Wednesday, December 23, 2015

क्रिसमस और उपहार

                                                         

क्रिसमस के त्योहार के साथ ही एक और परम्परा जुडी है और वो है उपहार देने की, जिसकी शुरुआत उन तीन मंजूशियों ने की थी जो सितारों की गणना कर येशु के दर्शन करने गए थे। तथा  जिनके बारें में मैं अपनी पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ।  वो पूर्व देशों के मंजूषि अपने साथ तीन तोहफे ले कर गए थे जो उन्होंने जन्म के समय येशु को दिए। इन तीनों तोहफों में तीन भविष्यवाणियां छिपी थीं। पहला तोहफा लोबान था जो इस बात का प्रतीक था के येशु भविष्य में पूजे जायेंगे। दूसरा तोहफा सोना था जो इस बात का प्रतीक था के येशु राजाओं के राजा हैं।  और तीसरा मूर जो इस बात की भविष्यवाणी कर रहा था कि येशु कष्ट पाएंगे और मारे जायेंगे। 
तभी से पुरे विश्व में क्रिसमस के मौके पर तोहफे देने की परम्परा की शुरुआत हुई थी।  विश्व भर के बच्चे तो क्रिसमस को तोहफे पाने का पर्व मानते हैं। ज़्यादातर बचच्चों का यह विश्वास है  के अगर वो साल भर अपने अभिभावक का कहना मानते रहेंगे और शैतानियाँ नहीं करेंगे तो सेंटा-क्लाज आधी रात में उनके लिए तोहफा छोड़ कर जायेंगे। 
ये तोहफे मिलने की तारीख भी अलग अलग देशों में अलग-अलग है। हालैंड में ये तोहफा दस साल तक के बच्चों को ५ दिसंबर सेंट निकोलस डे पर मिलता है। ,बेल्जियम, जर्मनी, चेक रिपब्लिक जैसे पूर्वी योरोपीय देशों में सेंट निकोलस डे ६ दिसंबर को मनाया जाता है। यू के, यू एस, जापान सहित भारत में २५ दिसंबर को प्राप्त होते हैं। स्पेन, मैक्सिको आदि देशों में ये तोहफे ६ जनवरी, एपिफेनि डे पर दिये जाते हैं। 

Tuesday, December 22, 2015

                                                               पूछ-ताछ कार्यालय

'भाई-साहब नमस्कार।'

'नमस्कार।  कहिये?'

'ये सी बी आई कहां मिलेगी?'

'क्यों?'

'कुछ नहीं बस पूछना था'

'क्या?'

'वो जेटली जी के यहां कब जा रही है?'

'नहीं जाएगी।'

'क्यों?'

'अभी वो पिजड़े में है।'

Saturday, December 12, 2015

क्रिसमस और क्रिसमस ट्री

                                                     क्रिसमस और क्रिसमस ट्री
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस पर चर्चा की थी के किस प्रकार एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने  सैंटा क्लाज़ के मिथक को क्रिसमस से जोड़ कर कुछ ऐसा माहौल पैदा कर दिया के अधिकांश लोग क्रिसमस को सैंटा क्लाज़ से अलग कर के देख ही नहीं पाते हैं। कुछ गैर मसीही लोग तो यहां तक मानते हैं के सैंटा क्लाज़ क्रिश्चियन्स के कोई देवता हैं जिनके बगैर क्रिसमस हो ही नहीं सकता।
आज हम चर्चा करेंगे क्रिसमस ट्री की।  क्रिसमस आगमन माह की शुरुआत में ही हर घर में क्रिसमस ट्री सजा दिया जाता है।  किन्तु अगर इस परम्परा के इतिहास में नज़र डालें तो हम पाएंगे के ये परम्परा बर्फीले देशों में क्रिस्चैनिटी आगमन के बहुत पहले से थी।  शायद ये कहना अतिश्योक्ती ना होगी के उन लोगों में ये परम्परा प्रागैतिहासिक काल से थी। बर्फीले प्रदेशों में जहां सर्दियां बहुत लम्बी होती हैं और पूरी प्रकृति बर्फ की चादर में दब जाती है, वहां के लोग सर्दियों के आगमन के साथ ही पेड़ की टहनी अपने घर के अंदर रख लेते थे जो उनका ये विश्वास बनाये रखता था के बसंत फिर आएगा।
अब प्रश्न ये है के यह परम्परा क्रिसमस से कैसे जुडी। इस संदर्भ में जर्मनी की एक लोक कथा से पता चलता है। आठवीं शताब्दी तक जर्मनी के जैसिमर नामक शहर में शीतकालीन अयनांत मनाने हेतु ओडिन'स  ओक नामक पेड़  नीचे नर बली देनें की परमपरा थी।  आठवीं शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक इंग्लिश बिशप विनफ्रीड जैसिमर पहुंचे।  वहां उन्होंने ओडिन'स ओक को कटवा कर इस नृशंस परम्परा का अंत किया। जिस स्थान पर वो ओक गिरा वहां पर एक छोटा सा फर का पेड़ लगा हुवा था।  जब जर्मन्स ने बिशप विनफ्रीड से पूछा के उन्हें क्रिसमस कैसे मनाना चाहिए, विनफ्रीड ने उनकी परम्परा का ध्यान रखते हुवे बताया के उन लोगों को एक एक फ़र का पेड़ अपने घर ले जाना चाहिए जो के शांति का प्रतीक होगा।  क्यों के फर का पेड़ सदा हरा भरा रहता है इस लिए ये पेड़ अनंत जीवन का भी प्रतीक है।
धीरे धीरे ये कथा नाविकों के माध्यम से विश्व के अन्य देशों तक पहुंची और ये परम्परा विश्व भर में फैल गयी

सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस

                                                 क्रिसमस और सेंटा
                                सेंटा एक किवदंती मात्र, कोई देवता नहीं

जैसे ही दिसंबर का महीना आता है, विश्व भर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।  इसी के साथ हर पेट्रोल-पम्प, हर शॉपिंग मॉल, स्कूलों में मनाये जाने वाले उत्सव, विज्ञापनों इत्यादि में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है वो है कंधे पर तोहफों का झोला टांगे, लाल लबादे में लिपटा, सफेद दाढ़ी वाला हंसमुख बूढ़ा जिसे दुनियां सैंटा क्लॉज़ के नाम से जानती है। लेकिन शायद बहुत कम ही लोगों को पता है के सैंटा क्लाज़ केवल एक मिथक है जिसे इसा मसीह के जन्म से कुछ लेना देना नहीं है। पवित्र बाइबल से भी सैंटा क्लाज़ का कोई लेना देना नहीं है।  अगर मैं ये लिखूं के सैंटा क्लाज़ मार्केटिंग स्ट्रैटजी का प्रोडक्ट हैं तो शायद अतिश्योक्ति ना होगी।
आइये जानें सैंटा क्लॉज़  का कॉन्सेप्ट क्या है।  आधुनिक सैंटा क्लॉज़  का उदय उन्नीसवीं शताब्दी में डच नाविकों के साथ संत निकोलस की कथा अमेरिका पहुँचने हुवा था।  किन्तु सैंटा क्लॉज़ को विश्व प्रसिद्ध करने में कवि क्लेमेंट क्लार्क मूर की कविता 'अ विजिट फ्रॉम सेंट निकोलस' जिसे हम 'द नाइट बिफोर क्रिसमस' के नाम से भी जानते हैं, ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभायी।  कलाकार टॉमस नास्ट ने सैंटा क्लॉज़ को वो रूप दिया जो आज हम देखतें हैं।
फिर आई सेंटा क्लाज़ के मार्केटिंग की बारी जो निभायी कोका-कोला ने। सन १९३० में कोका-कोला ने अपने प्रोडक्ट के विज्ञापनों में सैंटा क्लाज़ के साथ क्रिसमस का इतना प्रचार किया के पूरी दुनिया इस भरम में जीने लगी के क्रिसमस मतलब सैंटा क्लाज़, या सैंटा क्लॉज़ मतलब क्रिसमस।

Sunday, November 29, 2015

असहिष्णुता की तलाश

                                                           
ये खोजी मन बहुत दिनों से कुछ खोजने को बेकरार था। लेकिन खोजे तो क्या खोजे ? ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका तक तो बिदेशी खोजी खोज चुके थे। सेब भी गिरना था तो न्यूटन के सर पर।  मेरे लिए तो जैसे कुछ भी खोजने को बचा ही नहीं था।  तभी यक ब यक असहिष्णुता का ध्यान आया।  ये असहिष्णुता भी अजीब चीज है।  बचपन में कहीं दिखी नहीं, जवानी में कभी मिली नहीं और अब पूरे देश को दीवाना बनाये है।  कुछ लोगों को तो ये सपनें में भी दिखती है तो कुछ लोग इसके अस्तित्व से भी इंकार करते है।  लेकिन चर्चा हर शख्स करता है। शायद ये सनी लियोनी से भी ज्यादा सेक्सी है तभी तो हर टीवी चैनल, सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया पर छायी है।  जवान से लेकर बुड्ढ़ा, हर उम्र का आदमीं उस पर चठखारे ले कर बात कर रहा है।  मन में मेरे भी असहिष्णुता को ले कर तरंगें उठने लगीं।  सोचा पता करूँ आखिर ये असहिष्णुता है क्या। क्या नूरजहाँ की तरह इसका कोई अस्तित्व भी है या अनारकली की तरह ये भी काल्पनिक है। फिर क्या था, बिना लोटा डोर के निकल पड़ा असहिष्णुता की खोज में।
घर से बाहर निकला ही था के नजर सब्ज़ी वाले पर पड़ी।  ये सब्ज़ी वाला रोज़ ठेले पर सब्ज़ी लाद कर पिछले कई सालों से मेरे मुहल्ले में सब्ज़ी बेच रहा था और तकरीबन हर घर में उसी से सब्जी ली  जाती थी।  लेकिन आज अकस्मात मुझे उस सब्जी वाले में एक ऐसी चीज दिखी जो पहले कभी नहीं दिखी थी, और वो थी उसकी दाढ़ी।

'अरे  ये तो शायद मुसलमान है।' मैंने हैरत से सोचा।  'इसने दाढ़ी कब रख ली? लगता है ये ही सबसे बड़ा असहिष्णु है।' मेरी खोज का सबसे पहला सब्जेक्ट मुझे घर के बाहर ही मिल गया।

"क्यों भाई सब्जी वाले, तुमने दाढ़ी कब से रख ली?" मेरे स्वर में प्रश्न कम आरोप ज़्यादा था।

"क्यों मज़ाक करते हो मास्टर साहब? ये दाढ़ी तो पिछले चालीस सालों से रखी है"

"चालीस सालों से?" मेरे स्वर में अब हैरत थी।  "तो मुझे अब तक दिखी क्योंनहीं?"

"आप रोज़ तो देखते हो।" वो मुस्कराता हुवा बोला।  "लगता है आज स्कुल की छुट्टी है, तभी गरीब आदमी की मौज ले रहे हो"

"छोड़ो, ये बताओ असहिष्णुता है?" मैंने डायरेक्ट विषय पर आते हुवे प्रश्न दागा

"नहीं, बस आलू है, प्याज है, भांटा है."

"अरे मेरा मतलब वो नहीं था।  ये बताओ असहिष्णुता कहां मिलेगी?"

"पता नहीं मास्टर साहब। हमारी मंडी में तो कभी आई नहीं है और न मैने कभी बेचीं है।"

"अरे आलू भांटा छोड़ कर कभी देश के बारे में भी सोचो और बताओ असहिष्णुता कहां मिलेगी?"

"ये बड़े लोगों की चीज होगी साहब, वहीं मिलेगी जहां से बड़े और पढ़े लिखे लोग खरीददारी करते हैं।  किसी मॉल में।  गरीब आदमी ये सब नहीं खरीदता"

'कैसा अहमक है ये' मैंने झुंझलाते हुवे सोचा 'इतनी बड़ी समस्या जिस पर राष्ट्रीय बहस चल रही है उसे ये आलू-भांटा समझ रहा है।  इन जैसे लोगों के कारण ही देश का यह हाल है।'

"अच्छा यह बताओ, तुमसे इस मोहल्ले में कौन कौन सब्ज़ी खरीदता है?"

"सभी खरीदते है"

"वो तिवारी जी?"

"वो भी"

"और गुप्ता जी?"

"गुप्ता जी भी, लेकिन मोल भाव बहुत करते है"

"और ठाकुर साहब?"

"ठाकुर साहब को तो हम गांव से घी भी ला कर देते हैं"

"ये बताओ, इस मोहल्ले में कोई ऐसा भी है जो तुमसे सब्ज़ी नहीं लेता हो?"

"हाँ  है"

"कौन?" मैंने अति उत्साह से पूछा।

"जिसको उस दिन सब्ज़ी की जरूरत नहीं होती" उसने मासूमियत से जवाब दिया।

"तुमको इस मुहल्ले में सब्जी बेचने में कोई दिक्क्त नहीं होती?"

"बहुत होती है"

"क्या?" मैंने असहिष्णुता मिलने की आशा से पूछा।

"सड़क बहुत खड़बड़िया है।  ठेला पलटने का डर रहता है। "

मैं समझ गया के अब इसके साथ समय खराब करने से कोई लाभ नहीं है।  या तो मेरी बात समझ नहीं रहा या मैं समझा नहीं पा रहा हूँ।

"अरे मास्टर साहब" किसी ने पीछे से आवाज़ दी।  पलट कर देखा तो यादव जी थे ,

"कहिये?"

"ये मंझावन जाने का रास्ता किधर से है?"

"क्या करेंगे मंझावन जा कर?" मैनें प्रतिउत्तर में प्रश्न दागा।

"वो बेटी की शादी है ना, शहनाई वादक बुक करना है।"

"लेकिन मंझावन के तो सारे शहनाई वादक मुस्लिम हैं?"

"मंझावन क्या, पूरे हिन्दुस्तान के ज़्यादातर शहनाई वादक मुस्लिम हैं"

"हिन्दू लड़की की शादी में मुस्लिम शहनाई वादक?"

"तो क्या हुवा? ज़्यादातर हिन्दू लड़कियों की शादी में शहनाई वादक मुस्लिम ही होते हैं।

"और वो असहिष्णुता ?"

"आप भी पढ़े लिखे हो कर कहां ये सब ले कर बैठे हैं।  ये सब निठ्ठलों का टाइम पास है। "

"आप के हिसाब से कहीं कोई असहिष्णुता नहीं है ?"

"समाज में तो नहीं है, अगर है तो कुछ नेताओं की बकबक में है, मिडिया की टी आर पी में है, विशिस्ट दलों के राजनितिक एजेंडे में है।"

"ठीक पकड़ें हैं। " मैंने बे मन से उनकी बात का समर्थन करते हुवे कहा।  आखिर क्या समझते हैं यादव जी ? उनकी बातों से मैं हताश हो कर अपनी तलाश बंद कर दूंगा ? ऐसा कतई नहीं होगा।  मैं असहिष्णुता खोज कर के रहूंगा। साबित कर दूंगा के देश में असहिष्णुता है। मैं इसी अधेड़ बुन में यादव जी को छोड़ आगे बढ़ गया। मैंने पहले ही सोच लिया था के आज अपनी गाड़ी का नहीं अपितु महात्मा गांधी की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करूंगा।

जल्द ही बड़े चौराहे जाने वाली बस आ पहुंची।  भीड़ तो गज़ब की थी फिर भी मैं चढ़ गया।  आज समझ आया के हिंदुस्तान का आम नागरिक कितनी मुसीबतों के साथ अपने गंतव्य तक पहुंचता है।  बस चल कम रही थी, सवारियां भरने को रुक ज़्यादा रही थी।  जिस बस  में तिल रखने की भी जगह न हो उस बस में न जाने कैसे इतनी सवारियां समाती जा रहीं थीं। तभी एक रामनामी धारण किये बुजुर्ग महिला बस में चढ़ी।  उस महिला को देखते ही एक लड़का जो स्कूल बैग के साथ बैठा था उसने अपनी सीट उस महिला को दे दी। इस दौर में इतनी सभ्यता निश्चित ही हैरान कर देने वाली थी।  पूछने पर लड़के ने बताया के उसका नाम इमरोज़ है और उसकी टीचर ने उसे सिखाया है के यदि कोई महिला या बुजुर्ग खड़ा हो हो तो अपनी सीट उसे दे देनी चाहिए। इस पब्लिक बस पर भी असहिष्णुता मिलने की संभावना समाप्त हो गयी। मैं हताश भाव से अपने निश्चित स्टॉप पर उतर कर नौशाद हुसैन आर्टिस्ट की दुकान पर पहुँचा तो देखा उनकी दुकान पर उनके मैनेजर श्री अग्रज पांडे नाटकों की ड्रेसेज छांटने में मसरूफ थे।

"क्या हो रहा है अग्रज मियां?" मैंने उनका ध्यान आकर्षित करने की गर्ज़ से कहा।

"कुछ नहीं दादा, आज राम लीला की ड्रेसें जानीं हैं वही छांट रहा हूँ। " अपना काम जारी रखते हुवे अग्रज ने जवाब दिया।

"अगर एक मुसलमान की दुकान से हिन्दू रामलीला की ड्रेस जाएगी तो इस देश की असहिष्णुता का क्या होगा?"

"खूब व्यंग्य करते हो दादा" अग्रज ने चुटकी लेते हुवे कहा। "असहिष्णुता देखनी है तो टीवी देखो, व्हाट्सप्प पे जाओ, फेस बुक खोलो, यहां क्या कर रहे हो?  ये हिंदुस्तान है दादा।  यहां हिन्दू किसान के पैदा हुवे गेहूं से मुसलमान की भूख मिटती है तो मुस्लिम घोसी के निकले हुवे घी से आरती के दिए जलते हैं।"  तभी दुकान पर रखे हुवे टीवी पर किसी प्रदेश के राजपाल द्वारा करी गयी विषिश्ट टिप्पणी पर बहस शुरू हो गयी और मैं ये सोचने लगा कि असहिष्णुता आम हिंदुस्तानी में है या आज संवैधानिक पदो पर बैठे विशिस्ट लोगों में है। 
















Tuesday, November 24, 2015

Latest Marketing Trend For Films And Right Wing

मैं दो दिनों से सोच रहा था के अकस्मात ऐसा क्या हो गया के पुरे सोशल मिडिया पर शाहरुख़ और आमिर छा गए। हर एक बढ़ चढ़ कर दोनों की बातें क्यों कर रहा है? दोनों को ही ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी थी जो उन्होंने ऐसा कॉन्ट्रोवर्शियल बयान दे दिया ? फिर मुझे याद आई मार्केटिंग।

पहले 'मेरी आवाज़ सुनो' से लेकर 'बॉम्बे' और 'बैंडिट क्वीन' तक बैन होने की मार्केटिंग स्ट्रैटजी अपनायी जाती थी। ये फ़िल्म आज बैन हो रही है कल बैन हो जाएगी ऐसी अफवाहें फैला कर एक सेंसेशन पैदा किया जाता था और फ़िल्म हिट करवा ली जाती थी। दर्शकों में एक प्रकार का इगो पैदा कर दिया जाता था के कहीं वो उस फ़िल्म को देखने से वंचित न रह जाएँ जो दूसरों ने देख ली।  

फिर आया फ़िल्म 'फायर' के साथ सांस्कृतिक बैन का दौर जिसमें फिल्मों को हिट कराने के लिए राइट विंग राजनैतिक दलों के साथ एक अंडरस्टैंडिंग बनाई गयी। उस अंडरस्टैंडिंग के आर्थिक पक्ष पर मैं कुछ नहीं लिखूंगा क्यों की कुछ चीज़ें समझ तो आतीं हैं पर साबित नहीं की जा सकतीं।  जब फायर रिलीज़ हुई तो स्थानीय सुंदर सिनेमा में मैं पहले दिन का दूसरा शो देखने गया तो देखा के पहले शो में दर्शको की दो ही साइकिलें खड़ी थीं। मै आज की पीढ़ी को बता दूँ के पहले साईकिल स्टैंड की भीड़ एक पैमाना होती थी ये जानने का के फ़िल्म हिट है या फ्लॉप।  टिकट लेने से पहले दिल हिचका पर फिर शबाना आज़मी के नाम पर थोड़ी हिम्मत बाँध कर टिकट लेने पहुंचा तो गेट कीपर राम कुमार ने मना करते हुवे कहा के कहां पैसा बर्बाद करोगे।  दो दिन से ज़्यादा चलेगी नहीं।  और मैं फ़िल्म देखे बगैर वापस आ गया। दूसरे ही दिन शिव सेना ने इस फ़िल्म के खिलाफ फतवा दे दिया।  कुछ दूसरे राजनीतिक दल और सामाजिक दल भी उसमें शामिल हो गए।  परिणाम ? फायर सुपर हिट।
फ़िल्म 'फ़ना' की कहानी भी मिलती जुलती है।  इस बार शिव सेना नहीं भाजपा थी।

फिर 'पिके' के साथ एक नई मार्केटिंग स्ट्रेटजी शुरू हुई।  इस स्ट्रेटजी में भी राइट विंग पार्टी ही पार्टनर थी।  'पीके' ने कितना कमाया ये जग जग ज़ाहिर है पर राइट विंग ने कितना कमाया ये  कभी सामने नहीं आएगा।
अब अगले माह आमिर और शाहरुख़ दोनों की फिल्में रिलीज़ होनी हैं।  फिर राइट विंग के साथ एक समझौता हुवा।  कुछ जहरीले कमेंट स्ट्रैटजी के तहत कर दिए गए बाकी काम तो अंध समर्थक अपने आप को देश भक्त साबित करने की होड़ में पूरा कर देंगे।

जय हो मार्केटिंग  


Thursday, October 15, 2015

Eak Sawal

अभी तक तो मैं ये मानता रहा के गरबा और डांडिया भारत की तमाम लोक कलाओं में से एक है। पूरा बचपन और तरुणाई श्री श्री चतुर्भुज एंग्लो-वैदिक गुजराति स्कूल में डांडिया और गरबा खेलते बीती। गुजरातियों की संगत में रह कर पता नहीं कब मैं गुजराती पढ़ना और बोलना सीख गया जिसके कारण मैं गुजराती साहित्य का भी रस पान कर सका। मैं हमेशा यही सोचता रहा के मैं भारत की एक समृद्ध लोक कला का हिस्सा बन रहा हूँ।  कभी किसी ने ये एहसास भी नहीं होने दिया के इस कला का हिस्सा बनने का अधिकार सिर्फ हिन्दुवों को है।  यहाँ तक के अपनी रजत जयंती पर नवयुवक मंडल ने जब मिमेंटो बाटें तो एक मिमेंटो मेरे लिए भी था।  कहीं भी हिन्दू या गैर हिन्दू की बात नहीं थी।

ऐसा ही कुछ दुर्गा पूजा में भी होता था।  षष्टी के दिन से जो घर छोड़ता था तो प्रतिमा विसर्जन के बाद ही घर लौटता था।  इन चार दिनों में घर से नाता केवल नित्य क्रिया का ही रह जाता था।  खाना पीना सब पाडे मेँ। यहाँ भी मुझे एक और भाषा सिखने को मिली वो थी गुरुवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर की भाषा।  अगर जीवन का यह कल खण्ड यहाँ न व्यतीत करता तो शायद रविन्द्र संगीत की मिठास से अनभिज्ञ रह जाता।  इन्हीं पूजा के पाड़ों से जो नाटकों का शौक लगा वो मरने के साथ ही जायेगा।

लेकिन अब पता नहीं कौन सी हवा चल गयी है के गरबा और डांडिया को भारतीयता से अलग विशुद्ध हिन्दू  मान लिया गया है और गैर हिन्दुवों का प्रवेश वर्जित करने की बात चल रही है।

कभी  दुर्गा पूजा के पंडालों में भी कभी ऐसी बात सुनाई पड़ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।

मैंने तो अपना जीवन जी लिया है।  डांडिया और पाड़ों के चार दिन सुखद स्मृति में ही शेष हैं। अब तो केवल महा अष्टमी के दिन ही जाना हो पाता है।  या फिर किसी विशेष दिन जब कोई बहुत ही अपना कोई कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा होता है।

लेकिन उस पीढ़ी का क्या जो अब आगे आ रही है ? अगर हर चीज़ पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगने लगेगा तो हम समृद्ध होने के बजाय दीन होते चले जायेंगे।
आज क्रिसमस पर मेरे घर क्रिसमस केक चखने के लिए जो चार पांच सौ मित्रो की भीड़
जुटती है क्या वैसी ही भीड़ मेरी बाद की पीढ़ी के घर भी जुटेगी ?

Tuesday, October 13, 2015

Vikas ki kimt bhag 1

श्री प्रदीप कुमार खन्ना जी के विशेष स्नेहपूर्ण आग्रह पर लिखा गया व्यंग्य

श्री विकास पुरुष गरीबों के गाँव में भाषण देते हुवे

'भाइयों, आपको कैसा देश चाहिए ? कमज़ोर ? या मजबूत ?

'मजबूत ' सभी ने एक स्वर में सहमति जताई।

इस प्रश्न को उन्होंने ठीक उसी तरह तीन बार दोहराया जिस प्रकार मार्क एंटोनी ने रोम में प्रजातंत्र खत्म कर सीजर को डिक्टेटर बनाने के तिहराया था ताकि रोम वासी क्या खाएं, क्या पहने, क्या लिखे, क्या पढ़े; सब पर सीजर की व्यक्तिगत सेना का कब्ज़ा हो सके और उसकी सेना ये तय करे के किसके घर पर आक्रमण करना है और किसके मुंह पर स्याही फेंकनी है।

'भाइयों, राष्ट्र वही मजबूत बनता है जिस राष्ट्र के लोगों में कुर्बानी देने का जज्बा होता है। लेकिन आज हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न ये है के इस नए भारत के विकास के लिए कुर्बानी कौन दे ? मैं कश्मीर भी गया, कन्या कुमारी भी गया।  असम से  ले कर गुजरात तक लोगों से बात की ।  मेरी आँखें भर आयीं जब मैंने देखा के सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी इस देश के विकास के लिए कुर्बानी देने को त्तपर खड़े हैं। बहुत गहराई से देखने के बाद ये पता चला के इस देश में दो तरह के लोग हैं।  एक कमज़ोर और दूसरे मजबूत।  अब अगर मजबूत लोगों की कुर्बानी ली गयी तो देश में कमज़ोर लोग बचेंगे। बचेंगे के नहीं?

'बचेंगे' भीड़ ने कोरस में सहमति जताई।

'और जिस राष्ट्र की जनता कमज़ोर हो राष्ट्र मजबूत कैसे बन सकता है? इसीलिए इसलिए राष्ट्र हित में कुर्बानी मजबूत नहीं कमज़ोर लोग दें।  ताकि देश में मजबूत लोग बढ़ें और हमारा राष्ट्र तेजी से तरक्की कर सके।  कमज़ोरों की कुर्बानी से जो जगह खाली होगी वो मजबूतों को मिलेगी और देश में भरपूर विकास आएगा।  मसलन आज आप अपनी अपनी छोटी छोटी जोतों पर एक दो कुंतल अनाज पैदा करते हो, उसी जमीन पर सैकड़ों टन लोहा पैदा किया जायेगा। तो बोलो विकास होगा के नही?

'होगा' कोरस ने फिर दोहराया।

विकास होगा के नहीं?

'होगा'

'विकास होगा के नहीं ?

'होगा'

                                                                                      क्रमश;

Tuesday, August 18, 2015

Kabristan

तीन मुट्ठी मिट्टी अपने पती की कब्र में डाल कर मुड़ी ही थी के उसके पैर लड़खड़ा गए। उसे लगा के जैसे वो गिर ही जायेगी के तभी दो मजबूत हांथों ने उसे संभाल लिया। ये हाथ विक्टर के थे।
'संभल कर नैन्सी', विक्टर उसे आगाह करता हुवा बोला।  
 'हाँ, थैंक्यू' - नैंसी ने रुंधे हुवे गले से विक्टर को धन्यवाद दिया।
'आओ तुम्हें तुम्हारी कार  तक पहुंचा दूँ। '
'नहीं में चली जाउंगी। ' नैन्सी ने लगभग सुबकते हुवे प्रतिकार किया।
'नहीं नहीं कोई बात नहीं मैं पहुंचा देता हूँ। '
'क्यों परेशान होते हो?'
'इसमेँ परेशानी की क्या बात है ?'

नैंसी के पति की मिट्टी अभी यूँ तो पूरी तरह से दफनाई भी नहीं गयी थी के सारे रिश्तेदार-नातेदार, दोस्त और पड़ोसी उसकी कब्र के पास से तितर-बितर हो गए थे। कुछ अपने अपने अजीजो की कब्र के पास खड़े ये जताने की कोशिश कर रहे थे के वे उन्हें कितना मिस कर रहें हैं तो कुछ मिटटी डालने से गंदे हो चुके अपनें हाथों को धोने के लिए पानी तलाश रहे थे।  बाकी बचे लोग समूह बना कर राजनीती से लेकर आज शाम होने वाली पीटर की लड़की की शादी में पहुंचने का टाइम फिक्स कर रहे थे। नैंसी जैसे किसी को दिख ही नहीं रही थी।

उधर विक्टर का सहारा लिए नैंसी अपनी कार की ओर बढ़ी जा रही थी।  अब उसके हाथों में एक रुमाल आ चुका था जिससे वो रह रह कर अपनें आँसू भी पोछती जा रही थी।

'अपने आप को संभालो नैंसी।  ऐसा कैसे चलेगा ?' विक्टर ने उसे समझाने की कोशिश की।
'ओ विक्टर............. '
'तुम बिलकुल परेशान न होना' विक्टर ने उसके लिए कार का दरवाज़ा खोलते हुवे कहा।
'हाँ नहीं होउंगी, बिलकुल नहीं होउंगी। ' नैन्सी सीट पर बैठने का प्रयत्न करते हुवे बोली। 'मुझे यहाँ तक सहारा देने के लिए शुक्रिया'
'इसमें शुक्रिया की क्या बात है ? मैं  तो कुछ और भी कहना चाह रहा था '
'क्या?'
'तुम कहो तो मैं पूरी ज़िन्दगी के लिए तुम्हारा सहारा बन जाऊं'
'ओ विक्टर, तुमने बहुत देर कर दी' नैन्सी गहरी साँस छोड़ते हुवे बोली।
'क्या मतलब?' विक्टर से स्वर में हैरत थी।
'मैं पहले ही किसी को हाँ कह चुकी हूँ'
'किसे?'
'जॉन को'
'कब ?'
'अभी थोड़ी देर पहले जब वो मुझे घर से कब्रिस्तान ले कर आ रहा था।'




Friday, August 14, 2015

Girgitani Joote

                                                       गिरगिटानी जूते
                                                                    लघु नाटिका
                                                                           लेखक नीरज हेस्टिंग्स

                                                          दृष्य : सड़क
                                                          समय : करीब प्रातः १० बजे

एक भिखारी भीख माँगते हुवे प्रवेश करता है

भिखारी : ए माई, कुछ खाने को दे न माई।  दो दिनों से भूखा हूँ माई। तेरे बच्चे जिएंगे माई।  तेरे घर में
               खुशियाली आएगी माई।

                    अध्यापक का प्रवेश।  भिखारी उसे देख कर उससे भी भीख माँगता है

भिखारी : ए मास्टर साहब।  कुछ दे न मास्टर साहब।

अध्यापक :क्यूँ दूँ ?

भिखारी : तेरे बच्चे जिएंगे मास्टर साहब।

अध्यापक : नहीं दूँगा तो क्या मर जायेंगे ?

भिखारी : अरे गरीब की दुआ लगेगी तो ज्यादा जिएंगे।

अध्यापक : तुम्हें भीख मांगते शर्म नहीं आती ?

भिखारी : शर्म कहे की मास्टर साहेब ? भीख तो बड़े बड़े नेता माँगते है।  जब चुनाव आता है तो वोट की भीख।
               जब किसी दूसरे देश जाते है तो सहयोग की भीख।  जब दूसरे देश का नेता हमारे यहाँ आता है तो
               डॉलर की भीख।  स्स्स्सब भिखारी हैँ।

अध्यापक : बातें तो तू बड़ी बड़ी करता है।  कोई काम क्यों नहीं करता ?

भिखारी : आप अपने स्कूल में काम दिला दो।

अध्यापक : तू पढ़ा लिखा नहीँ है।

भिखारी : चपरासी ही बनवा दो।

अध्यापक : वेकेंसी नही है।

भिखारी : अपना घरेलू नौकर ही बना लो।

अध्यापक :हाँ ये ठीक है।  लेकिन उससे पहले पुलिस वैरिफिकेशन करवाना पड़ेगा। रेजिडेंस प्रूफ है तेरे पास ?

भिखारी ; जब रेजिडेंस ही नहीं तो प्रूफ कहे का ?

अध्यापक : डी एल ?

भिखारी : उसके लिए आइ डी चाहिये।

अध्यापक : तो बनवा लो न आई डी।

भिखारी : उसके लिए वोटर कार्ड चाहिए।

अध्यापक :तो वोटर कार्ड बनवा लो।

भिखारी : उसके लिए राशन कार्ड चाहिए।

अध्यापक : (झुँझला कर) तो राशन कार्ड क्यों नहीँ बनवा लेते ?

भिखारी: उसके लिए रेजिडेंस प्रूफ चाहिए।

अध्यापक : और वो तुम्हारे पास है नहीं।

भिखारी : देखा ना मास्साब, प्रजातंत्र में प्रजा किस तंत्र में फँस जाती है।  आप होते तो हैं लेकिन होते नहीं,
               अगर आप के पास आपके अपने होने का प्रमाण नहीं होता।  अब बताइये, आप कहते हैं काम करो।
               कैसे करें काम ? कौन देगा हमें काम ? वैसे भी हमारा ये भीख मांगने का बिजनेस बहुत बढ़िया है।
               जीरो इन्वेस्टमेंट, जीरो रिस्क, प्रॉफिट हंड्रेड पर्सेंट।

अध्यापक :अगर इसी तरह भीख मांगते रहोगे तो तुम्हारे बच्चों का क्या होगा ? उनका भविष्य क्या होगा?

भिखारी : हमारे बच्चों की चिंता न करें।  वो अभी से मुझसे आगे निकल गए हैं।

अध्यापक : (आश्चर्य से ) तुम्हारे बच्चे तुमसे आगे निकल गए ?

भिखारी : (गर्व से) जी हाँ।

अध्यापक : वैरी गुड वैरी गुड।  क्या करते हैं वो ?

भिखारी :भीख मांगते हैं।

अध्यापक : (घृणा से) भीख मांगते हैं ? फिर तुमसे आगे कैसे निकल गए ?

भिखारी : मैं तो बस इस छोटी बाज़ार में भीख मांगता हूँ लेकिन मेरे बच्चे---वो---वो बिग बाजार में भीख मांगते
              हैं।

अध्यापक : बहुत खूब बहुत खूब।  बड़े लोग आते हैं वहां।  खूब भीख मिलती होगी ?

भिखारी : (उदासी से) अजी कहाँ साहब ! जितना बड़ा आदमी उतना छोटा दिल। उनकी जेब से पैसा ही नहीं
               निकलता।

अध्यापक : फिर ?

भिखारी : लेकिन हमारी औलादें भी इंटरनेटी औलादें हैं।  उन्होंने उसका भी तोड़ निकल लिया।

अध्यापक : क्या तोड़ ?

भिखारी : अगर कोई नया जोड़ा आता है तो वो उसके पीछे ही पड जाते हैं।  उन्हें तब तक आपस में बात नहीं
               करने देते जब तक के वो मोती रकम भीख में नहीं दे देता।

अध्यापक : ये तो सरासर ब्लैकमेंलिंग है।

भिखारी : आप इसे ब्लेकमेलिंग कहते होंगे, हम तो इसे इनोवेटिव मार्केटिंग कहते हैं।

अध्यापक  : अच्छा मैं चलता हूँ।  स्कूल जा कर साइन कर के फौरन घर वापस लौटना है।

भिखारी : साइन कर के फौरन घर वापस लौटना है ? पढ़ायेंगे नहीं बच्चों को?

अध्यापक : क्लास में पढ़ाने लगा तो कल चुकी मेरी कोचिंग। (जल्दी से बाहर निकल जाता है)

भिखारी : वह मास्टरसाहब! सही कहा है किसी ने 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे '

तभी दो विपरीत दिशाओं से दो माफिया गैंग एक दूसरे पर गोलियां क्लाते हुवे मंच पर आते हैं। भिखारी डर के मारे  बैठ जाता है।  तभी एक माफिया डॉन को गोली लग जाती है और वह गिर कर मर जाता है।  उसका गैंग भाग जाता है।  जिस माफिया डॉन ने उसको गोली मारी  थी वह उसकी लाश के पास जा कर उसको ठोकर मारता है और अपने आदमियों से कहता है

डॉन; जल्दी से इसकी पिक क्लिक कर के उसे फेस बुक पर अपलोड करो।

आदमी : इस बॉस

उसका आदमी पिक क्लिक करता है तभी डॉन की नज़र भिखारी पर पड़ती है

डॉन : अरे बादशाओं, आप यहां क्या कर रहे हो  ?

भिखारी : (डरते हुवे) जी में बादशाह नहीं भिखारी हूँ।

डॉन : अरे सुना तुम लोगों ने ? ये बादशाह खुद को भिखारी बता रहा है।

                             सब हँसते हैं

डॉन : हाँ तो बद्शाओ, अभी क्या देखा आपने ?

भिखारी : जी कुछ नहीं।

डॉन : अंधे हो ?

भिखारी : जी नहीं।

डॉन : तो फिर देखा कैसे नहीं ? तुमने देखा के दिलावर सिंह ने अकेले ही ------

सब आदमी : अकेले नहीं हम सब के साथ ------

डॉन : हाँ वही -----डॉन माई का लाल -------

सब आदमी कोरस में : बॉस, माई का लाल नहीं माइकल।

डॉन : हाँ वही..... लोहा लेते हुवे अपने आदमियों के साथ अकेले ही गोली मर दी।

भिखारी : किस्से कहना है ?

डॉन: पुलिस से

भिखारी : फिर तो पुलिस आपको पकड़ लेगी।

डॉन: ओ नइँ बद्शाओ---माई के लाल को गोली मार  के साडा इण्डिया में वर्ल्ड फेमस हो जायेगा।  पहले
         पॉलिटिकल पार्टी वाला लोग हमें विधायक बनाएगा फिर सांसद, फिर मिनिस्टर।  फिर हम इस देश
        का कानून बनाएगा। वैसे भी साला आजकल इण्डिया में कानून बनाने वाला बनने के लिए पहले कानून
        तोड़ने वाला बनना ज़रूरी है।  आज हम तुम्हारी किस्मत भी बदल देंगे----तुम नंगा पांव है---इस आदमी
        का जूता पहन लो।  क्या याद करोगे तुम---दिलदार दिलावर से पाला पड़ा था।  चलो ओय सब।

सब बाहर निकल जाते हैं। भिखारी डरते डरते लाश के जूते निकल कर पहनता है। जैसे जैसे वह जूते पहनता जाता है वैसे वैसे उसके भाव एक दयनीय भिखारी के भाव से एक खूंखार डॉन के भाव में बदलते जाते हैं। वो
डॉन की तलाशी लेता है।  डॉन की जेब से गण निकलती है। अब उसके चेहरे पर अपराधी के भाव हैं।  वो डॉन का कोट भी उतार कर पहन लेता है।  अब वो भिखारी नहीं एक खूंखार अपराधी है।

                                       तभी अध्यापक आता है

भिखारी : कौन है बे ?

अध्यापक : ये कैसे बात कर रहे हो तुम?

भिखारी : ये इच अपुन का इस्टाइल है।

अध्यापक : साले भिखारियों का भी स्टाइल होने लगा?

भिखारी : लगता है पहचानता नहीं है मुझे !

अध्यापक : पहचानता हूँ पहचानता हूँ, फुटपाथ के भिखारी।

                   भिखारी ग्न निकल कर मास्टर के माथे पर लगा देता है

भिखारी ; औकात मैं ! औकात में ! अगर ये पिट बोल गयी तो साले फोटो बन कर टंग जाओगे।  जानता नहीं
               मैं कौन हूँ ? मैं हूँ माइकल।

अध्यापक ; कौन माइकल साहब ?

भिखारी : माइकल मार्कोस।  इस इलाके का सबसे बड़ा डॉन। ड्रग्स, हथियार, किडनैपिंग धंधा है मेरा।  जनता
               हूँ के ये गंदा है, पर क्या करूँ फिर भी ये धंधा है।  इधर अपुन पंटर लोग का वेट कर रइला है।

अध्यापक : (हकलाते हुवे) इस आदमी को आपने मारा ?

भिखारी : नाआआयी।  दिलावर गैंग का काम है ये। अब अपुन बदला लेगा।

अध्यापका : कुछ देर पहले तो आपने कहा था के आपका कोई रेज़िडेंस नहीं है ?

भिखारी : डॉन लोगों का रेजिडेंस नहीं, डेन होता है डेन।  इस शहर में अपुन का दस दारू का अड्डा, चार
               जुवाखाना और ४० पंटर लोगों की गेंग है गेंग। बेटिंग करता है बेटिंग ?

अध्यापक : जी नहीं, मैं सिर्फ बॉलिंग करता हूँ

भिखारी : ठीक करता है।  वरना तेरा ये झोला झंडा तक बिक जाता। और सुन, आज अभी जो तूने देखा है वो
               किसी को बोलना मत, वरना तेरा भी यही अंजाम होगा।  (बेचैनी से) ओ इन जूतों में लगता है के
                कोई कीड़ा घुस गया है।

                  ज़मीन पर गन रख कर जूते उतारता है जैसे ही वो जूते उतारता है वो वापस भिखारी बन जाता है।

भिखारी : ए माई, कुछ खाने को दे ना माई।  भगवान भला करेगा माई।

                   अध्यापक आश्चर्य से उसे देखता है फिर जल्दी से कांपते हाथों से गन उठा लेता है

अध्यापक : अभी देता हूँ तुझे खाने को।  गोली खायेगा ?

भिखारी : क्यों एक भिखारी से मज़ाक करते हो मास्टर ?

अध्यापक : भिखारी? या माइकल मार्कोस ?

भिखारी : कौन माइकल? कौन मार्कोस?

अध्यापक :ड्रग्स, हथियार, किडनैपिंग, ४० पंटर लोगों का गैंग ! हैं ?

भिखारी : ये क्या बोल रहे हो मास्टर? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा ?

अध्यापक : अभी सब समझ में आता है।  इस आदमी को तूने मारा है। अब चल पुलिस स्टेशन। तुझे परमानेंट
                  एड्रेस दिलवाता हूँ।

भिखारी : ये आप क्या कह रहें हैं ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।

अध्यापक : अभी सब समझ में आता है। चल पहन जूते।  (चिल्ला कर) पहन !

                    भिखारी धीरे धीरे जूते पहनता है।  जैसे जैसे वो जूतों में पैर डालता है वैसे वैसे उसके चेहरे के भाव
                     बदलते जाते हैं। जैसे ही वो जूते पहन लेता है उसके भाव वापस गैंगस्टर के भाव में बदल जाते
                     हैं।  वो अध्यापक को थप्पड़ मारता है।  अध्यापक ज़मीन पर गिर जाता है। गन भिखारी के पैर
                     के पास गिरती है।

भिखारी : (गन उठाते हुवे) माइकल से टककर ? (अध्यापक को गन पॉइंट पर लेते हुवे) मुझे गन दिखता है ?
               अब तू नहीं बजेगा !

अध्यापक : मुझे माफ कर दो माइकल भाई !

भिखारी : कल याद कर अपने खुदा को! (उसके माथे पर गन रखता है लेकिन जैसे ही वो उसे शूट करने चलता
               है उसके जूतों में फिर प्रॉब्लम होती है) ओह ! ये जूते ! (पिस्तौल खोंस कर जूते उतारता है, उतारते ही
               फिर से भिखारी बन जाता है)

भिखारी : ए माई ! चार दिनों से भूखे भिखारी पर कुछ तो तरस खाओ माई। ए माई, कुछ तो खाने को दो न
               माई।  ए माई.……

अध्यापक : (स्वयं से) जैसे ही ये अपने जूते उतारता है वापस अपनी औकात पर आ जाता है।  अगर इससे
                  इसके जूते छीन लियें जाएँ तो मामला बन सकता है।

भिखारी : (जैसे ही उसकी नज़र जूतों पर पड़ती है वो ख़ुशी से चीख उठता है) जूतेएएएएए !

अध्यापक : खबरदार।  उन जूतों को हाथ मत लगाना !

                   भिखारी जल्दी से जूतों में पैर डालता है। उसके भाव बदल जाते हैं। वो वापस गन निकालता है

भिखारी ; तू अभी तक ज़िंदा है।  कल मरने को तैयार हो जा !

अध्यापक : (रोते हुए) मैनें आपका क्या बिगाड़ा है ?

                        भिखारी अध्यापक पर निशाना साधता है

अध्यापक ; (रोते हुवे) मुझे मत मारो प्लीज़ !

                        भिखारी की उँगलियाँ ट्रिगर पर कसती हैं

अध्यापक : (रोते हुऐ) मैं मरना नहीं चाहता !

                          तभी दिलावर का गन लिए हुवे प्रवेश

दिलावर : ओ बादशाहों।  अभी यहीं हो ?ये क्या गन शन तान रखी है ?

भिखारी : (गन दिलावर की तरफ तान कर दाँत पीसते हुवे) दिलावर ! अपनी मौत के लिये तैयार हो जा !

दिलावर : ओय ! ये भिखमंगा डॉन की भाषा बोल रहा है !

                      दिलावर भिखारी की तरफ गन तानने की कोशिश करता है लेकिन भिखारी पहले ही उसे गोली
                      मार देता है।  दिलावर मर जाता है।  अध्यापक बेहोश हो जाता है

भिखारी : अगर चलानी है तो गोली चलाओ ज़बान नहीं।

                       पिस्तौल की नाल में फूंकता है


                                       फ्रीज़

नोट : यह नाटक वीरेन्द्र स्वरूप पब्लिक स्कूल द्वारा आयोजित अंतर-विद्यालय नाट्य प्रतियोगिता २०१४ में
          प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुका है










Wednesday, August 12, 2015

Good Work

                      गुड वर्क 

                                             नीरज हेस्टिंग्स 


नर्सिंग होम में अफरा तफरी का माहोल था। मरीजों के तीमारदार डरे सहमें इधर उधर दुबके हुवे थे। यकायक दरोगा जी अपनी मोटर साइकिल से वहां पहुंचे।  उन्हें खबर लग चुकी थी के तीमारदारों का गुस्सा अपने मरीज की मौत पर भड़का हुवा था।  मरने वाले के बेटे 'प्रमोद' का इल्ज़ाम था के उसके बाप की मौत गलत इंजेक्शन देने से हुई है।  जबकी नर्सिंग होम के डाक्टरों का कहना था के मरीज बहुत ही क्रिटिकल हालत में वहां लाया गया था और उन्होंने उसे बचाने का पूरा प्रयास किया था। मरीज की वास्तविक स्तिथि के बारे में परिवार को बताया जा चुका था। 
दरोगा जी ने पहुंचते ही सबको डपटा, फिर प्रमोद को विस्वास दिलाया के उसके साथ इंसाफ होगा। दरोगा जी डाक्टर के चेंबर के अंदर चले गए और थोड़ी देर बाद प्रमोद को भी अंदर बुला लिया। कुछ देर बाद चेम्बर का दरवाज़ा खुलता है और सब संतुष्ट।  डॉक्टर साहब संतुष्ट थे के नर्सिंग होम की रेप्युटेशन बच गयी। प्रमोद इसलिए संतुष्ट था के उसने  केवल नर्सिंग होम का बिल माफ करवा लिया अपितु दस हज़ार रुपय नगद भी झटक लिये।  आखिर इसीलिए तो उसने सारा नाटक रचा था, वरना बाप तो महीनों से बीमार था और बिना इलाज के मर रहा था। दरोगा जी इसलिए संतुष्ट थे के उनकी जेब भारी हो चुकी थी और कैरियर में उनके गुड वर्क के नंबर भी जुड़ गए थे। 


     

Tuesday, August 11, 2015

Darcy And The Dead

                                 Darcy And The Dead

                                              A shorty play by Neeraj Hastings



Darcy comes out from the Casino, foot man intercepts him
Footman: Your car sir?
Darcy: No I would prefer to walk down to Pemberley
Footman: It may be dangerous sir with the road hold-ups and Mafia shoot out around for the owner of a
                  casino stepping out and moving alone?
Darcy: How dare you advice me? Do you expect Mr. Fitzwilliam Darcy to go on the advice offered by a  
           footman?
Footman: My apologies sir. I thought………
Darcy : You thought? Who has given you the authority to think? I am sure that authority has not been
              extended to you from my end!
Footman: No sir!
Darcy: I believe it would be better if you get back into Casino and bring back my cigar case from my    
            office drawers .

Footman: I will be right back sir.

                                  Goes

Suddenly the two gangs entire on the stage from two different directions shooting vigorously at each other. Darcy stands surprised watching the cross fire. Suddenly one gangster is shot and his gang runs away. The other mafia don goes to the dead body of the victim and kicks him, and then he looks at Darcy.

Gangster: Hey you nuts!

Darcy: Excuse me fellow. Do you know the gentleman you address so rudely as nuts? I am Mr.
             Fitzwilliam Darcy who owns the Pemberley estate.

Gangster: (Gives a loud and hearty laugh) Hey you folks! Did you get what this geek says?

Henchmen: No

Gangster: He says that he is a gentleman

Henchmen: A Gentleman?

Gangster Yes, a gentleman who owns Pemberley estate! Isn’t it you nerd?

Darcy: Yes! I own Pemberley estate but I am no nerd.

Gangster: No You are a Gentleman because you put on ambassador shoes. Isn’t that fellows?
Henchmen: Yesssssssss

Gangster: A gentleman is known by the shoes he wears

Henchmen: Yesssssss

Gangster: Should I become a gentleman too?

Henchmen: Yesssssssss

Gangster: But how can I become a gentleman?

Henchmen: By putting on his ambassador shoes.

Darcy: No, no you dare not touch my shoes. They have been imported from Milan.

Henchmen: Milaaaaaaannnn?

Gangster: Oooooooooo. (reaches to him) So Mr. Gentleman? Are you taking off your shoes or (takes him on gunpoint) I make a hole in your head ?

Darcy: Yes yes you may have them. Have them (hurriedly takes his shies off) Here they are!

                        Gangster picks his shoes up

Gangster: Let us move folks  (they start moving out)

Darcy: No you cant get away like this, leave your shoes behind. How can I go without my shoes on?

Gangster: Put on the shoes of the Dead. Folks let us move on, leaving behind Darcy and the dead.

                            They all move out. Darcy goes to the dead man. Very hatefully he takes
                            off the shoes of the dead man and puts them on. As he is putting on the
                           shoes his expression change from sophisticated to crude. He searches the pockets of the
                           dead man and comes out with a gun. He takes off his jacket and changes with his coat.
                          Puts on the cap of the gangster too. Now he is a hard core criminal.

                                                 Enter the footman

Footman: Here is your cigar case sir. (Suddenly looks at Darcy and is surprised)

Darcy: Hey you rogue!

Footman: (surprised) Sir!

Darcy: Don’t act nuts. Do you know me?

Footman: Yes sir. You are Mr. Darcy,

Darcy: Don’t try to play smart with me. A single bullet can put an end to all your goofiness I am Marcos.

Footman: (surprised) Marcos? Who is Marcos?

Darcy: Yes. I am Marcos the Don. Dealer in drugs, narcotics, kidnapping. I am waiting for my punters
             here.
 Footman: Punters? Did you kill this man sir?  

Darcy: No, by the Devil gang and I have to pay back.

Footman: But sir you are Mr. Darcy the owner of  the Pemberley estate.

Darcy: What Pemberley estate. I own two ale houses, an illegal gambling den and a gang of 40 punters

Footman: No sir. Your gambling house is not illegal. It is a registered casino.

Darcy: Will you shut up you monkey head. You clear off from here and mind not to speak of anything to
             anyone or your next destination will be two feet deep in the ground. I am on my way to take my
             revenge. Uff. These shoes don’t fit me well.

                             (He keeps the gun down. Takes off his shoes. The moment he takes off his shoes he
                               returns to be Darcy. Meanwhile footman his picked up his gun)

Footman: If you move I shoot

Darcy: Do you know who you are talking to?

Footman: Yes. I am talking to Marcos the Don who owns two ale houses, an illegal gambling den and a
                   gang of 40 Punters.

Darcy: Don’t you know that I am Mr. Fitzwilliam Darcy the owner of Pemberley estate? And you are my
            footman.

Footman: Yes I am the footman of Mr. Fitzwilliam Darcy the owner of Pemberley estate. What have you
                   done with him? Killed?

Darcy: I am Mr. Fitzwilliam Darcy. Why would I kill my own self? Where did you get that gun from?

Footman: From You

Darcy: I don’t carry a gun. What a senseless statement you are making before your honorable master
             who you have been serving for so many years, common put that gun away. I have to go to
             propose Miss Elizabeth Bennet.

Footman: No you have to go to go to pay back the devil gang, but you are going nowhere but to the
                   police station on the charge of the murder of this poor man and my master Mr. Fitzwilliam
                   Darcy.

Darcy: I am Mr. Fitzwilliam Darcy. How would I murder my ownself you block headed scoundrel.

Footman: Nothing doing. Just put on those shoes of yours and get moving. Common.

Darcy: (heavily insulted) You will have to pay for the insulting rude behavior of yours (reluctantly puts on
             his shoes. As he puts on the shoes there is a change in his behavior. He slaps the foot man and
             snatches the gun) How dare you touch that gun of mine?

Footman: (Surprised) Mr. Darcy!

Darcy: Who is this Darcy? I told you I am Marcos the Don who owns two ale houses, an illegal gambling
             den and a gang of 40 punters.

Footman: I beg your pardon sir

Darcy: So you are a beggar!

Footman: No, I was just begging your pardon sir

Darcy: No matter what you beg, a beggar is a beggar

Footman: (aside) I believe there is some miracle in his shoes. I will have to check them out.

Darcy: What are you grumbling? I believe you are not swearing on me.

Footman: No sir. I was just thinking to remind you that those shoes of yours……

Darcy: what about them? I always wear them. They are fine shoes. Now I should leave for I have to kill
            that rogue Devil. You are a nice fellow. Do you want to join my gang. There is still a vacancy for
            two shooters. Can you kill a man?

Footman: No sir

Darcy: Then you will have to die, sonny. You can’t get away after meeting Marcos.

Footman: But sir I bring no harm.

Darcy: That is why you are of no use. To profit in this world you have to bring harm.

             Enter Devil with a gun in his hand

Devil: Hey you nuts. Still there?

Darcy: Devil, Be ready to meet your death

Devil: Oh the gentleman is speaking like a gangster.

         Darcy shoots at him. Devil falls Footman is surprised and terrified

Darcy: When you shoot, just shoot, don’t talk

             Fallen devil also shoots at Darcy. Darcy falls dead. Devil also dies.

Footman: A man is known by the shoes he wears.


                              The End

Note: This play was awarded second prize in Inter-School Drama Competition 'Panorma-2014' held at Delhi Public School, Kalyanpur





















Sunday, August 9, 2015

रंग जगत के सभी आंदोलनकारियों का मै पूरे मन से नमन करता हू। उनके लिए प्रस्तुत हैं मेरी स्वलिखित कुछ नाट्य कृतियाँ जो वें जब चाहे जहां चाहे प्रस्तुत कर सकते है। किसी भी कृति पर कोई भी रॉयल्टी देय नहीं है।  निवेदन बस ये है कि मुझे सूचित अवश्य करें।  मेरा ई मेल एड्रेस नीचे दिया है।
धन्यवाद।
आपका
नीरज हेस्टिंग्स
neerajneeraj123123123@gmail.com