल मेरे मैंशन पर डेलिवर करवा दीजिए। (दर्शकों से) इतने              ढेर सारे फूलों से सजा वैरांडा जब मेरे पति मिस्टर फिलिप फैल देखेंगे तो खुश हो जाएंगे।      

             मेरे पति मिस्टर फिलिप। आयरन बैरन। एक बहुत अच्छे इंसान हैं। मैं कितना भी, कैसे भी खर्च कर दूँ,                  कभी नहीं पूछते। इसीलिए तो कहती हूँ के बहुत अच्छे इंसान हैं। उनका सौंदर्य बोध गज़ब का है। और                    उनका नसीब देखो, के मुझ जैसी साधारण से नैन नक्श वाली लड़की से उनका विवाह हुआ है। वैसे ऐसी                  बुरी भी नहीं हूँ मैं देखने सुनंने में। उन्हें एक से एक स्लीक, एलिगेंट सी, किसी हॉलीवुड फिल्म की हीरोइन                टाइप लड़की मिल सकती थी। कभी किसी पार्टी में, जब कनखियों से उन्हें किसी खूबसूरत महिला को                   निहारता देखती हूँ तो मेरे तन बदन में आग लग जाती है। पता नहीं ये जलन है या सेंस ऑफ़ इंसेक्यूरिटी।                 क्या करूँ ? जो है सो है। अरे ! वो देखिये ! जॉनसन कितने तेज़ क़दमों से डग भरता हुआ मेरी तरफ चला              आ रहा है। जोहन्सsssssssन। ऐंटीक शॉप का सेल्समेन। अभी मेरे पास आकर पहले मुझे फ्लैटर करेगा,                   फिर मुझे कोई एंटीक चीज़ दिखाएगा, कहेगा (सेल्समैन के अंदाज़ में)"मैडम। आप तो जानती हैं, मुझे                     अपनी चीज़ों से कितनी मुहब्बत है। मैं अपनी चीज़ें कभी भी उस शख्स को नहीं बेचता हूँ जो उनकी कद्र                 नहीं जानता। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिनका टेस्ट आप जैसा रिफाइंड हो। (अपने खुद के अंदाज़ में)                  वेल मिस्टर जॉनसन ! आज क्या दिखा रहे  हैं ? (सेल्समेन के अंदाज़ में) ये देखिए ये ज्वेलरी बॉक्स जो                      रशिआ के आखिरी ज़ार निकलस द्वितीय ने अपनी ज़रीना को दिया था। (अपने खुद के अंदाज़ में) और                     उसके बाद रशिआ में क्रान्ति हो गई। क्रांतिकारियों ने ज़ार और उसके परिवार को सज़ा-इ-मौत दे दी।                   (सेल्समेन के अंदाज़ में) जी मैडम। आपको तो इतिहास का बेजोड़ ज्ञान है। एक आप ही तो हैं जो इस                     ज्वेलरी बॉक्स की वैल्यू समझ सकती हैं। आप के अलावा ये बॉक्स मैंने किसी को दिखाया ही नहीं। पैक                   कर दूँ ? (अपने अंदाज़ में) नहीं। (सेल्समैन के अंदाज़ में, जैसे उसे अपने कान पर यकीन ही ना हुआ हो)                 जी मैडम? (अपने अंदाज़ में) मैंने कहा नहीं। इसे पैक करने की कोई ज़रूरत नहीं। (सेल्समेन के अंदाज़                  में) तो क्या मैडम इसे बिना पैकिंग के ले जाएंगी ? हाथ में झुलाते हुए। लोगों को दिखा दिखा कर जलाते                   हुए ! what an idea madam ! (अपने अंदाज़ में) जिस तोहफे का इतिहास खून से सना हो, वो तोहफा मैं                 कभी नहीं खरीद सकती।  (सेल्समेन के अंदाज़ में ) ले लीजिये ना मैडम ! प्लीज! (अपने अंदाज़ में) no !                   नेवर! और बेचारा अपना मन मसोसते हुए वापस लौट गया। अरे ये क्या ! बरसात शुरू हो गई। (अपने                      हैंडबैग से छाता निकालते हुए) लंदन की बरसात का क्या है ऐतबार (छाता खोल कर लगाती है)                              शाम की चमक पर जब घटाओं की कालिमा छाती है तो सब कुछ कितना उदास लगाने लगता है।                        चमचमाते स्ट्रीट लैंप भी बुझे बुझे से लगाने लगते हैं जैसे किसी बात का अफ़सोस मना रहे हों। बस जल्दी                से घर पहुंचना  है और गर्मागर्म चाय का प्याला गले से नीचे उतारना है। अरे! ये मेरे बगल में आ कर कौन                खड़ा हो गया ? एक लड़की। जवान। दुबली पतली। मेरी ही उम्र की। ना हैट ना छाता। बरसात में एक दम             भीगी भागी सी। यक ब यक से कहाँ से आ गई ये? शायद मुझसे कुछ कहना चाहती है। सुनूं। देखूं क्या                     कहती है। (उस लड़की के अंदाज़ में) मैडम क्या मैं आपसे कुछ कह सकती हूँ? क्या आप मुझे एक प्याली               चाय के पैसे दे सकती हैं ? इस बरसात में मैं भी एक प्याली चाय पी लूंगी। (अपने अंदाज़ में) कुछ भी हो ये               आवाज़ मुझे किसी भिखारन की तो नहीं लग रही है। (उत्साह से) अरे वाह ! इसके पास एक प्याली चाय के             भी पैसे नहीं है।  कितनी निराली बात है ! अद्भुत ! कितना रोमांचक है ये सब ! ऐसा लग रहा है जैसे                      दोस्तोवस्की के उपन्यास का कोई पात्र  निकल कर शाम के इस धुंधलके में मेरे सामने खड़ा हो। मान लो                अगर मैं इसे अपने घर ले जाऊं तो ? मान लो अगर मैं इस लड़की के साथ वो सब करूँ जिसके बारे में मैं                उपन्यासों में पढ़ती आई हूँ या नाटकों में देखती आई हूँ ? कितना रोमांचक होगा ना ये सब ! मेरी सभी                      सखियाँ विस्मित हो कर सुनेंगी जब मैं उन्हें बताउंगी के कैसे मैं इसे घर ले गई। कैसे इसको अपनी टी टेबल              पर, उसी गोल टी टेबल पर जो मैंने स्पेशली मिस्टर फिलिप और अपने चाय पीने के लिए बनवाई थी, उस                पर उसको चाय सर्व करवाई। (उस लड़की से) सुनो लड़की। क्या तुम मेरे साथ मेरे घर चल कर चाय पीना              पसंद करोगी ? अरे !तुम तो घबड़ा गई ! अरे भाई मैं सच कह रही हूँ। चलो मेरे साथ। मेरे घर। मेरी कार में              बैठ कर। वहां मेरे साथ एक प्याली चाय पीना। उसे लगा मैं उसे पुलिस के हवाले करने जा  रही हूँ। (हंसती             है) अरे भाई मैं तुम्हें पुलिस के हवाले क्यों करुँगी ? क्या मैं तुम्हें इतनी निर्दयी लगाती हूँ ? मैं बस इतना चाहती           हूँ के तुम  चल कर एक प्याली चाय पी  मुझे खुश कर दो। साथ साथ मैं तुमसे तुम्हारी दर्द भरी दास्ताँ सुनूंगी।           भूखे लोग भरे पेट वालों की बातों में आसानी से आ जाते हैं। सो वो भी आ गई। ना केवल मेरी बातों में, मेरे               पंजे में भी। वैले मेरी कार ले आया और कुछ ही पलों बाद हम दोनों बारिश की उस शाम के धुंधलके को                 चीरते हुए उड़ते चले जा रहे थे। आज इस लड़की को समझ आ जाएगा के जीवन में चमत्कार भी होते हैं।                आज साबित कर दूँगी के परीकथाएं सच होती हैं। वो परी वास्तविक थी जिसने राखी को राजकुमारी में बदल            दिया था। आज इसको भी समझ आ जायेगा के पैसे वालों के पास भी दिल होता है, सारी औरतें आपस में                बहनें होती हैं। 

        कार मेरे मेंशन पर जा कर रूकती है। फुटमैन दौड़ कर आता है और दरवाज़ा खोलता है। वो फटी फटी                आँखों से ये सब देख रही थी। उसके लिए ये सब कल्पना से परे था। वो कैसे यकीन करे के जिस शहर में वो            रहती है वहां लोगों के पास इतने बड़े बड़े घर भी हो सकते हैं जहां ठंड की ठिठुरन नहीं, सुविधाओं की गर्मी            होती है। जहां बारिश नहीं टपकती, फव्वारे झिलमिलाते हैं। 

        आओ अंदर आओ। अरे वहां क्यों रुक गई ? अरे डरो नहीं। आ जाओ। आओ मैं तुम्हें अपना बैडरूम                      दिखाती हूँ।  आओ चली आओ, अरे अंदर आओ भी। (हाथ खींच कर अंदर लाती है) ये देखो मेरा बैडरूम।              क्यों पसंद नहीं आया? तो फिर ऐसे टुकुर टुकुर क्यों देख रही हो ? ये देखो ये पर्दे। ये मैंने जर्मनी से मंगवाए थे।        लाख से रोगन किया हुआ मेरा ये फर्नीचर और उसपर पड़े ये सुनहरे कुशन, फर्श पर पड़ा ये नीला पीला                  गलीचा और इस सब को गर्म रखती मेरी फायर प्लेस की लपटें। तुम्हें सब पसंद आ रहा है ना। बारिश में भीगे          तुम्हारे बाल कितने खूबसूरत लग रहे हैं। अगर तुमने हैट पहनी होती तो ये मज़ा कहाँ मिलता। मेरा भी दिल              करता है के बगैर हैट के बाहर निकलूं, कभी बारिश तो कभी धूप का एहसास करूँ, लेकिन कर नहीं सकती।          आखिर स्टेटस भी तो कोई चीज़ है। लाओ मैं तुम्हारा कोट उतार दूँ। (उसका कोट उतारती है। चेहरे पर ऐसे             भाव जैसे उसे उसके कोट से घिन आ रही हो। उसका वो कोट ज़मीन पर गिरा देती है) मैं तुम्हारे साथ बहुत             दया भाव से पेश आ रही हूँ ना। बताना लोगों से के मैंने तुम पर कितनी दया दिखाई। क्या ? क्या कह रही                 हो?  तुम्हें अगर जल्दी ही कुछ खाने को ना मिला तो बेहोश हो जाओगी ! हे भगवान्। मैं भी कितनी लापरवाह           हूँ। सबसे पहले तुम्हें चाय पिलानी चाहिए थी। (नौकर को बुलाने के लिए ताली बजाती है।  ऐसा अभिनय                   करती है जैसे जैक नामक नौकर आया हो ) जैक। एक कप चाय। जल्दी। थोड़ी ब्रांडी। तुरंत। (लड़की से)               अरे तुम तो रोने लगी ? रो क्यों रही हो ? क्या तुम ब्रांडी कभी नहीं पीती ? सिर्फ चाय पियोगी ? तो इसमें रोने           की क्या  बात है ? मत परेशान हो। आखिर हम दोनों औरत हैं। औरत ही औरत के साथ खड़ी होती है। मैं                 तुम्हारी देखभाल करुँगी। अब कभी रोना मत। ज़रा सोचो कितनी अच्छी बात है के तुम्हारी मुझसे मुलाक़ात             हुई। अभी हम तुम दोनों बैठ कर चाय पर चर्चा करेंगे। तुम मुझे अपने बारे में सब कुछ बताओगी। मैं वादा               करती हूँ के मैं तुम्हारे लिए कुछ ना कुछ इंतज़ाम ज़रूर करुँगी। अब रोना बंद करो। देखो जैक चाय ले आया।         मैं अपने हाथ से तुम्हें सर्वे करती हूँ। (प्लेट उठा कर देने का अभिनय करती है) लो ये सैंडविचेस ट्राई करो।               इसमें ढेर सारा मख्खन लगा है जो तुम्हें शक्ति देगा। खाओ खाओ। लो और लो। अब ले भी लो। ज़्यादा                    शर्माओ नहीं। लाओ मैं चाय ढाल देती हूँ। (कप में शुगर क्यूब डालने का अभिनय करती है) मैंने चार क्यूब              डाल दिए हैं। कहते हैं शक़्कर ताज़गी देती है। (केतली से चाय ढालने का अभिनय करती है।फिर दूध डालने           का।  फिर चमचे से सब कुछ मिक्स  करने का। चाय लड़की को ऑफर करती है) लो चाय पियो। (वक्फा) पसंद      आई ? ये बताओ आज से पहले तुमने आखिरी बार भर पेट खाना कब खाया था ? (चौंक कर) अरे लगता है मेरे        हस्बैंड मिस्टर फिलिप आ गए। तुम यही रुको मैं उनका वेलकम कर के अभी आती हूँ। (उठकर दरवाज़े तक          जाने का अभिनय करती है, इस कमरे कमरे का दरवाज़ा भेड़ति है। नॉब घुमा कर दूसरे कमरे का दरवाज़ा               खोलती है। ) हाय डार्लिंग। क्या ? मेरे बताने से पहले ही नौकरों ने तुम्हें सब कुछ बता दिया। नहीं तुम उससे             नहीं मिल सकते। वो घबड़ा जाएगी। बस उसकी एक झलक देखना चाहते हो ? (दरवाज़ा खोलने का अभिनय           करती है ) लो दूर से उसे देख लो। बस देख लिया ? (दरवाज़ा बंद करने का उपक्रम करती है ) (व्यंग्य से) ना           मेरा हाल पुछा चाल ! एक दम से दो दो सवाल दाग दिए। (बनावटी अंदाज़ में) बताओ कौन है ये? और इस            सबका क्या मतलब है ? (हँसते हुए) अरे मैंने उसे curzon स्ट्रीट से उठाया है। उसने मुझसे एक चाय की डिमांड      की, तो मैं उसे घर ले आई। मैं क्या करुँगी उसका ? अरे मैं उसके साथ अच्छा व्यवहार करुँगी। उसका ख्याल          रखूंगी। कैसे, ये मैं नहीं जानती अभी इसके बारे में कुछ सोचा नहीं है। (भड़कते हुए) क्यों मैं पागल क्यों हूँ? मुझे        मालूम था के तुम ऐसा ही कुछ कहोगे। .........  ये सब हो क्यों नहीं सकता ? ये सब हो सकता है क्यों के मैं ये सब      करना चाहती हूँ। मैंने दॉस्तोएव्स्की के उपन्यासों में ऐसा होता पढ़ा है। इसीलिए मैंने फैसला किया है                        की.....क्या?....तुम झूठ बोल रहे हो। (गुस्से में) तुमने आज तक मेरी खूबसूरती की तारीफ नहीं की और                   आज........आज उस भिखारन के सौंदर्य की तारीफ कर रहे हो ?.....क्यों ना कहूँ उसे भिखारन? भीख मांगते हुए       ही तो मेरे पास आई थी !.......  तुम उसे देखते ही उसपर मोहित हो गए? तुम्हें शर्म नहीं आती एक क्लासी लेडी         की जो की खुद तुम्हारी पत्नी है उसकी तुलना एक वल्गर क्लास की औरत से कर रहे हो?.....  भले दोस्तोवस्की         कुछ भी लिखे, ये क्लास डिफरेंस कभी खत्म ना होगा। इलीट इलीट रहेगा और वल्गर वल्गर। कहाँ चल दिए ?         मेरे आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा कर तुम यूं नहीं जा सकते। ......चला गया। अब सीधा लाइब्रेरी में जा कर सिगार       फूंकेगा। कह रहा था के वो मुझसे भी ज़्यादा खूबसूरत है। झूठ बोलता है। (सोचते हुए) लेकिन अगर उसने सच       कहा हो तो ? वो तो मैं थी जिसने उसपर दया दिखाई। लेकिन अब..... अब लगता है.... वो मेरी दया नहीं, मेरे           आत्मसम्मान को छू गई। (धीरे से बैठ जाती है) उसकी आँखों में...... कुछ और था। भूख के अलावा.... शायद           आत्मविश्वास ? या...वो चीज़ जो मुझे डराती है। (खड़ी होती है। तेज़  स्वर में खुद से-बेचैनी के साथ तेज़ क़दमों से        इधर उधर टहलते हुए ) फिलिप को क्या लगा होगा.....कि मैं बस दिखावा करती हूँ? नहीं, मैं सच में भली                  हूँ...या...हूँ क्या? रुको पहले उसे भगाती हूँ अपने घर से। (दरवाज़े का नॉब खोल कर कमरे के अंदर जाने का          अभिनय करती है) (गुस्से से) लड़की। तुम निकालो यहां से ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई एक भिखारन होते हुए            मुझसे ज़्यादा सुंदर दिखने की। (पर्स खोल कर रुपए निकाल कर हिकारत से ज़मीन पर फेंकती है) उठाओ ये         रूपए और कुछ खा लेना। (हैरत से) चली गई? और ये रूपए भी नहीं ले गई !

                                                      इति  

    

Thursday, April 14, 2022

                                                            प्रोफ़ाइल नीरज हेस्टिंग्स

अभिनेता , निर्देशक एवं लेखक

शिक्षा :- MA . English कानपुर विश्विद्यालय

व्यवसाय :- प्रिंसिपल गुरुकुल स्टेप्स स्कूल

दूरभाष :- ९९५६६८५१४९

ईमेल :- neerajneeraj123123123@gmail.com

नाट्यांदोलन से जुड़ाव :- विगत 61 वर्ष

प्रथम नाटक :- ४ वर्ष की आयु में

अब तक हिंदी और अंग्रेजी मिला कर लगभग २० से ऊपर नाटक

सम्मान : ईप्टा कानपुर द्वारा 'नाट्य गुरु सम्मान

               अनुकृति रंग मण्डल द्वारा सम्मान

कुछ निर्देशित नाटक:- (१) एक भ्र्मजाल 
                                  (२) एक कहानी 
                                  (३) आज का हातिमताई 
                                  (४) बकरी 
                                  (५) सुजाता माने पैसा 
                                  (६ ) शक 
                                   
                                  ( ७ ) जब मैं हूँ तो शूटिंग रुक नहीं सकती 
                                  (८  ) दिल की दूकान 
                                  (९  ) उधार का पति 
                                  (१०   ) प्रमोशन 
                                  (११ ) ४२ साल ८ महीने ७ दिन (मंटो की कहानियों का कोलाज)
                                  (१२  ) हस्बैंड एक्सचेंज 
                                  (१३  ) साठवां सावन 
                                  (१४) स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास 
                                  (१५ ) दिल ही एक्सप्रेस 
                                   (१६) दूसरा आदमी दूसरी औरत  
                                  (१७) The Known stranger     (English)
                                  (१८ ) Distant Relative            (English )
                                  (१९) Crimson Cocoanut       (English )
                                  (२०) Then There Were None (English)
                                  (२१) Lithuania                       (English )
                                  (२२) My Fair Lady                (English)
                                  (२३ ) The Sound Of Music    (English)
 



             
पुरस्कार : रामनगर नाट्य प्रतियोगिता में श्रेष्ठ निर्देशक

                 रामपुर नाट्य प्रतियोगिता में नाटक 'प्रमोशन' प्रथम पुरस्कार

लेखन:-
            प्रकाशित नाटक "डॉन के घर में कौन " "पलटवार" 

             कोहरा, जाल, माता मरियम, Darcy And The Dead, हस्बैंड एक्सचेंज, साठवां सावन, दिल ही एक्सप्रेस,                 वो रात, (अप्रकाशित  किन्तु मंचित ), 

लघु नाटिका :- गिरगिटानी जूते 
                      स्वतन्त्रा संग्राम की कहानी 
                      

नुक्क्ड़ नाटक लेखन :- बीपीएल के देश में आई पी एल (पुरस्कृत )
                                   हम कोम्प्रोमाईज़ क्यों करे       (पुरस्कृत)
                                   ये है इंडिया, यहां सब चलता है    (पुरुस्कृत)
                                   शोषण मीडिया                           (पुरुस्कृत

नावेल (अंग्रेजी) My First (ऑनलाइन प्रकाशित एवं अमेज़न पर उपलब्ध

                         Strange Love (अभी काम चल रहा है )

फिल्म अभिनय :-  (भोजपुरी) बच्चू पांडे

अन्य :-
                एडवेंचर स्पोर्ट्स , ट्रेकिंग

 नाटक : स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास 


कोरस :-  देखो सुनलो समझो जानो 

                भारत की कहानी। 

                 एक गुलामी की कहानी और क्रान्ति की कहानी 

                  फिर आज़ादी की कहानी। 

                   देखो सुनलो समझो जानो ________


                    गोरों के काले जुलम  की कहानी 

                    अंग्रेजों के बढ़ते सितम की कहानी 

                    व्यभिचारों की कहानी अत्याचारों की कहानी 

                     गद्दारों की कहानी। 

                     देखो सुनलो समझो जानो ________


                      बूट से कुचले किसन की कहानी 

                      जूतों से रौंधी फसल की कहानी 

                       जन जन की कहानी जन गण की कहानी 

                       जन तंत्र की कहानी 

                         देखो सुनलो समझो जानो _________


                         क्रान्ति की सुलगती शमा की कहानी 

                          बगावत के उठते धुआं की कहानी 

                          देश भक्तों की कहानी राष्ट्र भक्तों की कहानी 

                          हम सब की कहानी 

                          देखो सुनलो समझो जानो _________


सारे कलाकार फ्रीज़ हो जाते हैं। मलंग  अपनी ढप पर एक ठेका लगाता है। तभी कलाकार १ और मलंग को छोड़ कर बाकी कलाकार एक भीड़ में बदल जाते हैं और नारा लगाते हैं। 


भीड़ :- हमें चाहिए आज़ादी 

             हर एक वाद से आज़ादी 

               हम क्या मांगें आज़ादी 

              तुम क्या मांगो आज़ादी 

               ये क्या मांगे आज़ादी 

                वो क्या मांगे आज़ादी 

                 सब क्या मांगें आज़ादी 

कलाकार १ उन्हें हैरत से देखता है। भीड़ बाहर निकल जाती है। 

कलाकार १:- (मलंग से) मलंग चाचा। अपना देश तो आज़ाद है। 

मलंग: हाँ बेटा आज़ाद है। 

कलाकार १:- तो फिर आज़ाद देश के ये नागरिक किस्से आज़ादी मांग रहे हैं और क्यों? 

मलंग :- ये तो इनको भी नहीं पता। 

कलाकार १:- क्या इनको ही नहीं पता फिर भी ये मांग रहे हैं ?

मलंग :- हाँ। क्यों के ये मानसिक गुलाम हैं उन ताकतों के जो इस देश में अस्थिरता पैदा कर हमें फिर से गुलाम                  बनाने के लिए काम कर रही हैं। इन्हें क्या पता के ये आज़ादी हमें कैसे मिली है और इसकी हमने क्या                    कीमत चुकाई है। कितने शहीदों ने गोलियां खाईं और कितने फांसी चढ़ गए। आज़ाद भारत में पैदा हुए हैं                 ना। इसी लिए मोटाई सवार है। अंग्रेजों की दासता में पैदा हुए होते और उनके कोड़े खाए होते तो समझ में               आता आज़ादी क्या होती है। 

कलाकार १ :- मलंग चाचा हमें भी बताइये के हमें ये आज़ादी कैसे मिली। 

मलंग :-  (ढप बजा कर गाता है) बीत गए शत वर्ष उठा था जनमत भारत वर्ष में 

                                                मातृ ज्योति पर जल मरने को बढ़े पतंगे हर्ष में 

                                               सन सत्रह सौ सत्तावन में गोरी शक्ति प्रतीत हुई 

                                                      (पार्श्व में बूटों की आवाज़ )

                                               जहां लड़े दो भारतवासी गोरी शक्ति जीत गई। 

दोनों फ्रीज़ हो  जाते हैं। एक तरफ से किसन गुस्से में आता है और कासिम को आवाज़ देता है। 

किसन :- कासिम अबे कासिम। बाहर निकल 

कासिम :- (दूसरी तरफ से आता है ) क्या है किसन क्यों चिल्ला रहे हो ?

किसन :- अबे तूने मेरा कबूतर कैसे पकड़ लिया ?

कासिम :- मेरे अड्डे पर आ कर बैठा मैंने पकड़ लिया। 

किसन :- मेरा कबूतर वापस कर। 

कासिम :- जिसका अड्डा उसका कबूतर। 

 किसन :- देख बे कासिम, कबूतर वापस कर नहीं तो बहुत बुरा हो जाएगा 

कासिम :- चाहे जितना भी बुरा हो जाए कबूतर वापस नहीं होगा।  

किसन :- इतने सालों की दोस्ती एक मिनट में मिटटी में मिल जायेगी 

कासिम :- दोस्ती जाए चूल्हे भाड़ में, कबूतर नहीं मिलेगा 

किसन :- (कासिम का  गला पकड़ लेता है ) कबूतर तो तुझे देना पड़ेगा। 

कासिम :- (किसन का गला पकड़ लेता है) गला छोड़। 

किसन :- कबूतर वापस कर 

कासिम :- गला छोड़ 

              कमल आता है 

कमल :- अरे अरे अरे।  यहां तुम दोनों आपस में लड़ रहे हो और वहां अंग्रेज अपने गाँव की तरफ आ रहा है। 

कासिम :- तो क्या करें ?

कमल :- अरे चलो मिल कर उस अंग्रेज से लड़ें। वरना वो अपने गाँव पर कब्ज़ा कर लेगा। 

किसन :- पहले मेरा कबूतर 

कमल :- अरे कबूतर तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन अगर आज गाँव चला गया तो कल देश चला जाएगा। 

कासिम :- गाँव जाए चाहे देश।  कबूतर तो नहीं दूंगा। 

किसन :- कबूतर तो मेरा है 

कासिम :- मैंने पकड़ा मेरा है। 

कमल :- जा कर देखता हूँ शायद कोई और मिल जाए अंग्रेज से लड़ने के लिए। 

                         कमल निकल जाता है 

किसन :- मैं कह रहा हूँ कबूतर मुझे दे दे 

कासिम :- नहीं दूंगा 

               अंग्रेज अफसर का हिन्दुस्तानी सिपाही के साथ प्रवेश 

अंग्रेज :- ए तुम काला आदमी लोग, आपस में क्यों लड़ता है ?

किसन :- साहब ये मेरा कबूतर नहीं दे रहा 

कासिम :- साहब मैंने पकड़ा है कबूतर मेरा है। 

अंग्रेज :- ओह समझा।  (किसन को एक तरफ ले जा कर) वो कबूतर तुम्हारा है। तुम्हे उससे लड़ कर वापस लेना                 चाहिए। 

किसन :- वही तो कर रहा हूँ साहब। 

अंग्रेज :- गुड। तुम अच्छा आदमी है। तुम लड़ो हम तुम्हारा साथ देगा। 

किसन :- मेहरबानी साहब। 

अंग्रेज :- (पिस्तौल देते हुए) तुम ये गन रखो।  एंड शूट हिम। उसको गोली मार दो। 

किसन :- जी  साहब। 

अंग्रेज :- दो मिनट रुको। उससे कहता हूँ के अगर जान बचानी है तो तुम्हारा कबूतर तुम्हे वापस कर दे। 

                    कासिम के पास आता है 

अंग्रेज :- मैंने उसको बोला के कबूतर भूल जाए बट वो नहीं मान रहा 

कासिम :- फिर ?

अंग्रेज :- तुम अच्छा आदमी है। तुम लड़ो हम तुम्हारा साथ देगा। 

कासिम :- मेहरबानी साहब। 

अंग्रेज :- (पिस्तौल देते हुए) तुम ये गन रखो। एन्ड शूट हिम। उसको गोली मार दो। 

कासिम :- जी साहब। 

किसन :- (कासिम पर गन तानते हुए) कासिम मेरा कबूतर वापस कर 

कासिम :- कबूतर मेरा है मैंने पकड़ा है 

    दोनों एक दुसरे पर गोली चलाते है और दोनों गिर कर मर जाते हैं। अंग्रेज ठहाका लगाता है 

अंग्रेज :- देखा कैसा बेवकूफ आदमी होता है ये काला  लोग। कबूतर के लिए तो लड़ गया लेकिन मुल्क के लिए                   नहीं लड़ता है। ऐसा बेवकूफ लोगों की मदद से हम इस मुल्क पर कब्ज़ा करेगा 

                                      बाहर निकल जाता है                                         

मलंग :- ठीक इसी तरह से अंग्रेजो ने रजवाड़ों को आपस में लड़ाया। हर राजा ये समझता रहा के अंग्रेज उनके                    साथ है लेकिन अंग्रेज किसी के साथ नहीं बस अपनी धूर्तता के साथ था। 

            (गाता है) राजाओं नव्वाबों की इज़्ज़त 

                           लुटती थी सरे बाजार 

                           अंग्रेजो के परम सहायक 

                            थे स्वदेश के ही गद्दार 

पार्श्व से आवाज़:- सावधान। जन जन के प्रिय 

                           महाराज देव दत्त पधार रहे हैं। _____

एक तरफ सी महाराज देवदत्त अपने प्रधान मंत्री के संग प्रवेश करते हैं। 

देव दत्त :- ये अंग्रेज आखिर अपने आप को समझते क्या हैं ? देश हमारा, प्रजा हमारी आदेश उनका।  ये कैसे हो                   सकता है ? 

मंत्री :- महाराज हमारे आगे बस दो ही विकल्प हैं। या तो युद्ध करें या उनकी बात मान लें 

देवदत्त :- जब राष्ट्र की अस्मिता की बात हो तो युद्ध अनिवार्य हो जाता है। 

मंत्री :- युद्ध मगर किस्से ? 

देवदत्त :- अंग्रेजो से। 

मंत्री :- ये अंग्रेज बड़े ही धूर्त हैं महाराज। ये स्वयं लड़ने नहीं आएंगे। ये हमारे पडोसी राजा को भड़काएंगे।  अगर                 युद्ध हुआ तो मां भारती के लाल एक दूसरे को काटेंगे। अंग्रेज दूर खड़े खड़े मुस्कायेंगे। दोनों ही तरफ की              फसलें जल चुकी होंगी। खेत लहू लुहान खड़े होंगे।  आर्थिक रूप से दोनों ही तरफ असीमित क्षति हो चुकी              होगी महाराज। प्रजा भूखी मर रही होगी। 

देव दत्त :- तो फिर हम क्या करें ?

मंत्री :- ये युद्ध हमें इतना तोड़ देगा के अंतत: हमें अंग्रेजो की बात माँननी पड़ेगी। 

देव दत्त :- मतलब इन मलेच्छों के आगे समर्पण कर दूँ ? कभी नहीं। 

मंत्री :- प्रश्न आपके समर्पण का नहीं है। प्रश्न प्रजा की रक्षा का है। 

देव दत्त :- कोई तो रास्ता होगा ?

मंत्री :- रास्ता है महाराज। लेकिन कारगर नहीं होगा। 

देव दत्त:- क्या रास्ता है ?

मंत्री :- अगर दोनों पड़ोसी राज्य आपस में युद्ध करने के बजाए अंग्रेजो से युद्ध करें। 

देव दत्त :- हमारा पड़ोसी ये बात मानेगा ?

मंत्री :- यही तो बात है महाराज। वो नहीं मानेगा। आपको ले कर उसकी व्यक्तिगत ईर्ष्या इतनी है के आपको                    मिटाने के लिए वो खुद भी मिटने को तैयार है। 

देव दत्त :- यही तो इस देश का दुर्भाग्य है। हज़ारो किलोमीटर की यात्रा कर के आनेवाले गोरे हैं कितने ? मुट्ठीभर ?                  अगर हर भारतवासी इनके खिलाफ एक एक पत्थर भी उठा ले तो ये दुम दबा कर भाग जाएंगे। 

मंत्री :- मगर ये होगा नहीं। क्षुद्र अभिलाषाएं , महत्वाकांक्षाएं और ईर्ष्या की पूर्ती के अंधेपन ने हमें दोस्त और दुश्मन            में भेद करना भुला दिया। 

                         अंग्रेज अफसर का प्रवेश 

अंग्रेज :- लॉन्ग लिव द क्वीन योर हाइनेस। 

देवदत्त :- आइये।  

अंग्रेज :- वेल योर हाइनेस। जो प्रपोजल ब्रिटिश सरकार ने दिया था उस का क्या हुआ ?

देवदत्त :- उसपर अभी हम चिंतन कर रहे हैं। 

अंग्रेज :- चिंतन ? व्हाट चिंतन योर हाइनेस ? आपको चिंतन करने का अधिकार किसने दिया ? आपको हम                         हाइनेस बोलता है, इसका मतलब ये नहीं के आप हाइनेस हो गया। जो ब्रिटिश क्राउन बोला वो आपको                   करना मांगता । नो चिंतन। चिंतन करने का काम ब्रिटिश क्राउन का है। 

देवदत्त :- मगर _____

अंग्रेज :- व्हाट ? आप हमको मगर बोला ? ब्रिटिश क्राउन के रिप्रेजेन्टेटिव को मगर बोला ? हाउ  dare यू ? मगर                   बोलने का हिम्मत मतलब ब्रिटिश क्राउन से बगावत ? ब्रिटिश क्राउन अगर चाहे तो तुम्हारा ये पगड़ी                       अपने पैरों से उड़ा देगा योर हाइनेस। 

मंत्री :- साहब बहादुर। आप अन्यथा ना लें। आज महाराज ज़रा अस्वस्थ हैं। इसलिए इस प्रकार की चर्चा कर रहे हैं।           इधर आइये मैं आपको समझाता हूँ। (कोने में ले जा कर) महाराज पगला गया है। ये ऐसे नहीं मानेगा। आप             पड़ोसी  राजा की मदद से इसको नेस्तनाबूद कर मुझे यहां का राजा बना दें। फिर मैं बर्तानिया सरकार की             हर इच्छा पूरी करूँगा 

अंग्रेज :- ओके। यू आर एन इंटेलीजेंट मैन।  

                              Fade out 

मलंग :- (गाता है) बनी ईस्ट इण्डिया कंपनी 

                            व्यापारी से अब सरकार 

                             शासन दृढ़तर हुआ विदेशी 

                              कर स्वतंत्रता का संहार 

                               इसी तरह नीतिज्ञ विदेशी 

                               शनैः शनैः बढ़ते आए 

                               हमें परस्पर लड़ा लड़ा कर 

                               सब सर पर चढ़ते आए 

                                आठ सहस्त्र मील के वासी 

                                 सात समुन्द्र पार के जीव 

                                  घोषित हैं सम्राट देश के 

                                  व्यथित भारतीयता अतीव। 

                                   जाने लगी विलायत सम्पति 

                                    जलयानों में भर भर कर 

                                    कोष रिक्त कर गया देश का 

                                     शासन शोषित शोषण कर। 


अनाज मंडी का दृश्य।  हीरा अनाज लगा कर उदास बैठा है। मोती का प्रवेश। 

मोती :- बधाई हो हीरा भाई। 

हीरा :- किस बात की बधाई हीरा ?

मोती :- फसल जो इतनी बढ़िया हुई है। 

हीरा :- क्या फायदा इस बढ़िया फसल का जब बाजार में खरीददार ना हों 

मोती :- क्यों ? खरीददार क्यों नहीं हैं ?

हीरा :- लोगों के पास खरीद का पैसा नहीं है। ऐसी हालत कर दी है इन गोरों ने हम लोगों की। बाजार में माल है पर             खरीददार नहीं है। 

मोती :- लेकिन अंग्रेज तो भर भर कर खरीद कर रहे हैं 

हीरा :- कर रहे हैं लेकिन किस कीमत पर ? लागत से भी कम कीमत पर। ये अंग्रेज अपने देश के किसानो से                     कपास, रेशम, नील, शक़्कर, नमक, मसाले, चाय, अफीम सभी कुछ लागत से भी कम कीमत पर खरीद                 कर बड़े बड़े पानी के जहाजों पर  विलायत ले जाते हैं और अपने मुल्क को अमीर बनाते जा रहे हैं। और                 हमारे देश के किसान लागत ना मिलने से क़र्ज़ में डूबते जा रहे हैं। 

मोती :- तो मत बेचो उन्हें 

हीरा :- नहीं बेचें तो क्या करें ? घर में रख कर सड़ाएं ? उससे भी क्या फायदा होगा ?

मोती :- बात तो तुम ठीक कह रहे हो भाई। 

हीरा :- कुछ हो नहीं सकता इन अंग्रेजों का ?

मोती :- बस एक ही रास्ता है। इन गोरों को इस देश से भगाया जाए। 

हीरा :- मगर ये करेगा कौन ? 

मोती :- ये ही तो बड़ा सवाल है के करेगा कौन ? हमारे देश की छोटी छोटी रियासतें आपस में लड़ने के बजाए                    अगर मिल कर इन अंग्रेजों से लड़ें तो इन्हें आसानी से भगाया जा सकता है। 

हीरा :- इस देश को एक क्रान्ति की ज़रूरत है। 

मोती :- मगर ये क्रान्ति आएगी कैसे ?

हीरा :- अगर हिन्दुस्तान का एक एक मजदूर किसान इन अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हो जाए 

मोती :- अरे हम किसान किसानी करें या क्रान्ति ?

हीरा :- अगर हर किसान अपने हल को हथियार बना ले तो क्रान्ति हो जाए। 

मोती :- भूखे पेट क्रान्ति नहीं हुआ करती। 

हीरा :- क्रान्ति हमेशा भूखे पेट वालों ने ही की है। भरे पेट वालों को क्रान्ति की ज़रूरत ही नहीं। 

मोती :- छोड़ो भाई ये सब किताबी बातें हैं। यहां कोई क्रान्ति व्रांति नहीं होने वाली। 

हीरा :- होगी। क्रान्ति ज़रूर होगी। और दुनिया देखेगी के किस तरह  हिन्दुस्तानियों ने अंग्रेजो को अपने                             देश से मार भगाया। पूरे भारत में बस एक ही नारा गूंजेगा 'वन्दे मातरम'

मलंग :-      (गाता है) होते रहे मूक जनता पर 

                                  भांति भांति के अत्याचार 

                  एक अंग्रेज हिन्दुस्तानी पर कोड़े बरसाता है 

मलंग :-     (गाता है) पशुओं तुल्य निरंकुश गोरे 

                               बरत रहे थे निज अधिकार 

                                फलस्वरूप डलहौजी की,

                                 अपहरण नीति के भारतवर्ष 

                                  के राजाओं सरदारों 

                                   सामंतों में कुछ हुआ विमर्श 


राजा और सामंत इकट्ठा होते हैं 

पहला  राजा :- दोस्तों, ये डलहौजी की हड़प नीति जिसे ये लैप्स डॉक्ट्रिन कहता है के यदि कोई राजा निसंतान मर                           गया तो उसका राज्य उसके दत्तक पुत्र को ना मिल कर कम्पनी राज्य में मिला लिया जाता है। इसी                         हड़प नीति के अंतर्गत अब तक मांडवी, कोलाबा, जालौन और सूरत कम्पनी राज्य में मिलाया जा                           चुका है। 

दूसरा राजा :- और अब सतारा, उदयपुर और झांसी की बारी है 

तीसरा राजा :- इस तरह तो ये अंग्रेज कोई ना कोई कानून ला कर पूरे भारत वर्ष पर कब्ज़ा कर लेंगे। 

चौथा राजा :- और हम सब अपने ही देश में गुलाम बन कर रह जाएंगे। 

पहला राजा :- हमारे पास बस दो ही रास्ते हैं। गोरों के इस अत्याचार को स्वीकार करें या उसका प्रतिकार करें। 

दूसरा राजा :- हम प्रतिकार करेंगे। 

तीसरा राजा :- क्या प्रतिकार इतना आसान होगा। 

पहला राजा :- आसान तो बस एक ही चीज़ है, दासता की बेड़ी को खुद ही धारण कर लेना। प्रतिकार सदा ही                                मुश्किल होता है, इसीलिए करने योग्य होता है। 

चौथा राजा :- अब समय आ गया है के हम निर्णय करें के हम सम्मान से सर उठा कर जियें या फिर इनकी दासता                         में अपना शेष जीवन काट दें। 

पहला राजा :- आप गलत समझ रहे हैं बंधु। प्रश्न हमारे मान सम्मान का नहीं मां भारती के सम्मान का है। क्या हम                          अपनी मातृ भूमि को इन फिरंगियों के बूटों तले कुचला जाना देख पाएंगे ? या फिर अपनी जन्म भूमि                         के लिए अपने प्राणों का उतसर्ग कर देंगे ?

दूसरा राजा :- हम अपने मादरे वतन को इन फिरंगियों से आज़ाद करेंगे। चाहे इसके लिए हमें अपनी जान भी क्यों                       ना कुर्बान करनी पड़े। 

तीसरा राजा :- हम जान देने के लिए नहीं इन फिरंगियों की जान लेने के लिए लड़ेंगे। 

पहला राजा :- जान लेना या देना हमारा मकसद नहीं होगा। हमारा मकसद होगा आजादी। इन अंग्रेजों से आजादी।                     और इसके लिए हमें जन जन तक अपनी बात पहुंचनी होगी। इस आंदोलन को हमें जन आंदोलन                            बनाना होगा।  

तीसरा राजा :- लेकिन हम अपनी बात जन जन तक पहुंचाएंगे कैसे ?

पहला राजा :- रोटी और कमल 

चौथा राजा :- क्या ? रोटी और कमल ?मैं समझा नहीं ?

पहला राजा :- रोटी हमारे पेट की भूख शांत करती है तो देव पुष्प कमल हमारी आत्मा की भूख शांत करता है। हम                        जन जन तक क्रान्ति का संदेश रोटी और कमल के माध्यम से पहुंचाएंगे। 

दूसरा राजा :- लेकिन रोटी और कमल जन जन तक ले कौन जाएगा ?

पहला राजा :- हमारे साधू और सन्यासी जो हमेशा पूरे भारत का भ्रमण करते रहते हैं, पुलिस चौकीदार, और ऐसे                         हीअन्य राष्ट्र भक्त। जो भी एक रोटी स्वीकार करेगा, उसकी ये ज़िम्मेदारी होगी के बदले में वो वैसी                        ही रोटियां तैयार करे और आस पास के गावों में बांटे। ये रोटियां अंग्रेज़ों की डाक से भी तेज़ गति से                       लोगों तक पहुंचाई जाएंगी। करीब ३०० मील प्रति रात्रि की गति से। इस प्रकार शीघ्र ही हमारी क्रान्ति                       का यह संदेश नर्मदा से नेपाल, फर्रुखाबाद से गुड़गांव, अवध से दिल्ली तक पहुंच जाएगा। 

तीसरा राजा :- क्या हिन्दू क्या मुसलमान। सभी इस सशस्त्र क्रान्ति का हिस्सा बनेंगे। 

चौथा राजा :- हमारा नारा होगा 

सभी :- "दिल्ली चलो" 


मलंग :-               (गाता है) हिन्दू मुस्लिम एक हो गए 

                                          आयोजित करने को क्रान्ति 

                                            दिखलाई देती प्रत्यक्ष ही 

                                            हाहाकार पूर्व की शान्ति 

                                             रोटी और कमल के निश्चित 

                                             गोपनीय हो गए निशान 

                                             इकतीस मई अट्ठारह सौ 

                                             सत्तावन का दिन निश्चित मान 

                                              लगी परस्पर होड़ 

                                              भारतियों की हरषोतकर्ष में 

                                               बीत गए शतवर्ष उठा था 

                                                जनमत भारत वर्ष में 

                                                 सन छप्पन में डलहौजी की 

                                                 जगह लार्ड केनिंग आया 

                                                  अपने पुरखों के समान ही 

                                                   जाल निरंतर फैलाया 

                                                    हिन्दुस्तानी सेनाओं में 

                                                    भाँती भाँति से हुआ प्रचार 

                                                     अंग्रेजों का जुआ देश 

                                                       कंधों से देगा उतार 

                                                       चर्बी लगे कारतूसों का 

                                                       निश्चित वर्जित हुआ प्रयोग 

                                                       बैरकपुर में इस कारण ही 

                                                        घटित हुआ पहला संयोग 



कुछ सिपाही आपस में चर्चा कर रहे हैं 

सिपाही १:- ये ज़्यादती है। ये हम सब का धर्म भ्र्ष्ट करने की साज़िश है 

सिपाही २:- ये जो नई एनफील्ड बन्दूक अंग्रेजों ने हम हम सब सिपाहियों को दी है इसमें कारतूस डालने से पहले                      उसे दांत से काटा जाता है। 

सिपाही ३:- भाइयों उस कारतूस को गाय  और सुवर की चर्बी से चिकना किया गया है 

सिपाही ४:- गाय हमारी माता है। हम गाय की चर्बी वाला कारतूस मुँह से नहीं काटेंगे 

सिपाही २:- सुवर हम मुसलमानो के लिए हराम है। हम सुवर लगी चर्बी को मुँह से नहीं काटेंगे। 

सिपाही १ :- अपने धर्म की रक्षा के लिए हम कुछ भी करेंगे लेकिन अपना धर्म भ्र्ष्ट नहीं होने देंगे। 

सिपाही ३ :- इसके लिए अगर हमें बगावत भी करनी पड़े तो हम करेंगे। 

सभी :- हाँ हम बगावत करेंगे। 

सिपाही ५ का प्रवेश 

सिपाही ५:- साथियों कुछ सुना तुम लोगों ने ?

सभी :- क्या ?

सिपाही ५ :- बैरकपुर में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सिपाही ह्यूसन को गोली मार दी और बगावत शुरू कर दी। 

सिपाही ४ :- सच ?

सिपाही ५:- हाँ 

सभी :- मगल पांडे ज़िंदाबाद। 

सिपाही :- उसे गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई। 

सभी :- मंगल पांडे अमर रहे। 

सिपाही ५:- साथियों मंगल पांडे की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। यहां मेरठ में भी हम अंग्रेजो के खिलाफ                              बगावत करेंगे। इनसे अपने देश को आज़ाद करेंगे। 

सभी :- हाँ अपने देश को आज़ाद करेंगे। 

सिपाही ५:- जो हथियार आज तक हम अग्रेजो के लिए उठाते आए आज वो हथियार हम अपने देश के लिए                               उठाएंगे। ये हमारी बगावत नहीं जंग ए आज़ादी होगा। 

सिपाही १ :- लेकिन तुम्हें नहीं लगता के मंगल पांडे जल्दी कर गया ? तुम्हे नहीं लगता के अभी हम तैयार नहीं हैं ?                       हमें पहले से निश्चित तारिख ३१ मई तक इंतज़ार करना चाहिए। 

सिपाही ५:- अब हम उस तारिख का इंतज़ार नहीं कर सकते। हमें फौरन धावा बोलना होगा। अभी नहीं तो कभी                         नहीं। 

                      सभी हिचकते हुए एक दुसरे को देखते हैं 

सिपाही ५:- क्या हो गया है तुम लोगों को ? दिखाई नहीं देता के जिस पल का हम लोगों को इंतज़ार था वो पल आ                      गया है। वक्त आ गया है वक्त अपने देश को आज़ाद करने का। वक्त आ गया है मारने या मर जाने                        का। उठाओ अपनी बंदूकें और चलो और लड़ो एक बार अपने देश के लिए। चलो तोड़ दो जेल खानों                      की दीवारें और सबसे पहले आज़ाद करो अंग्रेजों की जेल में सड़ रहे हिन्दुस्तानी कैदियों को। वो भी                        होंगे हमारी जंग ए आज़ादी का हिस्सा। 

सभी :- चलो चलो। 

                                       सब जाते हैं। 


मलंग :-                           (गाता है) अचरजकारी परम् संगठित 

                                                        खुदगर्जी से रह कर दूर 

                                                          केंद्र बिंदु  गया देश का 

                                                           ब्रह्मावर्त उपनाम बिठूर 

                                                            नाना धू धू पंत पेशवा का था 

                                                            दत्तक पुत्र सुजान 

                                                             नाना का विश्वस्त अजीमुल्ला 

                                                             जो कहलाता था खान 

                                                             क्रांतिकारियों को पहनाया 

                                                             जिसने केशरिया बाना 

                                                             शाह बहादुर शाह मुगल 

                                                             सम्राट देश भर ने माना 

                                                              फ़ैल गई बन दावा जैसी 

                                                              भारत में विद्रोहानल 

                                                               नगर नगर में ग्राम ग्राम में 

                                                                घर घर व्याप्त हुई हलचल 

कुछ क्रांतिकारी भागते हुए आते हैं। 

क्रांतिकारी :- मारो मारो। खदेड़ दो अंग्रेजों को इस देश के बाहर। उधर ढूंढो उधर छिपे होंगे। 

निकल जाते हैं 

                                                              होने लगा सशस्त्र सामना 

                                                              शासित और शासकों का 

                                                              दिखलाई देता था सबको 

                                                              अंत समीप त्रासकों का 

     

क्रन्तिकारी  नारे लगाते हुए आते हैं। 

सभी क्रांतिकारी :- नाना साहब पेशवा जिंदाबाद। नानासाहब पेशवा ज़िंदाबाद। 

क्रांतिकारी १:- नाना साहब ने तो अपना सब कुछ होम करके अंग्रेजों को मोम कर दिया। 

क्रांतिकारी २:- आज नाना साहब ने शहर कानपुर को अंग्रेजों से मुक्त कर के कानपुर पर कानपुर पर पूर्ण                                     अधिकार कर लिया। 

क्रांतिकारी ३:- जिस प्रकार कानपुर अंग्रेजों से मुक्त हुआ, उसी प्रकार शीघ्र ही पूरा भारत भी अंग्रेजों से मुक्त हो                            जाएगा 

क्रांतिकारी ४:- उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम स्वत: हो रहे बलिदान 

क्रांतिकारी ५:- होड़ लगी सब की आपस में है जीवन से मृत्यु महान 

क्रांतिकारी १:- विधवा झाँसी की महारानी सेनानी लक्ष्मी बाई 

क्रांतिकारी २:- जिसने युद्ध कुशलता अनुपम स्त्री होकर दिखलाई 


मलंग:-                                       (गाता है) कई वर्ष तक मची थी 

                                                                 वीर तात्या टोपे की 

                                                                  कहते हैं फिर फांसी दे दी 

                                                                   अंग्रेजो ने धोके की 

                                                                   टोपे की वेश्या अजीजन 

                                                                    ने कमाल का काम किया 

                                                                    भोजन भार लिया सेना का 

                                                                    स्वयं कठिन संग्राम किया 

           

             कुछ क्रांतिकारी खड़े हैं अजीजन भी साथ है 

क्रांतिकारी १:- अजीजन बाई। आज देश को आपकी ज़रूरत आन पड़ी है 

अजीजन :-      बोलिये हम  मादर ए वतन के किस काम आ सकते हैं । 

क्रांतिकारी १:- ये आप को सोचना है के आप देश प्रेम में क्या कर सकती हैं। बस ये याद रखिये के हमें तात्या टोपे                         जी के काम को आगे बढ़ाना है। 

अजीजन :- जी भाई जान 

क्रांतिकारी १:- आप अनिन्ध्य सुंदरी हैं। आप का सौंदर्य किसी को भी मोहपाश में बाँध लेता है। आप बताइये के                              आप अपने इस अप्रतिम सौंदर्य को किस प्रकार अपना अस्त्र बना कर दुश्मनों का नाश कर सकती                        हैं ?

अजीजन :- हम अपने इस बेपनाह हुस्न का इस्तेमाल कर दुश्मनों के खेमे में घुस जाया करेंगे। वहां अपनी इस                           खूबसूरती का इस्तेमाल करते हुए दुश्मनों को बेवकूफ बना कर उनकी हर एक चाल का पता कर लेंगे।                 उसके हिसाब से क्रांतिकारी अपनी योजना बना कर दुश्मनों पर हमला कर सकते हैं। 

क्रांतिकारी :- बहुत बेहतर। 

अजीजन :- हम मर्दाना भेष धरने में भी बहुत माहिर हैं। अगर ज़रूरत पड़ी तो मर्दाना भेष रख कर भी कुछ काम                     कर सकते है 

क्रांतिकारी :- लेकिन याद रखिये। इस काम में खतरा बहुत है। अगर पकड़ी गईं तो अंग्रेज आपको फांसी भी दे                            सकते है। 

अजीजन :- लिल्लाह ! इन फिरंगियों की कोर्निश से तो आला है इन फिरंगियों से लड़ते लड़ते फांसी चढ़ जाना। 

क्रांतिकारी १:- जिस मुल्क ने रानी लक्ष्मीबाई और अजीजन बाई ऐसी बेटियों को जन्म दिया हो उस मुल्क को कोई                        कभी गुलाम बना कर रख ही नहीं सकता। 


               मलंग और कलाकार

कलाकार :- जब इतने महान सेनानी थे हमारे पास तो हमारी क्रान्ति सफल रही होगी ?

मलंग :- क्या बताऊं दोस्त। गोरखों और सिक्खों अंग्रेजों का साथ दे दिया। पैसा दे दे कर गोरों ने उनके हाथों को                  बाँध दिया। ऐसे कठिन समय में कुछ गद्दारों ने भी की गद्दारी। व्यर्थ सिद्ध हो गया हमारा शुभ प्रयत्न इतना                भारी। इतना  ही नहीं आगे सुनो। अंग्रेजों ने दुनिया को बहकाने में रक्खी ना कसर। इस पवित्र स्वतंत्रता                    युद्ध को क्षुद्र नाम दे दिया गदर। हार गए फिर भारतवासी सारे अस्त्र शस्त्र टूटे। चली नील की दमन योजना              भाग्य देश के फिर फूटे। 

क्रांतिकारी १:- (प्रवेश) फिर चूसना मूसना जारी हुआ 

क्रांतिकारी २:- (प्रवेश) हमारी कुगति हुई 

क्रांतिकारी ३:-(प्रवेश)  जब तक बापू के संरक्ष्ण में 

क्रांतिकारी ४:- (प्रवेश) ना देश की सुगति हुई 

क्रांतिकारी ५:- (प्रवेश) तब से मानवता के हित में 

मलंग :- हमने पथ को साफ़ किया 

महिला पात्र :- कोहिनूर के टुकड़े करने वालों को भी 

पात्र :- हमने दिल से माफ़ किया 

क्रांतिकारी १;- अंत: करण खुला रहता है 

क्रांतिकारी २:- लघु गंभीर विमर्श में 

क्रांतिकारी ३:- बीत गए शत वर्ष उठा था 

क्रांतिकारी ४:- जन मत भारत वर्ष में 








                                   





                            


 

      

             

Tuesday, December 17, 2019

                                     क्या ईसा मसीह का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था?

२५ दिसंबर अर्थार्त बड़ा दिन ईसा मसीह के जन्म के तौर पर सारी दुनिया में मनाया जाता है। किन्तु प्रश्न ये है के क्या वाकई ईसा मसीह का जन्म २५ दिसंबर अर्थार्त क्रिसमस के दिन हुआ था।  यदि पवित्र बाइबिल में ढूंढने जाएं तो ऐसा कोई ऐतिहासिक तत्व नहीं मिलता। तो फिर ईसा का जन्म कब हुआ था ? 
ईसा के जन्म की तरफ बाइबिल एक इशारा ज़रूर देती है। यदि हम फिलिस्तीन का मौसम देखें तो दिसंबर माह में वहां सर्दिया भरपूर पड़ती है और बारिश भी होती है। बाइबल में लुका की किताब २: ८--१२ में दिया गया है के ईसा के जन्म ले वक्त गड़रिये अपनी भेड़ चरा रहे थे। गड़रिये सर्दियों की रात मैदान में नहीं जाते।  उस क्षेत्र के अनुसार गड़रियों का मैदान में जाने का समय मार्च से अक्टूबर तक का होता है। इस हिसाब से अगर देखा जाए तो ईसा मसीह का जन्म मार्च से अक्टूबर के बीच हुआ था। मृत्यु के समय ईसा की आयु ३३ वर्ष छ: माह थी और उनकी मृत्यु गुड़ फ्राइडे अर्थार्त मार्च या अप्रैल माह में हुई थी। इस से स्पष्ट है के ईसा का जन्म मार्च - अप्रैल के छः माह बाद याने सितंबर अक्टूबर के टाइम फ्रेम में हुआ होगा।  इसी प्रकार बाइबिल में दिए अनेको इशारो से हमें पता चलता है के ईसा मसीह का जन्म निश्चित ही दिसंबर माह में नहीं हुआ। 

तो फिर २५ दिसंबर को ईसा का जन्म क्यों मनाया जाता है? प्रारम्भिक क्रिस्चियन चर्चेस ने सन ४४० तक कभी ईसा मसीह का जन्म नहीं मनाया। इसी सन में चर्च ने २५ दिसंबर को ईसा का जन्म मनाये जाने के आधिकारिक घोषणा की थी और तभी से यह त्यौहार मनाया जाने लगा। इस तारीख का बैबीलोनिया और रोम की संस्कृति में अपना महत्व था। यह वो समय होता है जिसके आस पास सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश करता है (२२ दिसंबर)  ! मतलब हम सर्दियों से गर्मियों की और बढ़ते हैं।  उपरोक्त संस्कृति के लोग २५ दिसंबर को सूर्य का जन्म दिवस मनाते थे।  सूर्य जो जीवन में ऊर्जा और आशा ले कर आता है।  क्रिस्चियन लोग भी ईसा मसीह में ऊर्जा और आशा देखते है इसीलिए संभवत: चर्च ने ईसा मसीह का जन्म दिवस मनाने के लिए यही तारीख चुनी हो।  


Saturday, July 21, 2018

                                                   
                                     जल संचयन पर लिखित नुक्क्ड़ नाटक
                                                         वर्षा मंगल

सारे  कलाकार नाचते हुए आते हैं

कोरस :- काले मेघा पानी दे
              पानी दे गुड़ धानी दे
             या मेरे मौला पानी दे
             चुटकी रत्ती पानी दे
             कानी कौड़ी खेत मां
             पानी गिरे रेत मां
             कानी कौड़ी खेत माँ
             पानी गिरे रेत माँ

सब बैठते हैं कलाकार १ खड़ा गाता रहता है

कलाकार १:- गगरी है छूछी बैल हैं पियासे (बैठता है)

महिला कलाकार १:- भर गगरी जल लाऊँ कहाँ से (बैठती है)

कलाकार २ :- फसल बुआइया के ऊजर साफा (बैठता है)

कलाकार ३:- गुरिया की चूनर धानी रे

सब नाचते है

कोरस :- काले मेघा पानी दे
              पानी दे गुड़ धानी दे
             या मेरे मौला पानी दे
             चुटकी रत्ती पानी दे
             काले मेघा पानी दे
              पानी दे गुड़ धानी दे

सब बैठते हैं।  महिला कलाकार तथा कलाकार एक खड़े होते हैं

कलाकार १;- मां ये कौन लोग थे और क्यों नाच गा रहे थे ?

म. कलाकार :- बेटा ये हमारे लोक कलाकार थे जो नाच गा कर काले मेघ से पानी बरसाने की प्रार्थना कर
                       रहे थे।

कलाकार १ :- तो क्या इनके इस तरह से नाचने गाने से मेघ बरस जाते हैं ?

म. कलाकार :- ऐसी हमारी लोक मान्यता तो थी और शायद बरस भी जाते होंगे। लेकिन अब ऐसा हो,
                       ये मुश्किल है।

कलाकार १:- पहले बरस जाते थे तो अब क्यों मुश्किल है मां ?

म.कलाकार :- क्यों के पहले हम प्रकृति की पूजा करते थे, इसलिए प्रकृति भी हमसे स्नेह करती थी,
                      अब हम प्रकृति से खिलवाड़ करते है, इसलिए प्रकृति ने भी हमसे स्नेह करना बंद कर
                      दिया है।

कलाकार १;- हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ क्यों करते हैं मां ?

म. कलाकार :- अपने स्वार्थ के लिए

कलाकार १:- कैसा स्वार्थ मां ?

म.कलाकार :- अनेकों स्वार्थ हैं

कलाकार १:- जैसे ?

म.कलाकार :- जैसे पेड़ों को ही ले लो। हमने पेड़ो की अंधा धुंध कटाई की। अपने कंक्रीट के बने घरों को
                      सजाने के लिए इस हरी भरी वसुंधरा को उजाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जैसे जैसे
                      हमारे फ़र्नीचर बनते गए वैसे वैसे हमारी धरती मां बंजर होती चली गयीं।

सभी कलाकार उठ कर नाचने लगते है

कोरस:- काले मेघा काले मेधा पानी तो बरसाओ
             बिजुरी की तलवार नहीं बूंदों के बान चलाओ
              घनन-घनन घिर-घिर आये बदरा
               घन घनघोर कारे छाये बदरा
                धमक-धमक गूंजे बदरा के डंके
                चमक-चमक देखो बिजुरिया चमके
                 मन धड़काये बदरवा, मन धड़काये बदरवा
                  मन-मन धड़काये बदरवा

कोरस :- अरे ! अरे ! अरे ! देखो वो देखो बदरा सारे लौटे जा रहे हैं।

सब चारों ओर बादलों को पकड़ने भागते हैं।  लेकिन पकड़ नहीं पाते। सब थक कर खड़े होजाते हैं।  सब की गर्दन झुकी हुई, धनुष के आकार में पीठ झुकी हुई और सबके हाथ घुटनो पर।  सब ढाप की थाप पर सीधे होते हैं।

कलाकार ३;- प्यारी बहनो और प्यारे भाइयों

कलाकार ४:- हरिजनों और नाइयों

कलाकार ५:- क़ुतुब की मीनारों और लाल किले की खाइयों

कलाकार ६:- मेहरबान कदरदान

कलाकार ७:- जेब कतरों से सावधान

कलाकार ८:- सेठ आनंदराम जयपुरिया पब्लिक स्कूल कैंट कानपुर पेश करते हैं, नुक्क्ड़ नाटक

कोरस :- वर्षा मंगल

सब बैठते है। चार कलाकार दौड़ कर दुपट्टों की सहायता से टी वी सेट बनाते है जिसके पीछे न्यूज रीडर बैठा है।

रीडर :- और अब मौसम। आज जुलाई की तेरहवीं तारीख हो गई और बारिश का दूर दूर तक नामों निशान
           नहीं है। कभी कभार छिट पुट बादल आते भी हैं तो वापस लौट जाते हैं। देश में सूखे जैसी स्थिति
           बन रही है। खरीफ की बुआई काफी पिछड़ चुकी है। अगर एक हफ़्ता और बारिश नहीं हुई तो
           स्थिति एक विकराल रूप ले सकती है।

सब कलाकार दौड़ कर बैठ जाते है। दो महिला कलाकार उठती हैं।

म. कलाकार १:- का बहिनी। सावन निकला जा रहा है लेकिन भगवान बरस ही नहीं रहे हैं।

म.कलाकर २:- हमारे जमाने में तो आधे आषाढ़ से ही बारिश शुरू हो जाती थी।

म.कलाकार १ :- आहा ! जेठ की प्रचन्ड गर्मी के बाद आषाढ़ की फुहारों का क्या कहना !

म.कलाकार २ :- आषाढ़ के महीने में ही में तो कालीदास ने मेघ दूत की रचना की थी।

म.कलाकार १:- जल्दी बारिश शुरू हो तो पेड़ों पर झूले पड़ें।

म,कलाकार २:- किस दुनिया में जी रही हो बहन ?

म.कलाकार १:- क्यों

म.कलाकार २:- अब पेड़ बचे ही कहाँ हैं जिनपर झूले पड़ेंगे। विकास की अंधी दौड़ में कभी सड़कें चौड़ी करने
                        के नाम पर तो कभी नई इमारतें बनाने के नाम पर सारे पेड़ों को काट दिया गया है।

म.कलाकार १ :- सही कह रही हो बहन। शहरों में तो पेड़ बचे ही नहीं हैं।

म.कलाकार २:- तो गावों में कौन से पेड़ बच गए। वहां भी यही हाल है। लोगों ने पेड़ या तो आरा मशीन वालो को
                    बेच दिए फिर ईंधन की तरह चूल्हे में जला दिए।

म.कलाकार १  :- तो क्या झूला डालने अब जंगल जाना पड़ेगा ?

म.कलाकार २ :- वहां टिंबर माफिया पेड़ काटे डाल रहा है।

म.कलाकार १ :- इसके खिलाफ सरकार को कोई क़ानून बनाना चाहिए।

म.कलाकार २:- क़ानून तो बहुतेरे हैं, लेकिन माफिया के हाथ क़ानून से भी ज़्यादा लम्बे हैं।

म.कलाकार १ :- लेकिन पेड़ो पर तो चिर्रअइया अपना घोंसला बनाती है। अगर पेड़ नहीं बचे तो वो कहाँ रहेंगी ?

 म. कलाकार २:- अब गौरइया दिखती हैं कहीं ?

म.कलाकर १:- नहीं।

म.कलाकार २;- गिद्ध भी खत्म हो चुके है।

म.कलाकार१ :- अरे बाप रे !

म. कलाकार २:- इसके अलावा और भी कई चिड़िये  हैं जो गायब हो रही हैं

म.कलाकार १ :-  जैसे ?

म.कलाकार २ :- जैसे बत्तख है, बगुला है, सारस है

म. कलाकार १ :- हे राम ! ये सब पेड़ों के कटने के वजह से ?

म. कलाकार २:- हाँ

कलाकार ३ व ४ उठते है तथा ये दोनों बैठती है।

कलाकार ३:- देखा आपने। पेड़ों के कटने के वजह से ना केवल हमारी सांस्कृतिक परम्पराएं समाप्त हो रही है
                    अपितु पक्षियों, कीट पतंगों की अनेकों प्रजातियां भी लुप्त हो रहीं हैं या लुप्त प्राय हैं।

कलाकार ४ :-वो देश जहां पेड़ों की पूजा की जाती थी उस देश में आज पेड़ों को नष्ट किया जा रहा है।

कलाकार ३:- वो पेड़ जोहमारे जीवन के कारक हैं, उन्हें ही आज नष्ट किया जा रहा है।

कलाकार ४:- ये बताने की आवश्यकता नहीं हैके पेड़ों के द्वारा ही हमें जीवन दायनी ऑक्सीजन मिलती है।

कलाकार३:- पेड़ पर्यावरण को शुद्ध रखते हैं।

कलाकार४:- पेड़ ट्रांस्पिरेशन अर्थार्तवाष्पोसर्जन के द्वारा वातावरण को ठंडा रख कर प्राकृतिक एयर
                      कंडीशनर का ही काम नहीं करते बल्कि वर्षा के माध्यम से धरती की प्यास भी बुझाते हैं।

कलाकार ३ :- बच्चें पेड़ का विकेट बना कर क्रिकेट  भी तो खेलते हैं।

कलाकार४ :- लेकिन अफ़सोस के हम प्रति वर्ष करीब १५ लाख पेड़ो की बली ले लेते हैं।

कलाकार  ३:- १९९० से २०१५ के बीच विश्व स्तर पर करीब ३ % जंगल कम हो गए थे।

कलाकार४:- लेकिन अच्छी बात बात ये है के हमारे भारत में स्थिति इससे बिलकुल उलटी है।

कलाकार  ३ :- हमारे भारत में वन छेत्र १% प्रति वर्ष की गति से बढ़ रहे हैं।

कलाकार४:- ये है हमारा इंडिया।

कलाकार ३:- देन लेट उस रॉक

सब नाचते गाते हैं।

गीत :- घोड़े जैसी चाल हाथी जैसी दुम। ....

               गीत बदलता है

गीत :- मौनो मोर मेघेरो शोंगे

               गीत बदलता है

गीत :- मइया ओ गंगा मइया

कलाकार ५-६ को छोड़ सभी बैठते हैं।

कलाकार५:- हे राम ! गंगा मइया में तो बिलकुल पानी ही नहीं है।

कलाकार  ६:- वर्षा ना होने के कारण मइया तन्वंगी सी हुई पड़ी हैं।

कलाकार५ :- केवल यही एक कारण नहीं है गंगा मइया में पानी कम होने का।

 कलाकार६;- तो फिर ?

 कलाकार५ :- बहुत से कारण हैं।

कलाकार६:- जैसे ?

कलाकार ५:- गंगा मइया का ८०% पानी सिंचाई के लिए चुरा लिया जाता है बाकी बचा कुचा पानी हाइड्रो पावर
                    स्कीम्स के लिए। इसी लिए सर्दियों और गर्मियों के मौसम में ऋषिकेश से अलहाबाद के बीच गंगा
                    में गंगा जल होता ही नहीं  है। और जिस पानी को हम गंगा जल समझ कर इस्तेमाल करते हैं वो
                    दरअसल सिर्फ सीवेज का पानी होता है।

कलाकार ६:- लेकिन भइया, सिंचाई भी तो ज़रूरी है।

कलाकार ५:- हाँ ज़रूरी है, बहुत ज़रूरी है, लेकिन समझदारी से। क्या तुम्हें पता है के सिंचाई के वास्ते लिए गए
                    कुल पानी का ५०% तो हम उसके वाष्पीकरण के कारण खो देते हैं जिसका हमें कोई भी लाभ
                   सिंचाई में नहीं मिलता।

कलाकार ६:- कारण ?

कलाकार ५:- कारण हमारी पुरानी पड़ चुकी सिंचाई पद्धति।  

कलाकार५  :- और मइया को इतना गंदा किसने कर दिया ?

कलाकार६:- इसके भक्तों ने

 कलाकार५:- क्या मइया को उसके भक्तों ने ही गंदा कर दिया ?

 कलाकार६:- हाँ। कभी श्रद्धा और आस्था के नाम पर, तो कभी विकास के नाम पर। कभी भक्तों ने मइया को
                    फूल, नारियल, मूर्तियां और अस्थियां डाल कर गंदा किया तो कभी अपना मल-मूत्र, चिकित्स्कीय
                    तथा औध्योगिक कचरा डाल कर मैला किया। जिस गंगा मइया के जल से हम आचमन करते
                   हैं उसी मइया के किनारों पर बैठ कुछ मूर्ख सौच करते हैं। वो गंगा मइया जिसका पानी
                    कभी अमृत माना जाता था आज उसी के पानी को लगातार पीने से हेपटाइटिस, टाइफाइड,
                   कॉलरा, अमीबिक डिसेंट्री के साथ साथ तमाम चर्म रोगों के होने की भी संभावना बनी रहती हैं।
                   फिर भी मइया कुछ नहीं कहती बल्कि बड़े प्यार से हमें गले लगाए हमारे पापों को धोती रहती है।

कलाकार  ५:- लेकिन ऐसा कब तक चलेगा ?

कलाकार६:- हाँ ऐसा कब तक चलता रहेगा ? हम केवल गंगा मइया को ही प्रदूषित नहीं कर रहे, बल्कि जितनी
                  भी नदियाँ हैं हम सबको ही प्रदूषित कर रहे है। ज़रा सोचिये, जमना जी को प्रदूषित देख कर
                  भगवान कृष्ण क्या सोचते होंगे ? हो सकता है कभी राधा जी से पूछते भी हों के क्या ये वही जमुना
                  जी हैं जिनके तट पर बैठ कर हमने मुरली बजाई थी। गंगा के तटों पर लगे पेड़ों की अंधा धुंद कटाई
                 के कारण भू-क्षरण अर्थार्त सॉइल इरोज़न भी बढ़ गया है। गंगा के किनारे लगी टैक्सटाइल, लेदर,
                 रबर, प्लास्टिक आदि  कारखानों ने गंगा मइया की हालत और दुखदायी कर दी है।

कलाकार  ५:- सरकार कुछ करती क्यों नहीं ?

कलाकार६ :- हमारी सरकार ने इस पंच वर्षीय योजना में पूरे २०,००० करोड़ रुपय का प्रावधान किया है
                   ताकि गंगा मइया साफ हो सकें और हम सही मायने में कह सकें नमामि गंगे।

कलाकार  ५:- लेकिन मइया केवल सरकारी प्रयासों से स्वच्छ नहीं होंगी। भक्तो की भी अपनी ज़िम्मेदारी है।

कलाकार ६:- बिलकुल। बिना जन भागीदारी के ये भागीरथी प्रयास सफल नहीं हो सकता।हम सब को देखना
                   है के गंगा मइया में ज़रा भी कचरा ना जाने पाए। मूर्तियों का जल विसर्जन करने के बजाए उनका
                  भू-विसर्जन करें। पानी का मोल करें और उसकी बर्बादी रोकें। सीवेज और कारखानों के गंदे पानी
                  को ट्रीटमेंट प्लांट के माध्यम से परिष्कृत कर के ही वापस गंगा में जाने दें।

कलाकार ५;- बिक्लुल ठीक कह रहे हो भइया। तो सभी मिल कर बोलो गंगा मइया की

कोरस        :- जय

सभी नाचते  गाते हैं।

कोरस :- बरसात में तुमसे मिले हम सजन हमसे मिले तुम बरसात में तक धिना धिन बरसात में।

सभी बैठते हैं।  ढोल की गंभीर थाप पर कलाकार ७ उठता है और हैण्ड पम्प बन जाता है। दूसरा कलाकार उठता है और जा कर हैण्ड पम्प चलाता है। पम्प से पानी नहीं निकलता। वो हताश हो कर बैठ जाता है।

कलाकार ७:- (हताशा से) हे भगवान ये क्या दिन दिखा रहे हो ? ताल तलैया सब गायब हुई गए, कुआं एक्को
                    बचे नाहीं। एक ई हैण्ड पम्प का सहारा बचा राहे, ई हो धोखा दई गा।

             हैण्ड पम्प उसको चपत लगाता है लेकिन वो देख नहीं पाता के चपत किसने लगाई

कलाकार ७ :- (उठ कर इधर उधर देखता है ) ए कउन है? कउन मारिस हमका ? (किसी को ना पाकर बैठ जाता
                     है) ससुर समय ही गलत चल रहा है। उधर सूर्य नारायण आग बरसा रहे हैं, इधर मारे प्यास के
                     हलक सूखा जात है, इधर ई हैण्ड पम्प पानी भी नहीं उगल रहा है। (हैण्ड पम्प फिर उसको मारता
                    है। वो घबड़ा कर इधर उधर देखता है) ए कौन है ? हिम्मत है तो सामने आओ ! फिर देखो कैसा
                    तोड़ता हूँ तुमको। है हिम्मत सामने आने की ? नहीं है ना ? बस अब मत मारना। (फिर बैठता
                   है ) अब के मारा तो यही हैण्ड पम्प उखाड़ कर मारूंगा।

हैण्ड पम्प :- उखाड़ पाओगे ?

कलाकार७:- (इधर उधर देखते हुए) कौन बोला ?

हैण्ड पम्प :- मैं

कलाकार ७:- मैं कौन ?

हैण्ड पम्प :- मैं मतलब मैं।

कलाकार-७: (रुआंसा हो कर) अरे कौन हो भाई ? क्यों मुझे सता रहे हो ? क्या बिगाड़ा है मैंने तुम्हारा ?

हैण्ड पम्प :- तुम्ही ने तो सब कुछ बिगाड़ा है

कलाकार ७:- मैंने ?

हैण्ड पम्प :- हाँ तुमने और तुम्हारे इंसानी साथियों ने।

कलाकार ७:- (हैरत से ) इंसानी साथियों ने ? तो  तुम क्या भूत हो ?

हैण्ड पम्प :- फिलहाल तो वर्तमान हूँ। लेकिन जल्द ही भूत हो जाऊंगा, अगर तुम लोग जल्दी ना सुधरे तो।

कलाकार ७ :- तुम हो कौन ? और मेरे सामने क्यों नहीं आ रहे हो ?

हैण्ड पम्प :- मैं तो तुम्हारे सामने ही हूँ।

कलाकार७:- कहाँ  हो? कौन हो?

हैण्ड पम्प :- यहीं हूँ और मैं हूँ हैण्ड पम्प

कलाकार७:- (हैण्ड पम्प की ओर घूम कर और उसकी ओर देख कर) क्या हैण्ड पम्प ? ये तुम मुझसे बात
                    कर रहे हो ? (थूक गटकता है )

हैण्ड पम्प :- हाँ तुमसे और तुम्हारी समस्त मानव जाती से जो मेरे अस्तित्व को मिटाने पर तुली है।

कलाकार ७:- तुम तो कितनो की प्यास मिटाते हो।  तुम्हे कोई क्यों मिटाएगा ?

हैण्ड पम्प :- ये ही तो दुःख की बात है के मुझे वोही लोग मिटा रहे हैं जिनकी मैं प्यास बुझाता हूँ। ये ही इंसान
                   की फितरत है के जिस डाल पर बैठता है उसी को काटता है।

कलाकार७:- लेकिन इंसान कैसे तुम्हारे अस्तित्व को मिटा रहा है ?

हैण्ड पम्प :- ये बताओ, मेरा तुम्हारा सब का अस्तित्व किस से है ?

कलाकार ७:- किस से ?

हैण्ड पम्प :- पानी से। मेरा अस्तित्व तो ख़ास तौर पर भू जल अर्थार्त ज़मीन के नीचे के पानी पर निर्भर करता
                   है। और तुम लोग उसी पानी को खत्म करे दे रहे हो।

कलाकार७ :- कैसे ?

हैण्ड पम्प :- पानी का ज़रूरत से ज़्यादा दोहन कर के और पानी को बर्बाद कर के। बढ़ती हुई आबादी के साथ
                   इंसानो ने जंगलों और पेड़ो को काटना शुरू कर दिया जिसके कारण ग्लोबल वार्मिंग होने लगी
                  फ़लस्वरूप  क्लाइमेट और नैचुरल साईकिल में फर्क पड़ने लगा। हर साल गर्मियों में लगातार
                  टेम्प्रेचर बढ़ने लगा और सर्दियों मं वही टेम्प्रेचर लगातार घटने लगा। इसके कारण हर साल
                  बारिश का भी प्रतिशत घटने लगा। जिसकी वजह से वाटर टेबल नीचे जाने लगा । तुमने भू जल
                  का दोहन तो बहुत किया लेकिन उसकी पुन: पूर्ती का कोई इंतज़ाम नहीं किया। पहले ताल
                  तलैया, पोखर आदि होते थे जिनके माध्यम से पानी रिस रिस कर धरती के अंदर पहुंचता
                   था। तुमने उन ताल तलैयों पर भी ऊँची ऊँची बिल्डिंगे बाँध कर उनके अस्तित्व को खत्म कर
                  दिया। इस लिए धीरे धीरे भू जल भी खत्म हो रहा है। एक समय ऐसा भी आएगा के पीने के
                 लिए एक बूँद पानी को तरस जाओगे। अगर अभी भी स्थिति को नहीं संभाला तो याद रखो,
                 अगला विश्व युद्ध अर्थार्त वर्ल्ड वॉर धन दौलत या ज़मीन के लिए नहीं, पीने योग्य पानी के
                लिए होगी।
                         

कलाकार७:- ओह! कितनी भयानक स्थिति होगी वो।

हैण्ड पम्प :- हाँ। भाई भाई के पानी का प्यासा हो जायेगा। एक एक बूंद पानी के लिए अपराध होने लगेंगे।
                   अभी समाचार पत्रों में पढ़ते हो ना के दो बाइक सवारों  ने महिला से चेन लूटी।

कलाकार७:- हाँ।

हैण्ड पम्प :- फिर अख़बारों में पढोगे "दो बाइक सवारों ने महिला से पानी की बोतल लूटी" खून सस्ता और पानी
                   महंगा हो जायेगा। सेंसेक्स में पानी का भाव आएगा। टीवी पर देखो कैसे विज्ञापन आएंगे

                      दो कलाकार टीवी का मॉडल बन जाते है। दो अभिनय करते है।

               सारे कलाकार मिल कर अपने मुँह से शादी में बजने वाली शहनाई की धुन निकालते है

अभिनेता :- बारात ठीक आठ बजे पहुंच जाएगी। लेकिन एक बात हम आपको बताना तो भूल ही
                         गए।
                   (सारे कलाकार मिल कर अपने मुँह से दुखी शहनाई की धुन निकलते है। दूसरे अभिनेता
                    के चेहरे पर घबड़ाहट के भाव आ जाते हैं।

अभिनेता:- घबड़ाइये नहीं। हमें कुछ नहीं चाहिए। हम चाहते है के बारातियों का स्वागत एक एक गिलास
                  पानी से किया जाये।

अभिनेता २:- (खुशी से) पानी गिलास।

कोरस :- (सभी गाते हैं ) पानी गिलास सभी को चाहिए पानी गिलास

हैण्ड पम्प :- और नेताओं के भाषण भी सुन लो

अभिनेता :- (नेता की मुद्रा में) मित्रों। ये सरकार गरीबों की सरकार है। इस सरकार ने गरीबों के लिए पानी का
                   कोटा बढ़ा दिया है। अब से हर गरीब भाई को प्रति माह दस दस बूंद पानी अतिरिक्त दिया जायेगा।
                   ये दस बूंदे आपको पहले से मिल रही २५ बूंदो के साथ ही राशन की दुकानों पर मिलेगा। यानी
                   सरकार आपको अब २५ की जगह ३५ पानी की बूंदे देगी जो की आपको आधार कार्ड के साथ
                  साथ स्मार्ट वाटर कार्ड दिखने पर  मिलेंगी।

हैण्ड पम्प:- स्टॉक एक्सचेंज से ले कर बुलियन, कमोडिटी आदि हर मार्किट पाने के भाव से ही संचालित होगी।

कलाकार७:- मतलब हमें युद्ध स्तर पर पानी बचाना चाहिए ?

हैण्ड पम्प :- पानी तो बचाना पड़ेगा ही। लेकिन सिर्फ पानी बचाने से काम नहीं चलेगा।

कलाकार७:- फिर?

हैण्ड पम्प:- हमें जल स्रोतों को भी बचाना होगा।

 कलाकार७:- कैसे ?

हैण्ड पम्प :- सबसे पहले हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए।

कलाकार१ :- पेड़ वाष्पीकरण में मदद करते है जिससे वर्षा होती है तथा भूमि में नमी बनी रहती है।

कलाकार २:-  अगर प्रत्येक घर की छत पर ` वर्षा जल´ का भंडार करने के लिए एक या दो टंकी बनाई जाएँ और
                     इन्हें मजबूत जाली या फिल्टर कपड़े से ढ़क दिया जाए तो हर नगर में `जल संरक्षण´ किया जा
                    सकेगा।

कलाकार३:- गाँवों, कस्बों और नगरों की सीमा पर या कहीं नीची सतह पर तालाब बनाए जाएं , जिनमें
                  स्वाभाविक रूप में मानसून की वर्षा का जल एकत्रित हो। साथ ही, अनुपयोगी जल भी तालाब में
                 जाये , जिसे मछलियाँ और मेंढक आदि साफ करते रहते हैं  और तालाबों का जल पूरे गाँव के पीने,
                 नहाने और पशुओं आदि के काम में आ सकता है ।

कलाकार ४:- बड़ीबड़ी बिल्डिंगों में वाटर हार्वेस्टिंग को कड़ाई से लागू किया जाये।

कलाकार ५:- विज्ञान की मदद से आज समुद्र के खारे जल को पीने योग्य बनाया जा रहा है, गुजरात के द्वारिका
                   आदि नगरों में प्रत्येक घर में `पेयजल´ के साथ-साथ घरेलू कार्यों के लिए `खारेजल´ का प्रयोग
                   करके शुद्ध जल का संरक्षण किया जा रहा है, इसे बढ़ाया जाए।

कलाकार ६;- याद रखिये। जल ही जीवन है

कलाकार १:- जल है तो कल है

कलाकार २:- पानी की समस्या है विकराल। जल बचाव की बनें मिसाल।


कलाकार ३:- जल संरक्षण जीवन का रक्षण।

कलाकार ४:- हम सब मिलकर अभियान चलाएं (सब एक दूसरे का हाथ पकड़ते हैं)

सब          :- जीवन हेतु जल बचाएं।

कलाकार ५:- तो फिर .....

कोरस :-  घनन-घनन घिर-घिर आये बदरा। (सब नाचते हैं )