मैं दो दिनों से सोच रहा था के अकस्मात ऐसा क्या हो गया के पुरे सोशल मिडिया पर शाहरुख़ और आमिर छा गए। हर एक बढ़ चढ़ कर दोनों की बातें क्यों कर रहा है? दोनों को ही ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी थी जो उन्होंने ऐसा कॉन्ट्रोवर्शियल बयान दे दिया ? फिर मुझे याद आई मार्केटिंग।
पहले 'मेरी आवाज़ सुनो' से लेकर 'बॉम्बे' और 'बैंडिट क्वीन' तक बैन होने की मार्केटिंग स्ट्रैटजी अपनायी जाती थी। ये फ़िल्म आज बैन हो रही है कल बैन हो जाएगी ऐसी अफवाहें फैला कर एक सेंसेशन पैदा किया जाता था और फ़िल्म हिट करवा ली जाती थी। दर्शकों में एक प्रकार का इगो पैदा कर दिया जाता था के कहीं वो उस फ़िल्म को देखने से वंचित न रह जाएँ जो दूसरों ने देख ली।
फिर आया फ़िल्म 'फायर' के साथ सांस्कृतिक बैन का दौर जिसमें फिल्मों को हिट कराने के लिए राइट विंग राजनैतिक दलों के साथ एक अंडरस्टैंडिंग बनाई गयी। उस अंडरस्टैंडिंग के आर्थिक पक्ष पर मैं कुछ नहीं लिखूंगा क्यों की कुछ चीज़ें समझ तो आतीं हैं पर साबित नहीं की जा सकतीं। जब फायर रिलीज़ हुई तो स्थानीय सुंदर सिनेमा में मैं पहले दिन का दूसरा शो देखने गया तो देखा के पहले शो में दर्शको की दो ही साइकिलें खड़ी थीं। मै आज की पीढ़ी को बता दूँ के पहले साईकिल स्टैंड की भीड़ एक पैमाना होती थी ये जानने का के फ़िल्म हिट है या फ्लॉप। टिकट लेने से पहले दिल हिचका पर फिर शबाना आज़मी के नाम पर थोड़ी हिम्मत बाँध कर टिकट लेने पहुंचा तो गेट कीपर राम कुमार ने मना करते हुवे कहा के कहां पैसा बर्बाद करोगे। दो दिन से ज़्यादा चलेगी नहीं। और मैं फ़िल्म देखे बगैर वापस आ गया। दूसरे ही दिन शिव सेना ने इस फ़िल्म के खिलाफ फतवा दे दिया। कुछ दूसरे राजनीतिक दल और सामाजिक दल भी उसमें शामिल हो गए। परिणाम ? फायर सुपर हिट।
फ़िल्म 'फ़ना' की कहानी भी मिलती जुलती है। इस बार शिव सेना नहीं भाजपा थी।
फिर 'पिके' के साथ एक नई मार्केटिंग स्ट्रेटजी शुरू हुई। इस स्ट्रेटजी में भी राइट विंग पार्टी ही पार्टनर थी। 'पीके' ने कितना कमाया ये जग जग ज़ाहिर है पर राइट विंग ने कितना कमाया ये कभी सामने नहीं आएगा।
अब अगले माह आमिर और शाहरुख़ दोनों की फिल्में रिलीज़ होनी हैं। फिर राइट विंग के साथ एक समझौता हुवा। कुछ जहरीले कमेंट स्ट्रैटजी के तहत कर दिए गए बाकी काम तो अंध समर्थक अपने आप को देश भक्त साबित करने की होड़ में पूरा कर देंगे।
जय हो मार्केटिंग
फ़िल्म 'फ़ना' की कहानी भी मिलती जुलती है। इस बार शिव सेना नहीं भाजपा थी।
फिर 'पिके' के साथ एक नई मार्केटिंग स्ट्रेटजी शुरू हुई। इस स्ट्रेटजी में भी राइट विंग पार्टी ही पार्टनर थी। 'पीके' ने कितना कमाया ये जग जग ज़ाहिर है पर राइट विंग ने कितना कमाया ये कभी सामने नहीं आएगा।
अब अगले माह आमिर और शाहरुख़ दोनों की फिल्में रिलीज़ होनी हैं। फिर राइट विंग के साथ एक समझौता हुवा। कुछ जहरीले कमेंट स्ट्रैटजी के तहत कर दिए गए बाकी काम तो अंध समर्थक अपने आप को देश भक्त साबित करने की होड़ में पूरा कर देंगे।
जय हो मार्केटिंग
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