लेनिन की मूर्ती पर रबरब
आज सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर जो सबसे बड़ी आपराधिक घटना उभर कर आ रही है वो है लेनिन की मूर्ति का तोडा जाना जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप कलकत्ते में श्यामाप्रसाद जी की मूर्ती,
मेरठ में अम्बेडकर जी की मूर्ती तथा वेल्लौर में पेरियार जी की मूर्ती को खंडित किया गया। बात यहीं तक थम जाती तो भी गनीमत थी, किन्तु ये आग तो धीरे धीरे पूरे देश में फैलती ही जा रही है।
चूंकि सारा खेल लेनिन की मूर्ती तोड़े जाने से शुरू हुआ था इस तो बात वहीं से शुरू करते हैं। बड़ा प्रश्न ये है के बेलोनिया कस्बे में जहां लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई वहां मूर्ती तोड़ने वाले कितने लोग वास्तव में लेनिन के बारे में जानते थे। और जितने लोग लेनिन की मूर्ती तोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं वे कितना लेनिन के बारे में जानते हैं। जिन्होंने मूर्ती तोड़ी वो तो वास्तव में उस विचार धारा से आते है जिसमें तोड़ फोड़ और विधटन ही उनकी असली पहचान है। क्या तोडा, क्यों तोडा इससे उनको मतलब नहीं। बस तोडा ये ही बहुत है, जिसे अंगरेजी में कहते हैं 'टारगेट अकम्पलिश्ड'।
जो लोग विरोध कर रहे हैं वो केवल इस लिए विरोध कर रहे हैं क्यों के उनके राजनीतिक आका चाहते हैं के इसका विरोध हो। वे भी लेनिन में विशेष कुछ नहीं जानते।
अब प्रश्न ये है के क्या लेनिन में ऐसा कुछ था के उसकी मूर्ती दुनिया के किसी भी शहर में लगाई जानी चाहिए ?
अगर लेनिन की मूर्ती लगाई जा सकती है तो उससे पहले हिटलर की लगाई जानी चाहिए। आखिर उसने मेजर ध्यान चंद को सम्मान और नेताजी को समर्थन दिया था। क्या मूर्ती तोड़ने का विरोध करने वाले जानते हैं के लेनिन और ट्रोट्स्की ने मिलकर सोवियत राज्य में करीब चालीस लाख हत्याएं की थीं जिसमे मर्द, औरत और बच्चे शामिल थे। ये हत्याएं बड़े पैमाने पर निष्पादन, मृत्यु शिविर, एवं राज्य प्रायोजित प्राकृतिक आपदा के नाम पर की गई थीं। कितने लोग इस बात को जानते हैं के लेनिन वो व्यक्ति था जिसने अपने ही देश के लोगों पर कैमिकल बॉम्बिंग की थी ? द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने ही नागरिकों को मारने में सोवियत राज्य नंबर एक पर था जबकि नाज़ी नंबर दो पर। लेनिन प्रजातंत्र और प्रेस की आज़ादी के भी खिलाफ था।
अगर लेनिन के अत्याचारों पर लिख्ने बैठू तो पूरी एक पुस्तक लिखनी पड़ेगी। एक पोस्ट में कहाँ सब कुछ समायेगा।
अब आपको तय करना है की लेनिन की मूर्ती भारत में लगनी चाहिए या नहीं।
आज सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर जो सबसे बड़ी आपराधिक घटना उभर कर आ रही है वो है लेनिन की मूर्ति का तोडा जाना जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप कलकत्ते में श्यामाप्रसाद जी की मूर्ती,
मेरठ में अम्बेडकर जी की मूर्ती तथा वेल्लौर में पेरियार जी की मूर्ती को खंडित किया गया। बात यहीं तक थम जाती तो भी गनीमत थी, किन्तु ये आग तो धीरे धीरे पूरे देश में फैलती ही जा रही है।
चूंकि सारा खेल लेनिन की मूर्ती तोड़े जाने से शुरू हुआ था इस तो बात वहीं से शुरू करते हैं। बड़ा प्रश्न ये है के बेलोनिया कस्बे में जहां लेनिन की मूर्ति तोड़ी गई वहां मूर्ती तोड़ने वाले कितने लोग वास्तव में लेनिन के बारे में जानते थे। और जितने लोग लेनिन की मूर्ती तोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं वे कितना लेनिन के बारे में जानते हैं। जिन्होंने मूर्ती तोड़ी वो तो वास्तव में उस विचार धारा से आते है जिसमें तोड़ फोड़ और विधटन ही उनकी असली पहचान है। क्या तोडा, क्यों तोडा इससे उनको मतलब नहीं। बस तोडा ये ही बहुत है, जिसे अंगरेजी में कहते हैं 'टारगेट अकम्पलिश्ड'।
जो लोग विरोध कर रहे हैं वो केवल इस लिए विरोध कर रहे हैं क्यों के उनके राजनीतिक आका चाहते हैं के इसका विरोध हो। वे भी लेनिन में विशेष कुछ नहीं जानते।
अब प्रश्न ये है के क्या लेनिन में ऐसा कुछ था के उसकी मूर्ती दुनिया के किसी भी शहर में लगाई जानी चाहिए ?
अगर लेनिन की मूर्ती लगाई जा सकती है तो उससे पहले हिटलर की लगाई जानी चाहिए। आखिर उसने मेजर ध्यान चंद को सम्मान और नेताजी को समर्थन दिया था। क्या मूर्ती तोड़ने का विरोध करने वाले जानते हैं के लेनिन और ट्रोट्स्की ने मिलकर सोवियत राज्य में करीब चालीस लाख हत्याएं की थीं जिसमे मर्द, औरत और बच्चे शामिल थे। ये हत्याएं बड़े पैमाने पर निष्पादन, मृत्यु शिविर, एवं राज्य प्रायोजित प्राकृतिक आपदा के नाम पर की गई थीं। कितने लोग इस बात को जानते हैं के लेनिन वो व्यक्ति था जिसने अपने ही देश के लोगों पर कैमिकल बॉम्बिंग की थी ? द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने ही नागरिकों को मारने में सोवियत राज्य नंबर एक पर था जबकि नाज़ी नंबर दो पर। लेनिन प्रजातंत्र और प्रेस की आज़ादी के भी खिलाफ था।
अगर लेनिन के अत्याचारों पर लिख्ने बैठू तो पूरी एक पुस्तक लिखनी पड़ेगी। एक पोस्ट में कहाँ सब कुछ समायेगा।
अब आपको तय करना है की लेनिन की मूर्ती भारत में लगनी चाहिए या नहीं।