Tuesday, February 23, 2016

जिस दौर में में फिल्मों से काव्य गायब हो गया हो और सिनेमा पथरीला हो गया हो उस दौर में फ़िल्म सनम रे ओस की बून्द का एहसास कराती है।  यूँ तो मुझे रोमांटिक फिल्में कम ही  सुहातीं हैं लेकिन सनम रे अच्छी लगी।  इसमें न तो बाजीराव मस्तानी की तरह बेमतलब की ताली बजाउ डायलाग बाज़ी है न गोलियों की रासलीला है।  अगर अगर कुछ  है तो बस एक मखमली एहसास और प्यानो  की धुन पर थिरकते ख्वाब । इसका नायक आशिकी २ की तरह कोई पलायन वादी व्यक्तित्व नहीं है अपितु अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद करता एक नवजवान है। आम रोमांटिक फिल्मों की तरह ये फ़िल्म भी बीच बीच में झूलती भी है।
दिव्य खोसला  कुमार के निर्देशन में राज खोसला की शैली स्पष्ट झलकती है।  खास कर लोकेशन के चयन मे।  गीत भाव पूर्ण है तो संगीत कर्ण प्रिय।  इस फ़िल्म का यू एस पी अगर कोई है तो वो है ऋषि कपूर जिसने अपने संछिप्त सी भूमिका में एक हृदयस्पर्शी प्रभाव छोड़ा है। यूँ तो यह फ़िल्म 'अवश्य देंखें' की श्रेणी में नहीं आती लेकिन फिर भी देखी जा सकती है। 

Sunday, February 21, 2016

पंपोर के शहीदों को भाव भीनी श्रद्धांजलि।  बड़ा प्रशन ये है के क्या आतंकवाद से लड़ना केवल सुरक्षा बलों का काम है ? सुना है के जिस वक्त उस इमारत में आतंकवादी घुसे थे उस वक्त इमारत में करीब सौ लोग मौजूद थे। अगर ये सौ लोग एक साथ उनपर टूट पड़ते तो संभवतः सारे के सारे  आतंकवादी  जाते। हाँ कुछ लोग शहीद भी होते।  शहादत तो हमने वैसे भी दी है लेकिन अगर आम आदमी आतंकवादियों पर टूटने लगे तो उनतक ये संदेश जाता के भारत का आम आदमी केवल धरना-प्रदर्शन ही करना नही जनता बल्कि देश के लिए जान  देना भी जनता है। अगर भारत पर आक्रमण किया तो उन्हें १५०  भारत वासियों से लड़ना पड़ेगा।  किन्तु अफ़सोस ऐसा होता नहीं है। हम दंगो, धरना-प्रदर्शन आदि में तो जान दे सकते है, आरक्षण, मंदिर मस्जिद आदि  के लिए भी  दे सकते है।  हम पुलिस फायरिंग में भी मरने को तैयार हैं लेकिन  देश के लिए नहीं मर सकते।  उसके लिए सिर्फ हमारे सुरक्षा बल ही मरें। देश प्रेम तो हमारे लिए बस एक नारा भर है।  कितने अफ़सोस की बात है के देश के एक शहीद के शव को उसके उसके परिवार तक पहुंचने में धरना प्रदर्शन के कारण इतनी दिक्क्तें पेश आयीं।  होना तो ये चाहिए था के शहीद कैप्टेन पवन कुमार के शव का ससम्मान स्वागत किया जाता।  इस शर्मनाक स्तिथि के लिए ना तो मिडिया ने कोई हो हल्ला किया ना ही किसी राजनितिक दल ने कोई शोर मचाया। न ही किसी ने कोई मार्च निकला न ही किसी संगठन ने इसकी भर्तस्ना की।  क्या फायदा है ऐसी छद्म देश भक्ति का। 

Thursday, February 18, 2016

                                              एक सवाल आज़ादी मांगने वाले विद्यार्थियों से

तुम्हे आज़ादी चाहिए तो किस से ? तुम तो खुद एक आज़ाद मुल्क में रहते हो, तो फिर आज़ादी किस्से?
तुम्हारी समझ से आज़ादी  क्या है? आज़ादी की परिभाषा क्या है? बहुत साल पहले तुम्हारी ही तरह कुछ विद्यार्थियों ने भी आज़ादी मांगी थी।  और उस आज़ादी को पाने के लिए हँसते हँसते फांसी  पर झूल गए थे।  भूल गए तुम भगत सिंह जी और उनके साथियों को ? उन्होंने आज़ादी मांगी थी विदेशियों से।  तुम किस्से आज़ादी मांग रहे हो।  अब तो ये देश आज़ाद है।  पूरा हिंदुस्तान तुम्हारा है, तुम पुरे हिंदुस्तान के हो।  फिर आज़ादी तुम किस्से मांगते हो? जिस यूनिवर्सिटी में तुम पढ़ते हो वो एक आज़ाद भारत की यूनिवर्सिटी है जहां तुम्हे ऊंची से ऊंची डिग्री लेने की तुम्हें आज़ादी है।  और मत भूलो, तुम्हारी पढाई का खर्च भी इस आज़ाद देश के नागरिक उठाते है।  क्या तुमने कभी सोचा है के तुम्हारी पढाई के खर्च में इस देश के सबसे गरीब आदमी का भी कॉन्ट्रिब्यूशन होता है।  देश तुम पर इस लिए खर्च करता है के तुम पढ़ लिख कर इस देश को और बेहतर बनाओगे।  एक ऐसा देश बनाओगे जहां सब  मिलकर बढ़ेंगे।  और तुम क्या कर रहे ? कभी सोचा है ?  मैं नहीं जनता के तुम्ह कौन बरगला रहा है ? कुछ लोग कहते है के पाकिस्तान।  तो क्या पाकिस्तान तुम्हारा आदर्श है?
वो पाकिस्तान जहां का आम नागरिक कठमुल्लाओं और फौज की दहशत में जीता है।  वो पाकिस्तान जहां कोई लोकतान्त्रिक मूल्य नहीं है।  वो पाकिस्तान जहां नागरिक अधिकारों पर जब चाहे तब फौज कब्ज़ा कर लेती है। वो पाकिस्तान जो अपने ही मासूम बच्चों पर गोली चलाता है।  क्या तुम भूल गए के उन बच्चों की मौत पर हिंदुस्तान की माएं रोईं थीं।
हो सकता है तुम्हें सिस्टम से कोई शिकायत हो।  तो सिस्टम बदलने से तुम्हे कौन रोकता है।  काबिल बनो और बदल दो सिस्टम को।
हो सकता है तुम्हें किसी एक या सभी राजनितिक दलों से शिकायत हो।  तो  लो अपना एक नया राजनितिक दल। कौन रोकता है तुम्हें ? तुम्हें हर चीज़ की आज़ादी है।  और ये आज़ादी तुम्हें हज़ारो क्रांतिकारियों की क़ुरबानी से मिली है।  उनकी क़ुरबानी का मज़ाक मत बनाओ। तुम जो कर रहे हो, भले तुम उसे कोई क्रांति मान लो लेकिन सत्य तो ये  है के वो एक चूतियापे से ज्यादा कुछ नहीं।  

Wednesday, February 17, 2016

बस्सी साहब का कहना है के कन्हैया की ज़मानत का विरोध दिल्ली पुलिस नहीं करेगी। क्यों भाई क्यों नहीं करेगी ? क्या कन्हैया अकस्मात देश द्रोही से देश भक्त हो गया ? या दिल्ली पुलिस की देश द्रोह  को लेकर परिभाषा बदल गयी ? या कन्हैया देश द्रोही था ही नहीं ? उस पर देश द्रोह का इल्जाम किसी एजेंडे के तहद लगाया गया और दिल्ली पुलिस के पास जानती है के उसके पास कन्हैया के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।  ज़मानत का विरोध कर अपनी भद्द पिटवाने से बेहतर है के ज़मानत का विरोध ही न किया जाय। 
अगर कन्हैया की गिरफ़्तारी किसी राजनितिक षड्यंत्र के तहद हुई थी तो यह इस देश के लिए बहुत  के लिए एक बहुत ही घातक परम्परा की शुरुआत है। अगर गिरफ़्तारी एक षड्यंत्र थी तो फिर तो पूरा प्रकरण एक षड्यंत्र था।  सड़क पर देश भक्ति के प्रदर्शन से लेकर कचहरी का बवाल तथा भाजपा विधायक द्वारा छात्र की पिटाई से लेकर मिडिया पर हमला। सब किसी गहरी साज़िश का हिस्सा थी। कहीं कोई एक राजनितिक दल दलित शोषित समाज को यह संकेत देने की कोशिश  तो नहीं कर रहा है के जैसे सदियों से सर झुका कर जीते आये हो वैसे ही जियो वरना कुचल दिए जाओगे।   

Tuesday, February 2, 2016

'साला खडूस' के विषय में शायद मेरा इतना ही कहना काफी है के बस 'झकास' । ये फ़िल्म केवल किसी बड़े ख्वाब को पूरा करने के जददोजहद के बारे में ही नहीं है अपितु खेल संघों के अंदर व्याप्त भ्र्ष्टाचार को भी बड़ी बेबाकी से नंगा करती है।  आर माधवन ने इस फ़िल्म में अपनी रोमांटिक इमेज को तोड़ कर एक रफ टफ बॉक्सिंग कोच की भूमिका को निभाया नहीं बल्कि जिया है।  जरूर जरूर देखें।

आजकल सोशल मिडिया पर एक नया इतिहास लिखा जा रहा है, वो भी महान क्रन्तिकारी भगत सिंह जी के नाम पर।  कुछ छाप रहे हैं के १४ फ़रवरी के दिन भगत सिंह  जी को फांसी की सजा सुनाई गयी थी तो कुछ लिख रहें हैं के भगत सिंह जी को १४ फ़रवरी के दिन फँसी चढ़ा दिया गया था।  अरे भक्तों कुछ तो शर्म करो।  अपने झूठ के पुलिंदे में शहीदों को तो न लपेटो।  सारी दुनिया जानती है के भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जी को फांसी की सजा ट्रिब्यूनल ने ७ अक्टूबर १९३० के दिन सुनाई थी तथा उनको २३ मार्च १९३१ के दिन फांसी चढ़ा कर शहीद कर दिया गया था।