जिस दौर में में फिल्मों से काव्य गायब हो गया हो और सिनेमा पथरीला हो गया हो उस दौर में फ़िल्म सनम रे ओस की बून्द का एहसास कराती है। यूँ तो मुझे रोमांटिक फिल्में कम ही सुहातीं हैं लेकिन सनम रे अच्छी लगी। इसमें न तो बाजीराव मस्तानी की तरह बेमतलब की ताली बजाउ डायलाग बाज़ी है न गोलियों की रासलीला है। अगर अगर कुछ है तो बस एक मखमली एहसास और प्यानो की धुन पर थिरकते ख्वाब । इसका नायक आशिकी २ की तरह कोई पलायन वादी व्यक्तित्व नहीं है अपितु अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद करता एक नवजवान है। आम रोमांटिक फिल्मों की तरह ये फ़िल्म भी बीच बीच में झूलती भी है।
दिव्य खोसला कुमार के निर्देशन में राज खोसला की शैली स्पष्ट झलकती है। खास कर लोकेशन के चयन मे। गीत भाव पूर्ण है तो संगीत कर्ण प्रिय। इस फ़िल्म का यू एस पी अगर कोई है तो वो है ऋषि कपूर जिसने अपने संछिप्त सी भूमिका में एक हृदयस्पर्शी प्रभाव छोड़ा है। यूँ तो यह फ़िल्म 'अवश्य देंखें' की श्रेणी में नहीं आती लेकिन फिर भी देखी जा सकती है।
दिव्य खोसला कुमार के निर्देशन में राज खोसला की शैली स्पष्ट झलकती है। खास कर लोकेशन के चयन मे। गीत भाव पूर्ण है तो संगीत कर्ण प्रिय। इस फ़िल्म का यू एस पी अगर कोई है तो वो है ऋषि कपूर जिसने अपने संछिप्त सी भूमिका में एक हृदयस्पर्शी प्रभाव छोड़ा है। यूँ तो यह फ़िल्म 'अवश्य देंखें' की श्रेणी में नहीं आती लेकिन फिर भी देखी जा सकती है।
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