अभी तक तो मैं ये मानता रहा के गरबा और डांडिया भारत की तमाम लोक कलाओं में से एक है। पूरा बचपन और तरुणाई श्री श्री चतुर्भुज एंग्लो-वैदिक गुजराति स्कूल में डांडिया और गरबा खेलते बीती। गुजरातियों की संगत में रह कर पता नहीं कब मैं गुजराती पढ़ना और बोलना सीख गया जिसके कारण मैं गुजराती साहित्य का भी रस पान कर सका। मैं हमेशा यही सोचता रहा के मैं भारत की एक समृद्ध लोक कला का हिस्सा बन रहा हूँ। कभी किसी ने ये एहसास भी नहीं होने दिया के इस कला का हिस्सा बनने का अधिकार सिर्फ हिन्दुवों को है। यहाँ तक के अपनी रजत जयंती पर नवयुवक मंडल ने जब मिमेंटो बाटें तो एक मिमेंटो मेरे लिए भी था। कहीं भी हिन्दू या गैर हिन्दू की बात नहीं थी।
ऐसा ही कुछ दुर्गा पूजा में भी होता था। षष्टी के दिन से जो घर छोड़ता था तो प्रतिमा विसर्जन के बाद ही घर लौटता था। इन चार दिनों में घर से नाता केवल नित्य क्रिया का ही रह जाता था। खाना पीना सब पाडे मेँ। यहाँ भी मुझे एक और भाषा सिखने को मिली वो थी गुरुवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर की भाषा। अगर जीवन का यह कल खण्ड यहाँ न व्यतीत करता तो शायद रविन्द्र संगीत की मिठास से अनभिज्ञ रह जाता। इन्हीं पूजा के पाड़ों से जो नाटकों का शौक लगा वो मरने के साथ ही जायेगा।
लेकिन अब पता नहीं कौन सी हवा चल गयी है के गरबा और डांडिया को भारतीयता से अलग विशुद्ध हिन्दू मान लिया गया है और गैर हिन्दुवों का प्रवेश वर्जित करने की बात चल रही है।
कभी दुर्गा पूजा के पंडालों में भी कभी ऐसी बात सुनाई पड़ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
मैंने तो अपना जीवन जी लिया है। डांडिया और पाड़ों के चार दिन सुखद स्मृति में ही शेष हैं। अब तो केवल महा अष्टमी के दिन ही जाना हो पाता है। या फिर किसी विशेष दिन जब कोई बहुत ही अपना कोई कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा होता है।
लेकिन उस पीढ़ी का क्या जो अब आगे आ रही है ? अगर हर चीज़ पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगने लगेगा तो हम समृद्ध होने के बजाय दीन होते चले जायेंगे।
आज क्रिसमस पर मेरे घर क्रिसमस केक चखने के लिए जो चार पांच सौ मित्रो की भीड़
जुटती है क्या वैसी ही भीड़ मेरी बाद की पीढ़ी के घर भी जुटेगी ?
ऐसा ही कुछ दुर्गा पूजा में भी होता था। षष्टी के दिन से जो घर छोड़ता था तो प्रतिमा विसर्जन के बाद ही घर लौटता था। इन चार दिनों में घर से नाता केवल नित्य क्रिया का ही रह जाता था। खाना पीना सब पाडे मेँ। यहाँ भी मुझे एक और भाषा सिखने को मिली वो थी गुरुवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर की भाषा। अगर जीवन का यह कल खण्ड यहाँ न व्यतीत करता तो शायद रविन्द्र संगीत की मिठास से अनभिज्ञ रह जाता। इन्हीं पूजा के पाड़ों से जो नाटकों का शौक लगा वो मरने के साथ ही जायेगा।
लेकिन अब पता नहीं कौन सी हवा चल गयी है के गरबा और डांडिया को भारतीयता से अलग विशुद्ध हिन्दू मान लिया गया है और गैर हिन्दुवों का प्रवेश वर्जित करने की बात चल रही है।
कभी दुर्गा पूजा के पंडालों में भी कभी ऐसी बात सुनाई पड़ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।
मैंने तो अपना जीवन जी लिया है। डांडिया और पाड़ों के चार दिन सुखद स्मृति में ही शेष हैं। अब तो केवल महा अष्टमी के दिन ही जाना हो पाता है। या फिर किसी विशेष दिन जब कोई बहुत ही अपना कोई कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा होता है।
लेकिन उस पीढ़ी का क्या जो अब आगे आ रही है ? अगर हर चीज़ पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगने लगेगा तो हम समृद्ध होने के बजाय दीन होते चले जायेंगे।
आज क्रिसमस पर मेरे घर क्रिसमस केक चखने के लिए जो चार पांच सौ मित्रो की भीड़
जुटती है क्या वैसी ही भीड़ मेरी बाद की पीढ़ी के घर भी जुटेगी ?