पंपोर के शहीदों को भाव भीनी श्रद्धांजलि। बड़ा प्रशन ये है के क्या आतंकवाद से लड़ना केवल सुरक्षा बलों का काम है ? सुना है के जिस वक्त उस इमारत में आतंकवादी घुसे थे उस वक्त इमारत में करीब सौ लोग मौजूद थे। अगर ये सौ लोग एक साथ उनपर टूट पड़ते तो संभवतः सारे के सारे आतंकवादी जाते। हाँ कुछ लोग शहीद भी होते। शहादत तो हमने वैसे भी दी है लेकिन अगर आम आदमी आतंकवादियों पर टूटने लगे तो उनतक ये संदेश जाता के भारत का आम आदमी केवल धरना-प्रदर्शन ही करना नही जनता बल्कि देश के लिए जान देना भी जनता है। अगर भारत पर आक्रमण किया तो उन्हें १५० भारत वासियों से लड़ना पड़ेगा। किन्तु अफ़सोस ऐसा होता नहीं है। हम दंगो, धरना-प्रदर्शन आदि में तो जान दे सकते है, आरक्षण, मंदिर मस्जिद आदि के लिए भी दे सकते है। हम पुलिस फायरिंग में भी मरने को तैयार हैं लेकिन देश के लिए नहीं मर सकते। उसके लिए सिर्फ हमारे सुरक्षा बल ही मरें। देश प्रेम तो हमारे लिए बस एक नारा भर है। कितने अफ़सोस की बात है के देश के एक शहीद के शव को उसके उसके परिवार तक पहुंचने में धरना प्रदर्शन के कारण इतनी दिक्क्तें पेश आयीं। होना तो ये चाहिए था के शहीद कैप्टेन पवन कुमार के शव का ससम्मान स्वागत किया जाता। इस शर्मनाक स्तिथि के लिए ना तो मिडिया ने कोई हो हल्ला किया ना ही किसी राजनितिक दल ने कोई शोर मचाया। न ही किसी ने कोई मार्च निकला न ही किसी संगठन ने इसकी भर्तस्ना की। क्या फायदा है ऐसी छद्म देश भक्ति का।
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