Sunday, March 6, 2016

So Sad

आज फिर दो बच्चों ने फेल होने के डर से आत्महत्या कर ली? क्या पढ़ाई में पास होना जिन्दा रहने से ज्यादा ज़रूरी है? अगर ऐसा है तो लानत है ऐसी पढ़ाई पर .  पढ़ाई बच्चों के लिए होती है या बच्चे पढ़ाई के लिए ? हम इन आत्म-हत्याओं के लिए किसी की ज़िम्मेदारी क्यों नहीं तय करते हैं ?
मेरा अपना अनुभव कहता है के इस परिस्तिथि के लिए तीन कारक ज़िम्मेदार हैं .  पहला कारक है बच्चों के अभिभावक जो बच्चों के प्राप्तांक को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ लेते हैं . अक्सर अभिभावक द्वारा  अपने बच्चों ताना देते सुना जा सकता है के फलां का बच्चा बहुत अच्छा है क्यों के वो ज्यादा नंबर ले कर आया है और उनके बच्चे ने कम नंबर ला कर उनकी नाक कटवा दी . क्या कोई बच्चा इस लिए बुरा हो सकता है क्यों के उसके नंबर दूसरों से कम हैं? क्या वे बच्चों को अपनी नाक ऊंची करने के लिए पढ़ा रहें हैं ? नंबर नहीं तो बच्चा भी नहीं ? अभी कुछ दिन पहले मेरे विध्यालय के एक बच्चे को १०२ बुखार में उसके अभिभावक ने इम्तिहान देने भेज दिया . जब मैंने उसके घर फोन कर उसकी माँ से पूछा के बच्चे को इस स्तिथि में विध्यालय क्यों भेजा तो  बोलीं के इम्तेहान देना ज़रूरी था . जब मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया के इम्तेहान ना देने से बच्चे का कोई नुकसान नहीं होगा तो उनका कहना था के उसके नंबर तो कम हो जायेंगे . उनकी इच्छा है के उनका पुत्र क्लास में सबसे ज्यादा नंबर लाये .  जब पहली कक्षा में यह हाल है तो दसवीं में क्या हाल होगा ? मैंने तो ज़बरदस्ती दबाव डाल कर उस बच्चे को वापस कर दिया लेकिन अगर मेरे विद्यालय की अध्यापिका सचेत न होती और समय पर मुझे सूचित न करती तो उस बच्चे को ऐसी पीड़ादायक स्थिति में इम्तहान देना पड़ता .
ऐसी ही स्थिति बच्चों के विषय चयन के समय भी होती है . अक्सर माँ बाप बच्चों  वो विषय पढ़ने को मजबूर करते हैं जो वो पढ़ना नहीं चाहता . ऐसी स्तिथि में अक्सर बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते है और कभी कभी आत्महत्या तक कर लेते है . आज भी कुछ ऐसा ही हुवा . एक बच्चे ने फिजिक्स के कारण आत्महत्या की तो एक बच्ची ने अंग्रेजी के कारण . ये अभिभावक कब समझेंगे के विज्ञानं और अंग्रेजी इस संसार की वैतरणी  नहीं हैं . बच्चों को वही विषय पढ़ने देना चाहिए जो वो पढ़ सकता हो . हर विषय हर बच्चे के लिए नहीं होता है।  दूसरा बड़ा कारक अध्यापकों का बड़ा वर्ग है . आज का अध्यापक मोटिवेटर की भूमिका से निकल कर अल्ट्रा-आलोचक की भूमिका में आ चूका है . आज बच्चों को शिक्षक से स्नेह कम और  प्रताड़ना अधिक मिल रही है . लवकेश मिश्र की दुःखद आत्महत्या भी इसी प्रताड़ना का परिणाम है .
तीसरा सबसे बड़ा कारक है आज का सम्पूर्ण समाज . आज परफॉर्म करने का जितना प्रेशर विद्यार्थी पर समाज द्वारा डाला जा रहा है उतना कभी नहीं डाला गया .
सबसे मुसीबत की बात ये है के तीनो ही कारकों को अपनी भूमिका से होने वाले नुकसान का पता  है किन्तु तीनों ही सुधरने को तैयार नहीं हैं .

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