Thursday, October 15, 2015

Eak Sawal

अभी तक तो मैं ये मानता रहा के गरबा और डांडिया भारत की तमाम लोक कलाओं में से एक है। पूरा बचपन और तरुणाई श्री श्री चतुर्भुज एंग्लो-वैदिक गुजराति स्कूल में डांडिया और गरबा खेलते बीती। गुजरातियों की संगत में रह कर पता नहीं कब मैं गुजराती पढ़ना और बोलना सीख गया जिसके कारण मैं गुजराती साहित्य का भी रस पान कर सका। मैं हमेशा यही सोचता रहा के मैं भारत की एक समृद्ध लोक कला का हिस्सा बन रहा हूँ।  कभी किसी ने ये एहसास भी नहीं होने दिया के इस कला का हिस्सा बनने का अधिकार सिर्फ हिन्दुवों को है।  यहाँ तक के अपनी रजत जयंती पर नवयुवक मंडल ने जब मिमेंटो बाटें तो एक मिमेंटो मेरे लिए भी था।  कहीं भी हिन्दू या गैर हिन्दू की बात नहीं थी।

ऐसा ही कुछ दुर्गा पूजा में भी होता था।  षष्टी के दिन से जो घर छोड़ता था तो प्रतिमा विसर्जन के बाद ही घर लौटता था।  इन चार दिनों में घर से नाता केवल नित्य क्रिया का ही रह जाता था।  खाना पीना सब पाडे मेँ। यहाँ भी मुझे एक और भाषा सिखने को मिली वो थी गुरुवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर की भाषा।  अगर जीवन का यह कल खण्ड यहाँ न व्यतीत करता तो शायद रविन्द्र संगीत की मिठास से अनभिज्ञ रह जाता।  इन्हीं पूजा के पाड़ों से जो नाटकों का शौक लगा वो मरने के साथ ही जायेगा।

लेकिन अब पता नहीं कौन सी हवा चल गयी है के गरबा और डांडिया को भारतीयता से अलग विशुद्ध हिन्दू  मान लिया गया है और गैर हिन्दुवों का प्रवेश वर्जित करने की बात चल रही है।

कभी  दुर्गा पूजा के पंडालों में भी कभी ऐसी बात सुनाई पड़ जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।

मैंने तो अपना जीवन जी लिया है।  डांडिया और पाड़ों के चार दिन सुखद स्मृति में ही शेष हैं। अब तो केवल महा अष्टमी के दिन ही जाना हो पाता है।  या फिर किसी विशेष दिन जब कोई बहुत ही अपना कोई कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा होता है।

लेकिन उस पीढ़ी का क्या जो अब आगे आ रही है ? अगर हर चीज़ पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगने लगेगा तो हम समृद्ध होने के बजाय दीन होते चले जायेंगे।
आज क्रिसमस पर मेरे घर क्रिसमस केक चखने के लिए जो चार पांच सौ मित्रो की भीड़
जुटती है क्या वैसी ही भीड़ मेरी बाद की पीढ़ी के घर भी जुटेगी ?

Tuesday, October 13, 2015

Vikas ki kimt bhag 1

श्री प्रदीप कुमार खन्ना जी के विशेष स्नेहपूर्ण आग्रह पर लिखा गया व्यंग्य

श्री विकास पुरुष गरीबों के गाँव में भाषण देते हुवे

'भाइयों, आपको कैसा देश चाहिए ? कमज़ोर ? या मजबूत ?

'मजबूत ' सभी ने एक स्वर में सहमति जताई।

इस प्रश्न को उन्होंने ठीक उसी तरह तीन बार दोहराया जिस प्रकार मार्क एंटोनी ने रोम में प्रजातंत्र खत्म कर सीजर को डिक्टेटर बनाने के तिहराया था ताकि रोम वासी क्या खाएं, क्या पहने, क्या लिखे, क्या पढ़े; सब पर सीजर की व्यक्तिगत सेना का कब्ज़ा हो सके और उसकी सेना ये तय करे के किसके घर पर आक्रमण करना है और किसके मुंह पर स्याही फेंकनी है।

'भाइयों, राष्ट्र वही मजबूत बनता है जिस राष्ट्र के लोगों में कुर्बानी देने का जज्बा होता है। लेकिन आज हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न ये है के इस नए भारत के विकास के लिए कुर्बानी कौन दे ? मैं कश्मीर भी गया, कन्या कुमारी भी गया।  असम से  ले कर गुजरात तक लोगों से बात की ।  मेरी आँखें भर आयीं जब मैंने देखा के सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी इस देश के विकास के लिए कुर्बानी देने को त्तपर खड़े हैं। बहुत गहराई से देखने के बाद ये पता चला के इस देश में दो तरह के लोग हैं।  एक कमज़ोर और दूसरे मजबूत।  अब अगर मजबूत लोगों की कुर्बानी ली गयी तो देश में कमज़ोर लोग बचेंगे। बचेंगे के नहीं?

'बचेंगे' भीड़ ने कोरस में सहमति जताई।

'और जिस राष्ट्र की जनता कमज़ोर हो राष्ट्र मजबूत कैसे बन सकता है? इसीलिए इसलिए राष्ट्र हित में कुर्बानी मजबूत नहीं कमज़ोर लोग दें।  ताकि देश में मजबूत लोग बढ़ें और हमारा राष्ट्र तेजी से तरक्की कर सके।  कमज़ोरों की कुर्बानी से जो जगह खाली होगी वो मजबूतों को मिलेगी और देश में भरपूर विकास आएगा।  मसलन आज आप अपनी अपनी छोटी छोटी जोतों पर एक दो कुंतल अनाज पैदा करते हो, उसी जमीन पर सैकड़ों टन लोहा पैदा किया जायेगा। तो बोलो विकास होगा के नही?

'होगा' कोरस ने फिर दोहराया।

विकास होगा के नहीं?

'होगा'

'विकास होगा के नहीं ?

'होगा'

                                                                                      क्रमश;