श्री प्रदीप कुमार खन्ना जी के विशेष स्नेहपूर्ण आग्रह पर लिखा गया व्यंग्य
श्री विकास पुरुष गरीबों के गाँव में भाषण देते हुवे
'भाइयों, आपको कैसा देश चाहिए ? कमज़ोर ? या मजबूत ?
'मजबूत ' सभी ने एक स्वर में सहमति जताई।
इस प्रश्न को उन्होंने ठीक उसी तरह तीन बार दोहराया जिस प्रकार मार्क एंटोनी ने रोम में प्रजातंत्र खत्म कर सीजर को डिक्टेटर बनाने के तिहराया था ताकि रोम वासी क्या खाएं, क्या पहने, क्या लिखे, क्या पढ़े; सब पर सीजर की व्यक्तिगत सेना का कब्ज़ा हो सके और उसकी सेना ये तय करे के किसके घर पर आक्रमण करना है और किसके मुंह पर स्याही फेंकनी है।
'भाइयों, राष्ट्र वही मजबूत बनता है जिस राष्ट्र के लोगों में कुर्बानी देने का जज्बा होता है। लेकिन आज हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न ये है के इस नए भारत के विकास के लिए कुर्बानी कौन दे ? मैं कश्मीर भी गया, कन्या कुमारी भी गया। असम से ले कर गुजरात तक लोगों से बात की । मेरी आँखें भर आयीं जब मैंने देखा के सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी इस देश के विकास के लिए कुर्बानी देने को त्तपर खड़े हैं। बहुत गहराई से देखने के बाद ये पता चला के इस देश में दो तरह के लोग हैं। एक कमज़ोर और दूसरे मजबूत। अब अगर मजबूत लोगों की कुर्बानी ली गयी तो देश में कमज़ोर लोग बचेंगे। बचेंगे के नहीं?
'बचेंगे' भीड़ ने कोरस में सहमति जताई।
'और जिस राष्ट्र की जनता कमज़ोर हो राष्ट्र मजबूत कैसे बन सकता है? इसीलिए इसलिए राष्ट्र हित में कुर्बानी मजबूत नहीं कमज़ोर लोग दें। ताकि देश में मजबूत लोग बढ़ें और हमारा राष्ट्र तेजी से तरक्की कर सके। कमज़ोरों की कुर्बानी से जो जगह खाली होगी वो मजबूतों को मिलेगी और देश में भरपूर विकास आएगा। मसलन आज आप अपनी अपनी छोटी छोटी जोतों पर एक दो कुंतल अनाज पैदा करते हो, उसी जमीन पर सैकड़ों टन लोहा पैदा किया जायेगा। तो बोलो विकास होगा के नही?
'होगा' कोरस ने फिर दोहराया।
विकास होगा के नहीं?
'होगा'
'विकास होगा के नहीं ?
'होगा'
क्रमश;
श्री विकास पुरुष गरीबों के गाँव में भाषण देते हुवे
'भाइयों, आपको कैसा देश चाहिए ? कमज़ोर ? या मजबूत ?
'मजबूत ' सभी ने एक स्वर में सहमति जताई।
इस प्रश्न को उन्होंने ठीक उसी तरह तीन बार दोहराया जिस प्रकार मार्क एंटोनी ने रोम में प्रजातंत्र खत्म कर सीजर को डिक्टेटर बनाने के तिहराया था ताकि रोम वासी क्या खाएं, क्या पहने, क्या लिखे, क्या पढ़े; सब पर सीजर की व्यक्तिगत सेना का कब्ज़ा हो सके और उसकी सेना ये तय करे के किसके घर पर आक्रमण करना है और किसके मुंह पर स्याही फेंकनी है।
'भाइयों, राष्ट्र वही मजबूत बनता है जिस राष्ट्र के लोगों में कुर्बानी देने का जज्बा होता है। लेकिन आज हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न ये है के इस नए भारत के विकास के लिए कुर्बानी कौन दे ? मैं कश्मीर भी गया, कन्या कुमारी भी गया। असम से ले कर गुजरात तक लोगों से बात की । मेरी आँखें भर आयीं जब मैंने देखा के सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानी इस देश के विकास के लिए कुर्बानी देने को त्तपर खड़े हैं। बहुत गहराई से देखने के बाद ये पता चला के इस देश में दो तरह के लोग हैं। एक कमज़ोर और दूसरे मजबूत। अब अगर मजबूत लोगों की कुर्बानी ली गयी तो देश में कमज़ोर लोग बचेंगे। बचेंगे के नहीं?
'बचेंगे' भीड़ ने कोरस में सहमति जताई।
'और जिस राष्ट्र की जनता कमज़ोर हो राष्ट्र मजबूत कैसे बन सकता है? इसीलिए इसलिए राष्ट्र हित में कुर्बानी मजबूत नहीं कमज़ोर लोग दें। ताकि देश में मजबूत लोग बढ़ें और हमारा राष्ट्र तेजी से तरक्की कर सके। कमज़ोरों की कुर्बानी से जो जगह खाली होगी वो मजबूतों को मिलेगी और देश में भरपूर विकास आएगा। मसलन आज आप अपनी अपनी छोटी छोटी जोतों पर एक दो कुंतल अनाज पैदा करते हो, उसी जमीन पर सैकड़ों टन लोहा पैदा किया जायेगा। तो बोलो विकास होगा के नही?
'होगा' कोरस ने फिर दोहराया।
विकास होगा के नहीं?
'होगा'
'विकास होगा के नहीं ?
'होगा'
क्रमश;
No comments:
Post a Comment