Thursday, April 14, 2022

 नाटक : स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास 


कोरस :-  देखो सुनलो समझो जानो 

                भारत की कहानी। 

                 एक गुलामी की कहानी और क्रान्ति की कहानी 

                  फिर आज़ादी की कहानी। 

                   देखो सुनलो समझो जानो ________


                    गोरों के काले जुलम  की कहानी 

                    अंग्रेजों के बढ़ते सितम की कहानी 

                    व्यभिचारों की कहानी अत्याचारों की कहानी 

                     गद्दारों की कहानी। 

                     देखो सुनलो समझो जानो ________


                      बूट से कुचले किसन की कहानी 

                      जूतों से रौंधी फसल की कहानी 

                       जन जन की कहानी जन गण की कहानी 

                       जन तंत्र की कहानी 

                         देखो सुनलो समझो जानो _________


                         क्रान्ति की सुलगती शमा की कहानी 

                          बगावत के उठते धुआं की कहानी 

                          देश भक्तों की कहानी राष्ट्र भक्तों की कहानी 

                          हम सब की कहानी 

                          देखो सुनलो समझो जानो _________


सारे कलाकार फ्रीज़ हो जाते हैं। मलंग  अपनी ढप पर एक ठेका लगाता है। तभी कलाकार १ और मलंग को छोड़ कर बाकी कलाकार एक भीड़ में बदल जाते हैं और नारा लगाते हैं। 


भीड़ :- हमें चाहिए आज़ादी 

             हर एक वाद से आज़ादी 

               हम क्या मांगें आज़ादी 

              तुम क्या मांगो आज़ादी 

               ये क्या मांगे आज़ादी 

                वो क्या मांगे आज़ादी 

                 सब क्या मांगें आज़ादी 

कलाकार १ उन्हें हैरत से देखता है। भीड़ बाहर निकल जाती है। 

कलाकार १:- (मलंग से) मलंग चाचा। अपना देश तो आज़ाद है। 

मलंग: हाँ बेटा आज़ाद है। 

कलाकार १:- तो फिर आज़ाद देश के ये नागरिक किस्से आज़ादी मांग रहे हैं और क्यों? 

मलंग :- ये तो इनको भी नहीं पता। 

कलाकार १:- क्या इनको ही नहीं पता फिर भी ये मांग रहे हैं ?

मलंग :- हाँ। क्यों के ये मानसिक गुलाम हैं उन ताकतों के जो इस देश में अस्थिरता पैदा कर हमें फिर से गुलाम                  बनाने के लिए काम कर रही हैं। इन्हें क्या पता के ये आज़ादी हमें कैसे मिली है और इसकी हमने क्या                    कीमत चुकाई है। कितने शहीदों ने गोलियां खाईं और कितने फांसी चढ़ गए। आज़ाद भारत में पैदा हुए हैं                 ना। इसी लिए मोटाई सवार है। अंग्रेजों की दासता में पैदा हुए होते और उनके कोड़े खाए होते तो समझ में               आता आज़ादी क्या होती है। 

कलाकार १ :- मलंग चाचा हमें भी बताइये के हमें ये आज़ादी कैसे मिली। 

मलंग :-  (ढप बजा कर गाता है) बीत गए शत वर्ष उठा था जनमत भारत वर्ष में 

                                                मातृ ज्योति पर जल मरने को बढ़े पतंगे हर्ष में 

                                               सन सत्रह सौ सत्तावन में गोरी शक्ति प्रतीत हुई 

                                                      (पार्श्व में बूटों की आवाज़ )

                                               जहां लड़े दो भारतवासी गोरी शक्ति जीत गई। 

दोनों फ्रीज़ हो  जाते हैं। एक तरफ से किसन गुस्से में आता है और कासिम को आवाज़ देता है। 

किसन :- कासिम अबे कासिम। बाहर निकल 

कासिम :- (दूसरी तरफ से आता है ) क्या है किसन क्यों चिल्ला रहे हो ?

किसन :- अबे तूने मेरा कबूतर कैसे पकड़ लिया ?

कासिम :- मेरे अड्डे पर आ कर बैठा मैंने पकड़ लिया। 

किसन :- मेरा कबूतर वापस कर। 

कासिम :- जिसका अड्डा उसका कबूतर। 

 किसन :- देख बे कासिम, कबूतर वापस कर नहीं तो बहुत बुरा हो जाएगा 

कासिम :- चाहे जितना भी बुरा हो जाए कबूतर वापस नहीं होगा।  

किसन :- इतने सालों की दोस्ती एक मिनट में मिटटी में मिल जायेगी 

कासिम :- दोस्ती जाए चूल्हे भाड़ में, कबूतर नहीं मिलेगा 

किसन :- (कासिम का  गला पकड़ लेता है ) कबूतर तो तुझे देना पड़ेगा। 

कासिम :- (किसन का गला पकड़ लेता है) गला छोड़। 

किसन :- कबूतर वापस कर 

कासिम :- गला छोड़ 

              कमल आता है 

कमल :- अरे अरे अरे।  यहां तुम दोनों आपस में लड़ रहे हो और वहां अंग्रेज अपने गाँव की तरफ आ रहा है। 

कासिम :- तो क्या करें ?

कमल :- अरे चलो मिल कर उस अंग्रेज से लड़ें। वरना वो अपने गाँव पर कब्ज़ा कर लेगा। 

किसन :- पहले मेरा कबूतर 

कमल :- अरे कबूतर तो बहुत मिल जाएंगे लेकिन अगर आज गाँव चला गया तो कल देश चला जाएगा। 

कासिम :- गाँव जाए चाहे देश।  कबूतर तो नहीं दूंगा। 

किसन :- कबूतर तो मेरा है 

कासिम :- मैंने पकड़ा मेरा है। 

कमल :- जा कर देखता हूँ शायद कोई और मिल जाए अंग्रेज से लड़ने के लिए। 

                         कमल निकल जाता है 

किसन :- मैं कह रहा हूँ कबूतर मुझे दे दे 

कासिम :- नहीं दूंगा 

               अंग्रेज अफसर का हिन्दुस्तानी सिपाही के साथ प्रवेश 

अंग्रेज :- ए तुम काला आदमी लोग, आपस में क्यों लड़ता है ?

किसन :- साहब ये मेरा कबूतर नहीं दे रहा 

कासिम :- साहब मैंने पकड़ा है कबूतर मेरा है। 

अंग्रेज :- ओह समझा।  (किसन को एक तरफ ले जा कर) वो कबूतर तुम्हारा है। तुम्हे उससे लड़ कर वापस लेना                 चाहिए। 

किसन :- वही तो कर रहा हूँ साहब। 

अंग्रेज :- गुड। तुम अच्छा आदमी है। तुम लड़ो हम तुम्हारा साथ देगा। 

किसन :- मेहरबानी साहब। 

अंग्रेज :- (पिस्तौल देते हुए) तुम ये गन रखो।  एंड शूट हिम। उसको गोली मार दो। 

किसन :- जी  साहब। 

अंग्रेज :- दो मिनट रुको। उससे कहता हूँ के अगर जान बचानी है तो तुम्हारा कबूतर तुम्हे वापस कर दे। 

                    कासिम के पास आता है 

अंग्रेज :- मैंने उसको बोला के कबूतर भूल जाए बट वो नहीं मान रहा 

कासिम :- फिर ?

अंग्रेज :- तुम अच्छा आदमी है। तुम लड़ो हम तुम्हारा साथ देगा। 

कासिम :- मेहरबानी साहब। 

अंग्रेज :- (पिस्तौल देते हुए) तुम ये गन रखो। एन्ड शूट हिम। उसको गोली मार दो। 

कासिम :- जी साहब। 

किसन :- (कासिम पर गन तानते हुए) कासिम मेरा कबूतर वापस कर 

कासिम :- कबूतर मेरा है मैंने पकड़ा है 

    दोनों एक दुसरे पर गोली चलाते है और दोनों गिर कर मर जाते हैं। अंग्रेज ठहाका लगाता है 

अंग्रेज :- देखा कैसा बेवकूफ आदमी होता है ये काला  लोग। कबूतर के लिए तो लड़ गया लेकिन मुल्क के लिए                   नहीं लड़ता है। ऐसा बेवकूफ लोगों की मदद से हम इस मुल्क पर कब्ज़ा करेगा 

                                      बाहर निकल जाता है                                         

मलंग :- ठीक इसी तरह से अंग्रेजो ने रजवाड़ों को आपस में लड़ाया। हर राजा ये समझता रहा के अंग्रेज उनके                    साथ है लेकिन अंग्रेज किसी के साथ नहीं बस अपनी धूर्तता के साथ था। 

            (गाता है) राजाओं नव्वाबों की इज़्ज़त 

                           लुटती थी सरे बाजार 

                           अंग्रेजो के परम सहायक 

                            थे स्वदेश के ही गद्दार 

पार्श्व से आवाज़:- सावधान। जन जन के प्रिय 

                           महाराज देव दत्त पधार रहे हैं। _____

एक तरफ सी महाराज देवदत्त अपने प्रधान मंत्री के संग प्रवेश करते हैं। 

देव दत्त :- ये अंग्रेज आखिर अपने आप को समझते क्या हैं ? देश हमारा, प्रजा हमारी आदेश उनका।  ये कैसे हो                   सकता है ? 

मंत्री :- महाराज हमारे आगे बस दो ही विकल्प हैं। या तो युद्ध करें या उनकी बात मान लें 

देवदत्त :- जब राष्ट्र की अस्मिता की बात हो तो युद्ध अनिवार्य हो जाता है। 

मंत्री :- युद्ध मगर किस्से ? 

देवदत्त :- अंग्रेजो से। 

मंत्री :- ये अंग्रेज बड़े ही धूर्त हैं महाराज। ये स्वयं लड़ने नहीं आएंगे। ये हमारे पडोसी राजा को भड़काएंगे।  अगर                 युद्ध हुआ तो मां भारती के लाल एक दूसरे को काटेंगे। अंग्रेज दूर खड़े खड़े मुस्कायेंगे। दोनों ही तरफ की              फसलें जल चुकी होंगी। खेत लहू लुहान खड़े होंगे।  आर्थिक रूप से दोनों ही तरफ असीमित क्षति हो चुकी              होगी महाराज। प्रजा भूखी मर रही होगी। 

देव दत्त :- तो फिर हम क्या करें ?

मंत्री :- ये युद्ध हमें इतना तोड़ देगा के अंतत: हमें अंग्रेजो की बात माँननी पड़ेगी। 

देव दत्त :- मतलब इन मलेच्छों के आगे समर्पण कर दूँ ? कभी नहीं। 

मंत्री :- प्रश्न आपके समर्पण का नहीं है। प्रश्न प्रजा की रक्षा का है। 

देव दत्त :- कोई तो रास्ता होगा ?

मंत्री :- रास्ता है महाराज। लेकिन कारगर नहीं होगा। 

देव दत्त:- क्या रास्ता है ?

मंत्री :- अगर दोनों पड़ोसी राज्य आपस में युद्ध करने के बजाए अंग्रेजो से युद्ध करें। 

देव दत्त :- हमारा पड़ोसी ये बात मानेगा ?

मंत्री :- यही तो बात है महाराज। वो नहीं मानेगा। आपको ले कर उसकी व्यक्तिगत ईर्ष्या इतनी है के आपको                    मिटाने के लिए वो खुद भी मिटने को तैयार है। 

देव दत्त :- यही तो इस देश का दुर्भाग्य है। हज़ारो किलोमीटर की यात्रा कर के आनेवाले गोरे हैं कितने ? मुट्ठीभर ?                  अगर हर भारतवासी इनके खिलाफ एक एक पत्थर भी उठा ले तो ये दुम दबा कर भाग जाएंगे। 

मंत्री :- मगर ये होगा नहीं। क्षुद्र अभिलाषाएं , महत्वाकांक्षाएं और ईर्ष्या की पूर्ती के अंधेपन ने हमें दोस्त और दुश्मन            में भेद करना भुला दिया। 

                         अंग्रेज अफसर का प्रवेश 

अंग्रेज :- लॉन्ग लिव द क्वीन योर हाइनेस। 

देवदत्त :- आइये।  

अंग्रेज :- वेल योर हाइनेस। जो प्रपोजल ब्रिटिश सरकार ने दिया था उस का क्या हुआ ?

देवदत्त :- उसपर अभी हम चिंतन कर रहे हैं। 

अंग्रेज :- चिंतन ? व्हाट चिंतन योर हाइनेस ? आपको चिंतन करने का अधिकार किसने दिया ? आपको हम                         हाइनेस बोलता है, इसका मतलब ये नहीं के आप हाइनेस हो गया। जो ब्रिटिश क्राउन बोला वो आपको                   करना मांगता । नो चिंतन। चिंतन करने का काम ब्रिटिश क्राउन का है। 

देवदत्त :- मगर _____

अंग्रेज :- व्हाट ? आप हमको मगर बोला ? ब्रिटिश क्राउन के रिप्रेजेन्टेटिव को मगर बोला ? हाउ  dare यू ? मगर                   बोलने का हिम्मत मतलब ब्रिटिश क्राउन से बगावत ? ब्रिटिश क्राउन अगर चाहे तो तुम्हारा ये पगड़ी                       अपने पैरों से उड़ा देगा योर हाइनेस। 

मंत्री :- साहब बहादुर। आप अन्यथा ना लें। आज महाराज ज़रा अस्वस्थ हैं। इसलिए इस प्रकार की चर्चा कर रहे हैं।           इधर आइये मैं आपको समझाता हूँ। (कोने में ले जा कर) महाराज पगला गया है। ये ऐसे नहीं मानेगा। आप             पड़ोसी  राजा की मदद से इसको नेस्तनाबूद कर मुझे यहां का राजा बना दें। फिर मैं बर्तानिया सरकार की             हर इच्छा पूरी करूँगा 

अंग्रेज :- ओके। यू आर एन इंटेलीजेंट मैन।  

                              Fade out 

मलंग :- (गाता है) बनी ईस्ट इण्डिया कंपनी 

                            व्यापारी से अब सरकार 

                             शासन दृढ़तर हुआ विदेशी 

                              कर स्वतंत्रता का संहार 

                               इसी तरह नीतिज्ञ विदेशी 

                               शनैः शनैः बढ़ते आए 

                               हमें परस्पर लड़ा लड़ा कर 

                               सब सर पर चढ़ते आए 

                                आठ सहस्त्र मील के वासी 

                                 सात समुन्द्र पार के जीव 

                                  घोषित हैं सम्राट देश के 

                                  व्यथित भारतीयता अतीव। 

                                   जाने लगी विलायत सम्पति 

                                    जलयानों में भर भर कर 

                                    कोष रिक्त कर गया देश का 

                                     शासन शोषित शोषण कर। 


अनाज मंडी का दृश्य।  हीरा अनाज लगा कर उदास बैठा है। मोती का प्रवेश। 

मोती :- बधाई हो हीरा भाई। 

हीरा :- किस बात की बधाई हीरा ?

मोती :- फसल जो इतनी बढ़िया हुई है। 

हीरा :- क्या फायदा इस बढ़िया फसल का जब बाजार में खरीददार ना हों 

मोती :- क्यों ? खरीददार क्यों नहीं हैं ?

हीरा :- लोगों के पास खरीद का पैसा नहीं है। ऐसी हालत कर दी है इन गोरों ने हम लोगों की। बाजार में माल है पर             खरीददार नहीं है। 

मोती :- लेकिन अंग्रेज तो भर भर कर खरीद कर रहे हैं 

हीरा :- कर रहे हैं लेकिन किस कीमत पर ? लागत से भी कम कीमत पर। ये अंग्रेज अपने देश के किसानो से                     कपास, रेशम, नील, शक़्कर, नमक, मसाले, चाय, अफीम सभी कुछ लागत से भी कम कीमत पर खरीद                 कर बड़े बड़े पानी के जहाजों पर  विलायत ले जाते हैं और अपने मुल्क को अमीर बनाते जा रहे हैं। और                 हमारे देश के किसान लागत ना मिलने से क़र्ज़ में डूबते जा रहे हैं। 

मोती :- तो मत बेचो उन्हें 

हीरा :- नहीं बेचें तो क्या करें ? घर में रख कर सड़ाएं ? उससे भी क्या फायदा होगा ?

मोती :- बात तो तुम ठीक कह रहे हो भाई। 

हीरा :- कुछ हो नहीं सकता इन अंग्रेजों का ?

मोती :- बस एक ही रास्ता है। इन गोरों को इस देश से भगाया जाए। 

हीरा :- मगर ये करेगा कौन ? 

मोती :- ये ही तो बड़ा सवाल है के करेगा कौन ? हमारे देश की छोटी छोटी रियासतें आपस में लड़ने के बजाए                    अगर मिल कर इन अंग्रेजों से लड़ें तो इन्हें आसानी से भगाया जा सकता है। 

हीरा :- इस देश को एक क्रान्ति की ज़रूरत है। 

मोती :- मगर ये क्रान्ति आएगी कैसे ?

हीरा :- अगर हिन्दुस्तान का एक एक मजदूर किसान इन अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हो जाए 

मोती :- अरे हम किसान किसानी करें या क्रान्ति ?

हीरा :- अगर हर किसान अपने हल को हथियार बना ले तो क्रान्ति हो जाए। 

मोती :- भूखे पेट क्रान्ति नहीं हुआ करती। 

हीरा :- क्रान्ति हमेशा भूखे पेट वालों ने ही की है। भरे पेट वालों को क्रान्ति की ज़रूरत ही नहीं। 

मोती :- छोड़ो भाई ये सब किताबी बातें हैं। यहां कोई क्रान्ति व्रांति नहीं होने वाली। 

हीरा :- होगी। क्रान्ति ज़रूर होगी। और दुनिया देखेगी के किस तरह  हिन्दुस्तानियों ने अंग्रेजो को अपने                             देश से मार भगाया। पूरे भारत में बस एक ही नारा गूंजेगा 'वन्दे मातरम'

मलंग :-      (गाता है) होते रहे मूक जनता पर 

                                  भांति भांति के अत्याचार 

                  एक अंग्रेज हिन्दुस्तानी पर कोड़े बरसाता है 

मलंग :-     (गाता है) पशुओं तुल्य निरंकुश गोरे 

                               बरत रहे थे निज अधिकार 

                                फलस्वरूप डलहौजी की,

                                 अपहरण नीति के भारतवर्ष 

                                  के राजाओं सरदारों 

                                   सामंतों में कुछ हुआ विमर्श 


राजा और सामंत इकट्ठा होते हैं 

पहला  राजा :- दोस्तों, ये डलहौजी की हड़प नीति जिसे ये लैप्स डॉक्ट्रिन कहता है के यदि कोई राजा निसंतान मर                           गया तो उसका राज्य उसके दत्तक पुत्र को ना मिल कर कम्पनी राज्य में मिला लिया जाता है। इसी                         हड़प नीति के अंतर्गत अब तक मांडवी, कोलाबा, जालौन और सूरत कम्पनी राज्य में मिलाया जा                           चुका है। 

दूसरा राजा :- और अब सतारा, उदयपुर और झांसी की बारी है 

तीसरा राजा :- इस तरह तो ये अंग्रेज कोई ना कोई कानून ला कर पूरे भारत वर्ष पर कब्ज़ा कर लेंगे। 

चौथा राजा :- और हम सब अपने ही देश में गुलाम बन कर रह जाएंगे। 

पहला राजा :- हमारे पास बस दो ही रास्ते हैं। गोरों के इस अत्याचार को स्वीकार करें या उसका प्रतिकार करें। 

दूसरा राजा :- हम प्रतिकार करेंगे। 

तीसरा राजा :- क्या प्रतिकार इतना आसान होगा। 

पहला राजा :- आसान तो बस एक ही चीज़ है, दासता की बेड़ी को खुद ही धारण कर लेना। प्रतिकार सदा ही                                मुश्किल होता है, इसीलिए करने योग्य होता है। 

चौथा राजा :- अब समय आ गया है के हम निर्णय करें के हम सम्मान से सर उठा कर जियें या फिर इनकी दासता                         में अपना शेष जीवन काट दें। 

पहला राजा :- आप गलत समझ रहे हैं बंधु। प्रश्न हमारे मान सम्मान का नहीं मां भारती के सम्मान का है। क्या हम                          अपनी मातृ भूमि को इन फिरंगियों के बूटों तले कुचला जाना देख पाएंगे ? या फिर अपनी जन्म भूमि                         के लिए अपने प्राणों का उतसर्ग कर देंगे ?

दूसरा राजा :- हम अपने मादरे वतन को इन फिरंगियों से आज़ाद करेंगे। चाहे इसके लिए हमें अपनी जान भी क्यों                       ना कुर्बान करनी पड़े। 

तीसरा राजा :- हम जान देने के लिए नहीं इन फिरंगियों की जान लेने के लिए लड़ेंगे। 

पहला राजा :- जान लेना या देना हमारा मकसद नहीं होगा। हमारा मकसद होगा आजादी। इन अंग्रेजों से आजादी।                     और इसके लिए हमें जन जन तक अपनी बात पहुंचनी होगी। इस आंदोलन को हमें जन आंदोलन                            बनाना होगा।  

तीसरा राजा :- लेकिन हम अपनी बात जन जन तक पहुंचाएंगे कैसे ?

पहला राजा :- रोटी और कमल 

चौथा राजा :- क्या ? रोटी और कमल ?मैं समझा नहीं ?

पहला राजा :- रोटी हमारे पेट की भूख शांत करती है तो देव पुष्प कमल हमारी आत्मा की भूख शांत करता है। हम                        जन जन तक क्रान्ति का संदेश रोटी और कमल के माध्यम से पहुंचाएंगे। 

दूसरा राजा :- लेकिन रोटी और कमल जन जन तक ले कौन जाएगा ?

पहला राजा :- हमारे साधू और सन्यासी जो हमेशा पूरे भारत का भ्रमण करते रहते हैं, पुलिस चौकीदार, और ऐसे                         हीअन्य राष्ट्र भक्त। जो भी एक रोटी स्वीकार करेगा, उसकी ये ज़िम्मेदारी होगी के बदले में वो वैसी                        ही रोटियां तैयार करे और आस पास के गावों में बांटे। ये रोटियां अंग्रेज़ों की डाक से भी तेज़ गति से                       लोगों तक पहुंचाई जाएंगी। करीब ३०० मील प्रति रात्रि की गति से। इस प्रकार शीघ्र ही हमारी क्रान्ति                       का यह संदेश नर्मदा से नेपाल, फर्रुखाबाद से गुड़गांव, अवध से दिल्ली तक पहुंच जाएगा। 

तीसरा राजा :- क्या हिन्दू क्या मुसलमान। सभी इस सशस्त्र क्रान्ति का हिस्सा बनेंगे। 

चौथा राजा :- हमारा नारा होगा 

सभी :- "दिल्ली चलो" 


मलंग :-               (गाता है) हिन्दू मुस्लिम एक हो गए 

                                          आयोजित करने को क्रान्ति 

                                            दिखलाई देती प्रत्यक्ष ही 

                                            हाहाकार पूर्व की शान्ति 

                                             रोटी और कमल के निश्चित 

                                             गोपनीय हो गए निशान 

                                             इकतीस मई अट्ठारह सौ 

                                             सत्तावन का दिन निश्चित मान 

                                              लगी परस्पर होड़ 

                                              भारतियों की हरषोतकर्ष में 

                                               बीत गए शतवर्ष उठा था 

                                                जनमत भारत वर्ष में 

                                                 सन छप्पन में डलहौजी की 

                                                 जगह लार्ड केनिंग आया 

                                                  अपने पुरखों के समान ही 

                                                   जाल निरंतर फैलाया 

                                                    हिन्दुस्तानी सेनाओं में 

                                                    भाँती भाँति से हुआ प्रचार 

                                                     अंग्रेजों का जुआ देश 

                                                       कंधों से देगा उतार 

                                                       चर्बी लगे कारतूसों का 

                                                       निश्चित वर्जित हुआ प्रयोग 

                                                       बैरकपुर में इस कारण ही 

                                                        घटित हुआ पहला संयोग 



कुछ सिपाही आपस में चर्चा कर रहे हैं 

सिपाही १:- ये ज़्यादती है। ये हम सब का धर्म भ्र्ष्ट करने की साज़िश है 

सिपाही २:- ये जो नई एनफील्ड बन्दूक अंग्रेजों ने हम हम सब सिपाहियों को दी है इसमें कारतूस डालने से पहले                      उसे दांत से काटा जाता है। 

सिपाही ३:- भाइयों उस कारतूस को गाय  और सुवर की चर्बी से चिकना किया गया है 

सिपाही ४:- गाय हमारी माता है। हम गाय की चर्बी वाला कारतूस मुँह से नहीं काटेंगे 

सिपाही २:- सुवर हम मुसलमानो के लिए हराम है। हम सुवर लगी चर्बी को मुँह से नहीं काटेंगे। 

सिपाही १ :- अपने धर्म की रक्षा के लिए हम कुछ भी करेंगे लेकिन अपना धर्म भ्र्ष्ट नहीं होने देंगे। 

सिपाही ३ :- इसके लिए अगर हमें बगावत भी करनी पड़े तो हम करेंगे। 

सभी :- हाँ हम बगावत करेंगे। 

सिपाही ५ का प्रवेश 

सिपाही ५:- साथियों कुछ सुना तुम लोगों ने ?

सभी :- क्या ?

सिपाही ५ :- बैरकपुर में बंगाल नेटिव इन्फेंट्री के सिपाही ह्यूसन को गोली मार दी और बगावत शुरू कर दी। 

सिपाही ४ :- सच ?

सिपाही ५:- हाँ 

सभी :- मगल पांडे ज़िंदाबाद। 

सिपाही :- उसे गिरफ्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई। 

सभी :- मंगल पांडे अमर रहे। 

सिपाही ५:- साथियों मंगल पांडे की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। यहां मेरठ में भी हम अंग्रेजो के खिलाफ                              बगावत करेंगे। इनसे अपने देश को आज़ाद करेंगे। 

सभी :- हाँ अपने देश को आज़ाद करेंगे। 

सिपाही ५:- जो हथियार आज तक हम अग्रेजो के लिए उठाते आए आज वो हथियार हम अपने देश के लिए                               उठाएंगे। ये हमारी बगावत नहीं जंग ए आज़ादी होगा। 

सिपाही १ :- लेकिन तुम्हें नहीं लगता के मंगल पांडे जल्दी कर गया ? तुम्हे नहीं लगता के अभी हम तैयार नहीं हैं ?                       हमें पहले से निश्चित तारिख ३१ मई तक इंतज़ार करना चाहिए। 

सिपाही ५:- अब हम उस तारिख का इंतज़ार नहीं कर सकते। हमें फौरन धावा बोलना होगा। अभी नहीं तो कभी                         नहीं। 

                      सभी हिचकते हुए एक दुसरे को देखते हैं 

सिपाही ५:- क्या हो गया है तुम लोगों को ? दिखाई नहीं देता के जिस पल का हम लोगों को इंतज़ार था वो पल आ                      गया है। वक्त आ गया है वक्त अपने देश को आज़ाद करने का। वक्त आ गया है मारने या मर जाने                        का। उठाओ अपनी बंदूकें और चलो और लड़ो एक बार अपने देश के लिए। चलो तोड़ दो जेल खानों                      की दीवारें और सबसे पहले आज़ाद करो अंग्रेजों की जेल में सड़ रहे हिन्दुस्तानी कैदियों को। वो भी                        होंगे हमारी जंग ए आज़ादी का हिस्सा। 

सभी :- चलो चलो। 

                                       सब जाते हैं। 


मलंग :-                           (गाता है) अचरजकारी परम् संगठित 

                                                        खुदगर्जी से रह कर दूर 

                                                          केंद्र बिंदु  गया देश का 

                                                           ब्रह्मावर्त उपनाम बिठूर 

                                                            नाना धू धू पंत पेशवा का था 

                                                            दत्तक पुत्र सुजान 

                                                             नाना का विश्वस्त अजीमुल्ला 

                                                             जो कहलाता था खान 

                                                             क्रांतिकारियों को पहनाया 

                                                             जिसने केशरिया बाना 

                                                             शाह बहादुर शाह मुगल 

                                                             सम्राट देश भर ने माना 

                                                              फ़ैल गई बन दावा जैसी 

                                                              भारत में विद्रोहानल 

                                                               नगर नगर में ग्राम ग्राम में 

                                                                घर घर व्याप्त हुई हलचल 

कुछ क्रांतिकारी भागते हुए आते हैं। 

क्रांतिकारी :- मारो मारो। खदेड़ दो अंग्रेजों को इस देश के बाहर। उधर ढूंढो उधर छिपे होंगे। 

निकल जाते हैं 

                                                              होने लगा सशस्त्र सामना 

                                                              शासित और शासकों का 

                                                              दिखलाई देता था सबको 

                                                              अंत समीप त्रासकों का 

     

क्रन्तिकारी  नारे लगाते हुए आते हैं। 

सभी क्रांतिकारी :- नाना साहब पेशवा जिंदाबाद। नानासाहब पेशवा ज़िंदाबाद। 

क्रांतिकारी १:- नाना साहब ने तो अपना सब कुछ होम करके अंग्रेजों को मोम कर दिया। 

क्रांतिकारी २:- आज नाना साहब ने शहर कानपुर को अंग्रेजों से मुक्त कर के कानपुर पर कानपुर पर पूर्ण                                     अधिकार कर लिया। 

क्रांतिकारी ३:- जिस प्रकार कानपुर अंग्रेजों से मुक्त हुआ, उसी प्रकार शीघ्र ही पूरा भारत भी अंग्रेजों से मुक्त हो                            जाएगा 

क्रांतिकारी ४:- उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम स्वत: हो रहे बलिदान 

क्रांतिकारी ५:- होड़ लगी सब की आपस में है जीवन से मृत्यु महान 

क्रांतिकारी १:- विधवा झाँसी की महारानी सेनानी लक्ष्मी बाई 

क्रांतिकारी २:- जिसने युद्ध कुशलता अनुपम स्त्री होकर दिखलाई 


मलंग:-                                       (गाता है) कई वर्ष तक मची थी 

                                                                 वीर तात्या टोपे की 

                                                                  कहते हैं फिर फांसी दे दी 

                                                                   अंग्रेजो ने धोके की 

                                                                   टोपे की वेश्या अजीजन 

                                                                    ने कमाल का काम किया 

                                                                    भोजन भार लिया सेना का 

                                                                    स्वयं कठिन संग्राम किया 

           

             कुछ क्रांतिकारी खड़े हैं अजीजन भी साथ है 

क्रांतिकारी १:- अजीजन बाई। आज देश को आपकी ज़रूरत आन पड़ी है 

अजीजन :-      बोलिये हम  मादर ए वतन के किस काम आ सकते हैं । 

क्रांतिकारी १:- ये आप को सोचना है के आप देश प्रेम में क्या कर सकती हैं। बस ये याद रखिये के हमें तात्या टोपे                         जी के काम को आगे बढ़ाना है। 

अजीजन :- जी भाई जान 

क्रांतिकारी १:- आप अनिन्ध्य सुंदरी हैं। आप का सौंदर्य किसी को भी मोहपाश में बाँध लेता है। आप बताइये के                              आप अपने इस अप्रतिम सौंदर्य को किस प्रकार अपना अस्त्र बना कर दुश्मनों का नाश कर सकती                        हैं ?

अजीजन :- हम अपने इस बेपनाह हुस्न का इस्तेमाल कर दुश्मनों के खेमे में घुस जाया करेंगे। वहां अपनी इस                           खूबसूरती का इस्तेमाल करते हुए दुश्मनों को बेवकूफ बना कर उनकी हर एक चाल का पता कर लेंगे।                 उसके हिसाब से क्रांतिकारी अपनी योजना बना कर दुश्मनों पर हमला कर सकते हैं। 

क्रांतिकारी :- बहुत बेहतर। 

अजीजन :- हम मर्दाना भेष धरने में भी बहुत माहिर हैं। अगर ज़रूरत पड़ी तो मर्दाना भेष रख कर भी कुछ काम                     कर सकते है 

क्रांतिकारी :- लेकिन याद रखिये। इस काम में खतरा बहुत है। अगर पकड़ी गईं तो अंग्रेज आपको फांसी भी दे                            सकते है। 

अजीजन :- लिल्लाह ! इन फिरंगियों की कोर्निश से तो आला है इन फिरंगियों से लड़ते लड़ते फांसी चढ़ जाना। 

क्रांतिकारी १:- जिस मुल्क ने रानी लक्ष्मीबाई और अजीजन बाई ऐसी बेटियों को जन्म दिया हो उस मुल्क को कोई                        कभी गुलाम बना कर रख ही नहीं सकता। 


               मलंग और कलाकार

कलाकार :- जब इतने महान सेनानी थे हमारे पास तो हमारी क्रान्ति सफल रही होगी ?

मलंग :- क्या बताऊं दोस्त। गोरखों और सिक्खों अंग्रेजों का साथ दे दिया। पैसा दे दे कर गोरों ने उनके हाथों को                  बाँध दिया। ऐसे कठिन समय में कुछ गद्दारों ने भी की गद्दारी। व्यर्थ सिद्ध हो गया हमारा शुभ प्रयत्न इतना                भारी। इतना  ही नहीं आगे सुनो। अंग्रेजों ने दुनिया को बहकाने में रक्खी ना कसर। इस पवित्र स्वतंत्रता                    युद्ध को क्षुद्र नाम दे दिया गदर। हार गए फिर भारतवासी सारे अस्त्र शस्त्र टूटे। चली नील की दमन योजना              भाग्य देश के फिर फूटे। 

क्रांतिकारी १:- (प्रवेश) फिर चूसना मूसना जारी हुआ 

क्रांतिकारी २:- (प्रवेश) हमारी कुगति हुई 

क्रांतिकारी ३:-(प्रवेश)  जब तक बापू के संरक्ष्ण में 

क्रांतिकारी ४:- (प्रवेश) ना देश की सुगति हुई 

क्रांतिकारी ५:- (प्रवेश) तब से मानवता के हित में 

मलंग :- हमने पथ को साफ़ किया 

महिला पात्र :- कोहिनूर के टुकड़े करने वालों को भी 

पात्र :- हमने दिल से माफ़ किया 

क्रांतिकारी १;- अंत: करण खुला रहता है 

क्रांतिकारी २:- लघु गंभीर विमर्श में 

क्रांतिकारी ३:- बीत गए शत वर्ष उठा था 

क्रांतिकारी ४:- जन मत भारत वर्ष में 








                                   





                            


 

      

             

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