क्रिसमस और क्रिसमस ट्री
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस पर चर्चा की थी के किस प्रकार एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने सैंटा क्लाज़ के मिथक को क्रिसमस से जोड़ कर कुछ ऐसा माहौल पैदा कर दिया के अधिकांश लोग क्रिसमस को सैंटा क्लाज़ से अलग कर के देख ही नहीं पाते हैं। कुछ गैर मसीही लोग तो यहां तक मानते हैं के सैंटा क्लाज़ क्रिश्चियन्स के कोई देवता हैं जिनके बगैर क्रिसमस हो ही नहीं सकता।
आज हम चर्चा करेंगे क्रिसमस ट्री की। क्रिसमस आगमन माह की शुरुआत में ही हर घर में क्रिसमस ट्री सजा दिया जाता है। किन्तु अगर इस परम्परा के इतिहास में नज़र डालें तो हम पाएंगे के ये परम्परा बर्फीले देशों में क्रिस्चैनिटी आगमन के बहुत पहले से थी। शायद ये कहना अतिश्योक्ती ना होगी के उन लोगों में ये परम्परा प्रागैतिहासिक काल से थी। बर्फीले प्रदेशों में जहां सर्दियां बहुत लम्बी होती हैं और पूरी प्रकृति बर्फ की चादर में दब जाती है, वहां के लोग सर्दियों के आगमन के साथ ही पेड़ की टहनी अपने घर के अंदर रख लेते थे जो उनका ये विश्वास बनाये रखता था के बसंत फिर आएगा।
अब प्रश्न ये है के यह परम्परा क्रिसमस से कैसे जुडी। इस संदर्भ में जर्मनी की एक लोक कथा से पता चलता है। आठवीं शताब्दी तक जर्मनी के जैसिमर नामक शहर में शीतकालीन अयनांत मनाने हेतु ओडिन'स ओक नामक पेड़ नीचे नर बली देनें की परमपरा थी। आठवीं शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक इंग्लिश बिशप विनफ्रीड जैसिमर पहुंचे। वहां उन्होंने ओडिन'स ओक को कटवा कर इस नृशंस परम्परा का अंत किया। जिस स्थान पर वो ओक गिरा वहां पर एक छोटा सा फर का पेड़ लगा हुवा था। जब जर्मन्स ने बिशप विनफ्रीड से पूछा के उन्हें क्रिसमस कैसे मनाना चाहिए, विनफ्रीड ने उनकी परम्परा का ध्यान रखते हुवे बताया के उन लोगों को एक एक फ़र का पेड़ अपने घर ले जाना चाहिए जो के शांति का प्रतीक होगा। क्यों के फर का पेड़ सदा हरा भरा रहता है इस लिए ये पेड़ अनंत जीवन का भी प्रतीक है।
धीरे धीरे ये कथा नाविकों के माध्यम से विश्व के अन्य देशों तक पहुंची और ये परम्परा विश्व भर में फैल गयी
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सैंटा क्लॉज़ और क्रिसमस पर चर्चा की थी के किस प्रकार एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने सैंटा क्लाज़ के मिथक को क्रिसमस से जोड़ कर कुछ ऐसा माहौल पैदा कर दिया के अधिकांश लोग क्रिसमस को सैंटा क्लाज़ से अलग कर के देख ही नहीं पाते हैं। कुछ गैर मसीही लोग तो यहां तक मानते हैं के सैंटा क्लाज़ क्रिश्चियन्स के कोई देवता हैं जिनके बगैर क्रिसमस हो ही नहीं सकता।
आज हम चर्चा करेंगे क्रिसमस ट्री की। क्रिसमस आगमन माह की शुरुआत में ही हर घर में क्रिसमस ट्री सजा दिया जाता है। किन्तु अगर इस परम्परा के इतिहास में नज़र डालें तो हम पाएंगे के ये परम्परा बर्फीले देशों में क्रिस्चैनिटी आगमन के बहुत पहले से थी। शायद ये कहना अतिश्योक्ती ना होगी के उन लोगों में ये परम्परा प्रागैतिहासिक काल से थी। बर्फीले प्रदेशों में जहां सर्दियां बहुत लम्बी होती हैं और पूरी प्रकृति बर्फ की चादर में दब जाती है, वहां के लोग सर्दियों के आगमन के साथ ही पेड़ की टहनी अपने घर के अंदर रख लेते थे जो उनका ये विश्वास बनाये रखता था के बसंत फिर आएगा।
अब प्रश्न ये है के यह परम्परा क्रिसमस से कैसे जुडी। इस संदर्भ में जर्मनी की एक लोक कथा से पता चलता है। आठवीं शताब्दी तक जर्मनी के जैसिमर नामक शहर में शीतकालीन अयनांत मनाने हेतु ओडिन'स ओक नामक पेड़ नीचे नर बली देनें की परमपरा थी। आठवीं शताब्दी में ईसाई धर्म प्रचारक इंग्लिश बिशप विनफ्रीड जैसिमर पहुंचे। वहां उन्होंने ओडिन'स ओक को कटवा कर इस नृशंस परम्परा का अंत किया। जिस स्थान पर वो ओक गिरा वहां पर एक छोटा सा फर का पेड़ लगा हुवा था। जब जर्मन्स ने बिशप विनफ्रीड से पूछा के उन्हें क्रिसमस कैसे मनाना चाहिए, विनफ्रीड ने उनकी परम्परा का ध्यान रखते हुवे बताया के उन लोगों को एक एक फ़र का पेड़ अपने घर ले जाना चाहिए जो के शांति का प्रतीक होगा। क्यों के फर का पेड़ सदा हरा भरा रहता है इस लिए ये पेड़ अनंत जीवन का भी प्रतीक है।
धीरे धीरे ये कथा नाविकों के माध्यम से विश्व के अन्य देशों तक पहुंची और ये परम्परा विश्व भर में फैल गयी

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