Wednesday, December 23, 2015

क्रिसमस और उपहार

                                                         

क्रिसमस के त्योहार के साथ ही एक और परम्परा जुडी है और वो है उपहार देने की, जिसकी शुरुआत उन तीन मंजूशियों ने की थी जो सितारों की गणना कर येशु के दर्शन करने गए थे। तथा  जिनके बारें में मैं अपनी पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ।  वो पूर्व देशों के मंजूषि अपने साथ तीन तोहफे ले कर गए थे जो उन्होंने जन्म के समय येशु को दिए। इन तीनों तोहफों में तीन भविष्यवाणियां छिपी थीं। पहला तोहफा लोबान था जो इस बात का प्रतीक था के येशु भविष्य में पूजे जायेंगे। दूसरा तोहफा सोना था जो इस बात का प्रतीक था के येशु राजाओं के राजा हैं।  और तीसरा मूर जो इस बात की भविष्यवाणी कर रहा था कि येशु कष्ट पाएंगे और मारे जायेंगे। 
तभी से पुरे विश्व में क्रिसमस के मौके पर तोहफे देने की परम्परा की शुरुआत हुई थी।  विश्व भर के बच्चे तो क्रिसमस को तोहफे पाने का पर्व मानते हैं। ज़्यादातर बचच्चों का यह विश्वास है  के अगर वो साल भर अपने अभिभावक का कहना मानते रहेंगे और शैतानियाँ नहीं करेंगे तो सेंटा-क्लाज आधी रात में उनके लिए तोहफा छोड़ कर जायेंगे। 
ये तोहफे मिलने की तारीख भी अलग अलग देशों में अलग-अलग है। हालैंड में ये तोहफा दस साल तक के बच्चों को ५ दिसंबर सेंट निकोलस डे पर मिलता है। ,बेल्जियम, जर्मनी, चेक रिपब्लिक जैसे पूर्वी योरोपीय देशों में सेंट निकोलस डे ६ दिसंबर को मनाया जाता है। यू के, यू एस, जापान सहित भारत में २५ दिसंबर को प्राप्त होते हैं। स्पेन, मैक्सिको आदि देशों में ये तोहफे ६ जनवरी, एपिफेनि डे पर दिये जाते हैं। 

Tuesday, December 22, 2015

                                                               पूछ-ताछ कार्यालय

'भाई-साहब नमस्कार।'

'नमस्कार।  कहिये?'

'ये सी बी आई कहां मिलेगी?'

'क्यों?'

'कुछ नहीं बस पूछना था'

'क्या?'

'वो जेटली जी के यहां कब जा रही है?'

'नहीं जाएगी।'

'क्यों?'

'अभी वो पिजड़े में है।'

Saturday, December 12, 2015

क्रिसमस और क्रिसमस ट्री

                                                     क्रिसमस और क्रिसमस ट्री
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस पर चर्चा की थी के किस प्रकार एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने  सैंटा क्लाज़ के मिथक को क्रिसमस से जोड़ कर कुछ ऐसा माहौल पैदा कर दिया के अधिकांश लोग क्रिसमस को सैंटा क्लाज़ से अलग कर के देख ही नहीं पाते हैं। कुछ गैर मसीही लोग तो यहां तक मानते हैं के सैंटा क्लाज़ क्रिश्चियन्स के कोई देवता हैं जिनके बगैर क्रिसमस हो ही नहीं सकता।
आज हम चर्चा करेंगे क्रिसमस ट्री की।  क्रिसमस आगमन माह की शुरुआत में ही हर घर में क्रिसमस ट्री सजा दिया जाता है।  किन्तु अगर इस परम्परा के इतिहास में नज़र डालें तो हम पाएंगे के ये परम्परा बर्फीले देशों में क्रिस्चैनिटी आगमन के बहुत पहले से थी।  शायद ये कहना अतिश्योक्ती ना होगी के उन लोगों में ये परम्परा प्रागैतिहासिक काल से थी। बर्फीले प्रदेशों में जहां सर्दियां बहुत लम्बी होती हैं और पूरी प्रकृति बर्फ की चादर में दब जाती है, वहां के लोग सर्दियों के आगमन के साथ ही पेड़ की टहनी अपने घर के अंदर रख लेते थे जो उनका ये विश्वास बनाये रखता था के बसंत फिर आएगा।
अब प्रश्न ये है के यह परम्परा क्रिसमस से कैसे जुडी। इस संदर्भ में जर्मनी की एक लोक कथा से पता चलता है। आठवीं शताब्दी तक जर्मनी के जैसिमर नामक शहर में शीतकालीन अयनांत मनाने हेतु ओडिन'स  ओक नामक पेड़  नीचे नर बली देनें की परमपरा थी।  आठवीं शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक इंग्लिश बिशप विनफ्रीड जैसिमर पहुंचे।  वहां उन्होंने ओडिन'स ओक को कटवा कर इस नृशंस परम्परा का अंत किया। जिस स्थान पर वो ओक गिरा वहां पर एक छोटा सा फर का पेड़ लगा हुवा था।  जब जर्मन्स ने बिशप विनफ्रीड से पूछा के उन्हें क्रिसमस कैसे मनाना चाहिए, विनफ्रीड ने उनकी परम्परा का ध्यान रखते हुवे बताया के उन लोगों को एक एक फ़र का पेड़ अपने घर ले जाना चाहिए जो के शांति का प्रतीक होगा।  क्यों के फर का पेड़ सदा हरा भरा रहता है इस लिए ये पेड़ अनंत जीवन का भी प्रतीक है।
धीरे धीरे ये कथा नाविकों के माध्यम से विश्व के अन्य देशों तक पहुंची और ये परम्परा विश्व भर में फैल गयी

सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस

                                                 क्रिसमस और सेंटा
                                सेंटा एक किवदंती मात्र, कोई देवता नहीं

जैसे ही दिसंबर का महीना आता है, विश्व भर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।  इसी के साथ हर पेट्रोल-पम्प, हर शॉपिंग मॉल, स्कूलों में मनाये जाने वाले उत्सव, विज्ञापनों इत्यादि में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है वो है कंधे पर तोहफों का झोला टांगे, लाल लबादे में लिपटा, सफेद दाढ़ी वाला हंसमुख बूढ़ा जिसे दुनियां सैंटा क्लॉज़ के नाम से जानती है। लेकिन शायद बहुत कम ही लोगों को पता है के सैंटा क्लाज़ केवल एक मिथक है जिसे इसा मसीह के जन्म से कुछ लेना देना नहीं है। पवित्र बाइबल से भी सैंटा क्लाज़ का कोई लेना देना नहीं है।  अगर मैं ये लिखूं के सैंटा क्लाज़ मार्केटिंग स्ट्रैटजी का प्रोडक्ट हैं तो शायद अतिश्योक्ति ना होगी।
आइये जानें सैंटा क्लॉज़  का कॉन्सेप्ट क्या है।  आधुनिक सैंटा क्लॉज़  का उदय उन्नीसवीं शताब्दी में डच नाविकों के साथ संत निकोलस की कथा अमेरिका पहुँचने हुवा था।  किन्तु सैंटा क्लॉज़ को विश्व प्रसिद्ध करने में कवि क्लेमेंट क्लार्क मूर की कविता 'अ विजिट फ्रॉम सेंट निकोलस' जिसे हम 'द नाइट बिफोर क्रिसमस' के नाम से भी जानते हैं, ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभायी।  कलाकार टॉमस नास्ट ने सैंटा क्लॉज़ को वो रूप दिया जो आज हम देखतें हैं।
फिर आई सेंटा क्लाज़ के मार्केटिंग की बारी जो निभायी कोका-कोला ने। सन १९३० में कोका-कोला ने अपने प्रोडक्ट के विज्ञापनों में सैंटा क्लाज़ के साथ क्रिसमस का इतना प्रचार किया के पूरी दुनिया इस भरम में जीने लगी के क्रिसमस मतलब सैंटा क्लाज़, या सैंटा क्लॉज़ मतलब क्रिसमस।