ये खोजी मन बहुत दिनों से कुछ खोजने को बेकरार था। लेकिन खोजे तो क्या खोजे ? ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका तक तो बिदेशी खोजी खोज चुके थे। सेब भी गिरना था तो न्यूटन के सर पर। मेरे लिए तो जैसे कुछ भी खोजने को बचा ही नहीं था। तभी यक ब यक असहिष्णुता का ध्यान आया। ये असहिष्णुता भी अजीब चीज है। बचपन में कहीं दिखी नहीं, जवानी में कभी मिली नहीं और अब पूरे देश को दीवाना बनाये है। कुछ लोगों को तो ये सपनें में भी दिखती है तो कुछ लोग इसके अस्तित्व से भी इंकार करते है। लेकिन चर्चा हर शख्स करता है। शायद ये सनी लियोनी से भी ज्यादा सेक्सी है तभी तो हर टीवी चैनल, सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया पर छायी है। जवान से लेकर बुड्ढ़ा, हर उम्र का आदमीं उस पर चठखारे ले कर बात कर रहा है। मन में मेरे भी असहिष्णुता को ले कर तरंगें उठने लगीं। सोचा पता करूँ आखिर ये असहिष्णुता है क्या। क्या नूरजहाँ की तरह इसका कोई अस्तित्व भी है या अनारकली की तरह ये भी काल्पनिक है। फिर क्या था, बिना लोटा डोर के निकल पड़ा असहिष्णुता की खोज में।
घर से बाहर निकला ही था के नजर सब्ज़ी वाले पर पड़ी। ये सब्ज़ी वाला रोज़ ठेले पर सब्ज़ी लाद कर पिछले कई सालों से मेरे मुहल्ले में सब्ज़ी बेच रहा था और तकरीबन हर घर में उसी से सब्जी ली जाती थी। लेकिन आज अकस्मात मुझे उस सब्जी वाले में एक ऐसी चीज दिखी जो पहले कभी नहीं दिखी थी, और वो थी उसकी दाढ़ी।
'अरे ये तो शायद मुसलमान है।' मैंने हैरत से सोचा। 'इसने दाढ़ी कब रख ली? लगता है ये ही सबसे बड़ा असहिष्णु है।' मेरी खोज का सबसे पहला सब्जेक्ट मुझे घर के बाहर ही मिल गया।
"क्यों भाई सब्जी वाले, तुमने दाढ़ी कब से रख ली?" मेरे स्वर में प्रश्न कम आरोप ज़्यादा था।
"क्यों मज़ाक करते हो मास्टर साहब? ये दाढ़ी तो पिछले चालीस सालों से रखी है"
"चालीस सालों से?" मेरे स्वर में अब हैरत थी। "तो मुझे अब तक दिखी क्योंनहीं?"
"आप रोज़ तो देखते हो।" वो मुस्कराता हुवा बोला। "लगता है आज स्कुल की छुट्टी है, तभी गरीब आदमी की मौज ले रहे हो"
"छोड़ो, ये बताओ असहिष्णुता है?" मैंने डायरेक्ट विषय पर आते हुवे प्रश्न दागा
"नहीं, बस आलू है, प्याज है, भांटा है."
"अरे मेरा मतलब वो नहीं था। ये बताओ असहिष्णुता कहां मिलेगी?"
"पता नहीं मास्टर साहब। हमारी मंडी में तो कभी आई नहीं है और न मैने कभी बेचीं है।"
"अरे आलू भांटा छोड़ कर कभी देश के बारे में भी सोचो और बताओ असहिष्णुता कहां मिलेगी?"
"ये बड़े लोगों की चीज होगी साहब, वहीं मिलेगी जहां से बड़े और पढ़े लिखे लोग खरीददारी करते हैं। किसी मॉल में। गरीब आदमी ये सब नहीं खरीदता"
'कैसा अहमक है ये' मैंने झुंझलाते हुवे सोचा 'इतनी बड़ी समस्या जिस पर राष्ट्रीय बहस चल रही है उसे ये आलू-भांटा समझ रहा है। इन जैसे लोगों के कारण ही देश का यह हाल है।'
"अच्छा यह बताओ, तुमसे इस मोहल्ले में कौन कौन सब्ज़ी खरीदता है?"
"सभी खरीदते है"
"वो तिवारी जी?"
"वो भी"
"और गुप्ता जी?"
"गुप्ता जी भी, लेकिन मोल भाव बहुत करते है"
"और ठाकुर साहब?"
"ठाकुर साहब को तो हम गांव से घी भी ला कर देते हैं"
"ये बताओ, इस मोहल्ले में कोई ऐसा भी है जो तुमसे सब्ज़ी नहीं लेता हो?"
"हाँ है"
"कौन?" मैंने अति उत्साह से पूछा।
"जिसको उस दिन सब्ज़ी की जरूरत नहीं होती" उसने मासूमियत से जवाब दिया।
"तुमको इस मुहल्ले में सब्जी बेचने में कोई दिक्क्त नहीं होती?"
"बहुत होती है"
"क्या?" मैंने असहिष्णुता मिलने की आशा से पूछा।
"सड़क बहुत खड़बड़िया है। ठेला पलटने का डर रहता है। "
मैं समझ गया के अब इसके साथ समय खराब करने से कोई लाभ नहीं है। या तो मेरी बात समझ नहीं रहा या मैं समझा नहीं पा रहा हूँ।
"अरे मास्टर साहब" किसी ने पीछे से आवाज़ दी। पलट कर देखा तो यादव जी थे ,
"कहिये?"
"ये मंझावन जाने का रास्ता किधर से है?"
"क्या करेंगे मंझावन जा कर?" मैनें प्रतिउत्तर में प्रश्न दागा।
"वो बेटी की शादी है ना, शहनाई वादक बुक करना है।"
"लेकिन मंझावन के तो सारे शहनाई वादक मुस्लिम हैं?"
"मंझावन क्या, पूरे हिन्दुस्तान के ज़्यादातर शहनाई वादक मुस्लिम हैं"
"हिन्दू लड़की की शादी में मुस्लिम शहनाई वादक?"
"तो क्या हुवा? ज़्यादातर हिन्दू लड़कियों की शादी में शहनाई वादक मुस्लिम ही होते हैं।
"और वो असहिष्णुता ?"
"आप भी पढ़े लिखे हो कर कहां ये सब ले कर बैठे हैं। ये सब निठ्ठलों का टाइम पास है। "
"आप के हिसाब से कहीं कोई असहिष्णुता नहीं है ?"
"समाज में तो नहीं है, अगर है तो कुछ नेताओं की बकबक में है, मिडिया की टी आर पी में है, विशिस्ट दलों के राजनितिक एजेंडे में है।"
"ठीक पकड़ें हैं। " मैंने बे मन से उनकी बात का समर्थन करते हुवे कहा। आखिर क्या समझते हैं यादव जी ? उनकी बातों से मैं हताश हो कर अपनी तलाश बंद कर दूंगा ? ऐसा कतई नहीं होगा। मैं असहिष्णुता खोज कर के रहूंगा। साबित कर दूंगा के देश में असहिष्णुता है। मैं इसी अधेड़ बुन में यादव जी को छोड़ आगे बढ़ गया। मैंने पहले ही सोच लिया था के आज अपनी गाड़ी का नहीं अपितु महात्मा गांधी की तरह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग करूंगा।
जल्द ही बड़े चौराहे जाने वाली बस आ पहुंची। भीड़ तो गज़ब की थी फिर भी मैं चढ़ गया। आज समझ आया के हिंदुस्तान का आम नागरिक कितनी मुसीबतों के साथ अपने गंतव्य तक पहुंचता है। बस चल कम रही थी, सवारियां भरने को रुक ज़्यादा रही थी। जिस बस में तिल रखने की भी जगह न हो उस बस में न जाने कैसे इतनी सवारियां समाती जा रहीं थीं। तभी एक रामनामी धारण किये बुजुर्ग महिला बस में चढ़ी। उस महिला को देखते ही एक लड़का जो स्कूल बैग के साथ बैठा था उसने अपनी सीट उस महिला को दे दी। इस दौर में इतनी सभ्यता निश्चित ही हैरान कर देने वाली थी। पूछने पर लड़के ने बताया के उसका नाम इमरोज़ है और उसकी टीचर ने उसे सिखाया है के यदि कोई महिला या बुजुर्ग खड़ा हो हो तो अपनी सीट उसे दे देनी चाहिए। इस पब्लिक बस पर भी असहिष्णुता मिलने की संभावना समाप्त हो गयी। मैं हताश भाव से अपने निश्चित स्टॉप पर उतर कर नौशाद हुसैन आर्टिस्ट की दुकान पर पहुँचा तो देखा उनकी दुकान पर उनके मैनेजर श्री अग्रज पांडे नाटकों की ड्रेसेज छांटने में मसरूफ थे।
"क्या हो रहा है अग्रज मियां?" मैंने उनका ध्यान आकर्षित करने की गर्ज़ से कहा।
"कुछ नहीं दादा, आज राम लीला की ड्रेसें जानीं हैं वही छांट रहा हूँ। " अपना काम जारी रखते हुवे अग्रज ने जवाब दिया।
"अगर एक मुसलमान की दुकान से हिन्दू रामलीला की ड्रेस जाएगी तो इस देश की असहिष्णुता का क्या होगा?"
"खूब व्यंग्य करते हो दादा" अग्रज ने चुटकी लेते हुवे कहा। "असहिष्णुता देखनी है तो टीवी देखो, व्हाट्सप्प पे जाओ, फेस बुक खोलो, यहां क्या कर रहे हो? ये हिंदुस्तान है दादा। यहां हिन्दू किसान के पैदा हुवे गेहूं से मुसलमान की भूख मिटती है तो मुस्लिम घोसी के निकले हुवे घी से आरती के दिए जलते हैं।" तभी दुकान पर रखे हुवे टीवी पर किसी प्रदेश के राजपाल द्वारा करी गयी विषिश्ट टिप्पणी पर बहस शुरू हो गयी और मैं ये सोचने लगा कि असहिष्णुता आम हिंदुस्तानी में है या आज संवैधानिक पदो पर बैठे विशिस्ट लोगों में है।
सही विश्लेषण। बहुत सुन्दर।
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